कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० २५ : अ० ६ ] उच्चाधिकारियों की परीक्षा ११७
(१) उत्तराध्यक्षा हस्त्यश्वरथारोहाः । तेषामन्तेवासिनः शिल्पशौच-युक्ताः सङ्ख्यायकादीनामपसर्पाः । (२) बहुमुख्यमनित्यं चाधिकरणं स्थापयेत् । (३) यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा । अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥ (४) मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातुं न शक्याः सलिलं पिबन्तः । युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥ (५) अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् । न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥ (६) आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु । यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥
( गणक ), लेखक ( क्लर्क ), रूपदर्शक ( मुद्राओं तथा मणि-मुक्ताओं का पारखी ), नीवीग्राहक ( बचत रकम को सँभालनेवाला ) और उत्तराध्यक्ष (प्रधान अधिकारी), इन सबके सहयोग से ही कार्य करें ।
( १ ) उत्तराध्यक्ष ( प्रधान अधिकारी ) उनको नियुक्त किया जाय, जो हाथी, घोड़े और रथों की सवारी में निपुण हों । उनके अधीनस्थ ऐसे आज्ञाकारी, कुशल, पवित्र एवं सदाचरणशील कार्यकर्ता हों, जो संख्यानक आदि राजकीय कर्मचारियों की प्रवृत्तियों का पता लगाने में गुप्तचरों का कार्य करें ।
( २ ) प्रत्येक विभाग में अनेक उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, किन्तु उन्हें एक ही विभाग में रहने दिया जाय ।
( ३ ) जैसे जीभ में रखे हुए मधु अथवा विष का स्वाद लिए बिना नहीं रहा जा सकता, उसी प्रकार अर्थाधिकार कार्यों पर नियुक्त पुरुष, अर्थ का थोड़ा भी स्वाद न लें, यह असंभव है ।
( ४ ) जिस प्रकार पानी में रहनेवाली मछलियाँ पानी पीती नहीं दिखाई देती हैं, उसी प्रकार अर्थकार्यों पर नियुक्त कर्मचारी भी धन का अपहरण करते हुए नहीं जाने जा सकते हैं ।
( ५ ) आकाश में उड़नेवाले पक्षियों की गति-विधि का पता लगाया जा सकता है, किन्तु धन का अपहरण करनेवाले कर्मचारियों की गति-विधि से पार पाना कठिन है ।
( ६ ) राजा, जब ऐसे अध्यक्षों का पता लगा ले, तो वह उन धनसंपन्न अधिकारियों की सारी संपत्ति को छीन ले और उन्हें उनके उच्चपदों से गिराकर निम्न