भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्र० २८ : अ० १२ ] खनिज सम्बन्धी कार्य १४१

रूपिकमष्टकं शतं, पञ्चकं शतं व्याजीं, पारीक्षिकमष्टभागिकं शतम् । पञ्चविंशतिपणमत्ययं चान्यत्र कर्तृ क्रेतृविक्रेतृपरीक्षितृभ्यः ।

(१) खन्यध्यक्षः शङ्खवज्रमणिमुक्ताप्रबालक्षारकम्मान्तान् कारयेत्, पणनव्यवहारं च ।

(२) लवणाध्यक्षः पाकमुक्तं लवणभागं प्रक्रयं च यथाकालं संगृह्णीयाद्, विक्रयाच्च मूल्यं रूपं व्याजीं च ।

(३) आगन्तुलवणं षड्भागं दद्यात् । दत्तभागविभागस्य विक्रयः । पञ्चकं शतं व्याजीं, रूपं, रूपिकं च । क्रेता शुल्कं, राजपण्यच्छेदानुरूपं च वैधरणं दद्यात् । अन्यत्रक्रेता षट्छतमत्ययं च ।

(४) विलवणमुत्तमं दण्डं दद्यात्, अनिसृष्टोपजीवी च । अन्यत्र वानप्रस्थेभ्यः । श्रोत्रियास्तपस्विनो विष्टयश्च भक्तलवणं हरेयुः ।


सौ पण पर पाँच पण राज्यभाग व्याजी और सौ पण पर आठ पण राज्यभाग पारीक्षिक कहलाता है । यदि कोई पारीक्षिक का अपहरण करे तो उसे पच्चीस पण दण्ड दिया जाय, यदि अधिक अपहरण करे तो, अपहृतधन के हिसाब से, उस पर दुगुना, चौगुना दण्ड नियत करना चाहिए । किन्तु सिक्कों को बनाने, बेचने, खरीदने और परीक्षा करने वाले अधिकारियों के लिए दण्ड-विधान की व्यवस्था कुछ दूसरी ही है ।

( १ ) खान के अध्यक्ष को चाहिए कि वह शंख, वज्र, मणि, मुक्ता, प्रवाल तथा सभी तरह के क्षारों की उत्पत्ति और उनके क्रय-विक्रय की सुव्यवस्था करे ।

( २ ) लवण के अध्यक्ष को चाहिए कि वह बिक्री के लिए तैयार नमक को और किसी दूसरी खान से कुछ शर्तों के आधार पर नियत मात्रा में उपलब्ध होने वाले नमक को ठीक समय से संग्रह कर ले, उसको चाहिए कि वह उसके विक्रय का, बिक्री से प्राप्त होने वाले मूल्य का और रूप एवं व्याजी का सुप्रबंध करे ।

( ३ ) विदेश से बिक्री के लिए आये हुए नमक का छठा भाग राजकर के रूप में देना चाहिए । जो व्यक्ति समुचित राजकर एवं तौल का टैक्स अदा करे वही उसको बेचने का अधिकारी है, और उसे पाँच प्रतिशत व्याजी, रूप तथा रूपिक भी राजकर के रूप में अदा करना चाहिए । उस माल को खरीदने वाला व्यक्ति भी राजकर अदा करे, उसकी छीजन भी वह पूरी करे । राजकीय बाजार का कोई व्यापारी यदि बाहर से नमक मँगाता है तो उससे छह प्रतिशत राजकर के अतिरिक्त जुर्माना भी अदा किया जाय ।

( ४ ) घटिया या मिलावटी नमक बेचने वाले व्यापारी को उत्तम साहस दण्ड देना चाहिए । इसी प्रकार जो राजाज्ञा के विरुद्ध नमक को बनाता है या उसका