कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) अतोऽन्यो लवणक्षारवर्गः शुल्कं दद्यात् । (२) एवं मूल्यं विभागं च व्याजीं परिघमत्ययम् । शुल्कं वैधरणं दण्डं रूपं रूपिकमेव च ॥ खनिभ्यो द्वादशविधं धातुं पण्यं च संहरेत् । एवं सर्वेषु पण्येषु स्थापयेन्मुखसंग्रहम् ॥ (३) आकरप्रभवः कोषः कोषाद्दण्डः प्रजायते । पृथिवी कोषदण्डाभ्यां प्राप्यते कोषभूषणा ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे आकरकर्मान्तप्रवर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः, आदितः द्वात्रिंशः ।
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व्यापार करता है, उसे भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । किन्तु यह नियम वानप्रस्थियों पर लागू नहीं होता है । श्रोत्रिय, बेगार ढोने वाले और तपस्वी लोग बिना कीमत दिये भी अपने उपयोग के लायक नमक ले जा सकते हैं ।
( १ ) इनके अतिरिक्त, नमक और क्षार का उपयोग करने वाले सभी लोग नमक के अध्यक्ष और क्षार के अध्यक्ष को शुल्क अदा करें ।
( २ ) इस प्रकार मूल्य, विभाग, व्याजी, परिघ, अत्यय, शुल्क, वैधरण, दण्ड, रूप, रूपिक, खनिज पदार्थ और भिन्न-भिन्न प्रकार के विक्रेय पदार्थों का संग्रह करना चाहिए । राज्यभर की सभी मंडियों में प्रमुख विक्रेय वस्तुएँ बिक्री के लिए रखी जानी चाहिए ।
( ३ ) कोष की उन्नति खान पर निर्भर है; कोष की समृद्धि से शक्तिशाली सेना तैयार की जा सकती है । इस कोषगर्भा पृथिवी को कोष और सेना से ही प्राप्त किया जा सकता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में आकरकर्मान्तप्रवर्तन नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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