कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण २७ | # कोषप्रवेश्यरत्नपरीक्षा |
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| अध्याय ११ |
(१) कोषाध्यक्षः कोषप्रवेश्यं रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा तज्जातकरणाधिष्ठितः प्रतिगृह्णीयात् । (२) ताम्रपर्णिकं, पाण्ड्यकवाटकं, पाशिक्यं, कौलेयं, चौर्णेयं, माहेन्द्रं कार्दमिकं स्रोतसीयं, ह्रादीयं, हैमवतं, च मौक्तिकम् । (३) शङ्खः शुक्तिः प्रकीर्णकं च योनयः । (४) मसूरकं त्रिपुटकं कूर्मकमर्धचन्द्रं कञ्चुकितं यमकं कर्तकं खरकं सिक्थकं कामण्डुलुकं श्यावं नीलं दुर्विद्धं चाप्रशस्तम् ।
कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा
( १ ) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह विशेषज्ञों की सहमति से ही रत्न, सार, फल्गु और कुप्य आदि मूल्यवान् द्रव्यों को राजकोष के लिए लेना स्वीकार करे ।
( २ ) मोतियों के दस उत्पत्ति स्थान हैं : १. ताम्रपर्णिक ( पाण्ड्यदेश की ताम्रपर्णी नदी के संगम पर उत्पन्न ), २. पाण्ड्यकवाटक ( मलयकोटि नामक पर्वत पर उत्पन्न ), ३. पाशिक्य ( पाटलिपुत्र के समीप पाशिका नामक नदी में उत्पन्न ), ४. कौलेय ( सिंहलद्वीप की कुला नामक नदी में उत्पन्न ), ५. चौर्णेय ( केरल की चूर्णी नामक नदी में उत्पन्न ), ६. माहेन्द्र ( महेंद्रगिरि के निकटवर्ती समुद्रतल में उत्पन्न ); ७. कार्दमिक ( फारस की कर्दमा नामक नदी में उत्पन्न ), ८. स्रोतसीय ( बर्बर के समीप स्रोतसी नामक नदी में उत्पन्न ); ९. ह्रादीय ( बर्बर के समीप समुद्रतटवर्ती श्रीषण्ड नामक झील में उत्पन्न ) और १०. हैमवत ( हिमालय पर्वत पर उत्पन्न )।
( ३ ) मोतियों की उत्पत्ति के तीन कारण हैं : शुक्ति, शंख और प्रकीर्णक ( गजमुक्ता तथा सर्पमणि )।
( ४ ) दूषित मोतियों के तेरह प्रकार होते हैं । १. मसूरक ( मसूर की तरह का ), २. त्रिपुटक ( तीन खूंट वाला ), ३. कूर्मक ( कछुये के समान ), ४. अर्धचन्द्रक ( अर्धचन्द्र की भाँति ), ५. कंचुकित ( मोटे छिलके वाला ), ६. यमक ( जुडा हुआ ), ७. कर्तक ( कटा हुआ ), ८. खरक ( खुरदुरा ), ९. सिक्थक ( दागवाला ), १०. कामण्डलुक ( कमण्डलु के समान ), ११. श्याव ( भूरे रङ्ग का ), १२. नील ( नीले रङ्ग का ) और १३. दुर्विद्ध ( अस्थान विंधा मोती )।