कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ )
तत्कालीन समाज के सर्वाहारी वर्ग के प्रति शेष जनता की धारणा कितनी विक्षुब्ध तथा द्वेषयुक्त थी, इसका एक उदाहरण डांगे जी ने उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि :—
“हमारे पास अनेक काम, अनेक इच्छाएँ और अनेक संकल्प हैं । बढ़ई की कामना आरे की आवाज सुनने की है । वैद्य, रोगी की कराह सुनने की अभिलाषा रखता है । ब्राह्मण को यजमान की अभिलाषा है । अपनी लकड़ी, पंखा, निहाई और भट्टी को लेकर लुहार किसी धनी की राह देख रहा है । मैं एक गायक हूँ । मेरा बाप वैद्य है । मेरी माँ अन्न कूटती है । जिस तरह से चरवाहे गायों के पीछे दौड़ते हैं, हम लोग उसी तरह से धन के पीछे दौड़ रहे हैं” ( ऋग्वेद ६।११२।१-३ ) ।
इस प्रकार सारा समाज श्रम के अभाव में दुःखी और उपयुक्त जीविका पाने के लिए विकल था । धन-संपत्ति का सारा उत्तराधिकार कुछ ही व्यक्तियों ने हड़प लिया था और शेष सारा वृहत् समाज, सारे शिल्पज्ञ, कलाकार और कारीगर आजीविका के लिये तड़प रहे थे । जन-सामान्य की इस सामूहिक माँग ने तत्कालीन समाज में एक नयी क्रांति को जन्म दिया ।
इस क्रांति का पहिला प्रभाव तो प्राचीन साम्यसंघ की एकता पर पड़ा । उसमें आत्म-विरोध बढ़ते जा रहे थे और शनैः-शनैः उसके टुकड़े-टुकड़े हो रहे थे । प्राचीन यज्ञ-गण-गोत्र के विरोध में उत्पादन के नये सम्बन्ध उग रहे थे । दास प्रथा के आधार पर निर्मित व्यक्तिगत-संपत्ति की व्यवस्था अब समानता और स्वाधीनता के आधार पर निर्मित नयी व्यवस्था के आगे ध्वस्त होने लग गयी थी । आर्य-गण अब गृह-युद्ध से बुरी तरह घिर गये थे ।
वर्ण-व्यवस्था के कारण जिस नयी आर्थिक व्यवस्था का जन्म हुआ था और जो निरन्तर ही विकसित हो रही थी उसने आर्यों की प्राचीन अखण्ड गण-व्यवस्था को पराभूत कर लिया था । अपनी स्थिति को स्थिर बनाये रखने के लिये गणों ने हवन और दान के पुराने नियमों के पालनार्थ आवाज उठायी और प्राचीन प्रथा के अनुसार उत्पादन के उपभोग, वितरण तथा उपयोग का नारा लगाया; किन्तु उनके ये उपदेश अब सफल न हो सके । यद्यपि गणों के बीच धनी और निर्धन दोनों प्रकार के लोग थे, तथापि धनी वर्ग ही लाभान्वित था । ब्रह्म-क्षत्र वर्ण के संपत्तिशाली वर्ग विशों और शूद्रों के श्रम के शोषक बने हुए थे; दासों और पशुओं का एकाधिकार स्वामित्व वे पहिले ही से प्राप्त कर चुके थे । यही कारण थे, जिससे वर्ण-भेद, वर्ग-भेद में बदल गया और आत्मयुद्ध तथा गृह-युद्ध की भावना तेजी से उमड़ पड़ी ।
२ कौ० भू०