कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
व्यक्तिगत संपत्ति का एक दुष्परिणाम यह भी हुआ कि साम्यसंघ के परिवार और घर तक विच्छिन्न हो गये । पितृसत्ता की प्रबलता ने मातृसत्ता को दबा दिया, जिसके कारण पतियों से पत्नियों का और पुत्रों से माताओं का विरोध उठ खड़ा हुआ और यद्यपि अब भी प्राचीन श्रुति को ही प्रमाणिक माना जाता रहा; किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से सूत्रग्रंथों तथा स्मृतिग्रंथों को ही अपनाया जाने लगा था ( डाँगे, पृ० १८० ) ।
विश लोकतंत्र की अवस्था अब बहुत ही दयनीय हो गई थी । संपत्तिशाली ब्रह्म-क्षत्र परिवारों ने उनको भी चूस डाला था । वे जितना ही गरीब होते जा रहे थे, उतना ही विजित दासों की ओर झुकते जा रहे थे और ब्रह्म-क्षत्र वर्ग से उनके विरोध की खाई उतनी ही चौड़ी होती जा रही थी । मेहनतकश विश वर्ग की इस दुर्दशा ने गाँवों और नगरों के विरोध को जन्म दिया । इस स्थिति से सत्ताधारी ब्रह्म-क्षत्र-वर्ग भयभीत था कि कहीं मेहनतकश शूद्र और गरीब विश मिलकर सारे समाज को उलट न दें । सारी शासनसत्ता को, व्यक्तिगत संपत्ति को तथा पितृसत्ता को नष्टकर प्राचीन समानता की स्थापना न कर दें ।
मेहनतकश श्रमिक जनता के इस विरोध, वैमनस्य एवं क्रांति ने परवर्ती साम्राज्यों जन्म दिया । यद्यपि महाभारत-युद्ध ( ३०००-२००० ई० पू० ) से पहिले हिन्दू दास शासन व्यवस्था की पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं हो सकी थी, फिर भी इतना स्पष्ट है कि अर्धं दास और अर्ध सामन्ती राज्यों की वृद्धि ने गणसंघों का उन्मूलन करना आरम्भ कर दिया था । महाभारत-युद्ध के बाद पूर्व की ओर गंगा की वादी में दास-राज्यों का अस्तित्व प्रकाश में आने लग गया था ।
अराजक और वैराज्य-संघ : निश्चित रूप से यह बताना कि भारतीय इतिहास के परवर्ती साम्राज्यों का उदय कब हुआ था, जरा कठिन है । आर्यों की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का संबंध बहुधा अफगानिस्तान, सिंधु नदी के मैदानों, दक्षिणस्थ हिमालय और पंजाब के प्रदेशों से था । यहीं पर आर्य गणों द्वारा वर्ण, संपत्ति, वर्ग और दासता को विकसित किया जाना समीचीन प्रतीत होता है । आदिम साम्य-युग की जिस गण-व्यवस्था के सम्बन्ध में पहिले बताया गया है, परवर्ती समय तक यद्यपि उनमें से बहुत गण ध्वस्त तथा क्षीण हो चुके थे, तथापि उनका अस्तित्व सर्वथा विलुप्त नहीं हुआ था, और इस प्रकार के दीर्घजीवी गणों में अर्याणी, गणार्याणी: जुवार्याणी, दो-रज्जणी, बी-रज्जणी और विरुद्ध रज्जणी आदि का नाम उल्लेखनीय है, जिनका हवाला आचारांग जैनसूत्रों में देखने को मिलता है ।