कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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शोधयेत्, सीसान्वयेन भिद्यमानं शुष्कपटलैर्ध्मापयेत्, रूक्षत्वाद्विद्रुद्यमानं तैलगोमये निषेचयेत् ।
(१) आकरोद्गतं सीसान्वयेन भिद्यमानं पाकपत्राणि कृत्वा गण्डिकासु कुट्टयेत्, कन्दलीवज्रकन्दकल्के वा निषेचयेत् ।
(२) तुत्थोद्गतं गौडिकं काम्बुकं चाक्रवालिकं च रूप्यम् । श्वेतं स्निग्धं मृदु च श्रेष्ठम् । विपर्यये स्फोटनं च दुष्टम् । तत्सीसचतुर्भागेन शोधयेत् ।
(३) उद्गतचूलिकमच्छं भ्राजिष्णु दधिवर्णं च शुद्धम् ।
(४) शुद्धस्यैको हारिद्रस्य सुवर्णो वर्णकः । ततः शुल्बकाकण्युत्तराप-सारिता आ चतुःसीमान्तादिति षोडश वर्णकाः ।
(५) सुवर्णं पूर्वं निकष्य पश्चाद्वर्णिकां निकषयेत् । समरागलेखमनि-म्नोन्नते देशे निकषितम् । परिमृदितं परिलीढं नखान्तराद्वा गैरिकेणाव-
जंगली कण्डों की आग में तपाना चाहिए । यदि शुद्ध करते समय रूखापन आ जाने से वह फटने लगे तो तेल और गोबर को मिलाकर बार-बार उसमें भावना देनी चाहिए ।
( १ ) खान से निकाले हुए सोने को भी सीसा मिलाकर शुद्ध किया जाना चाहिए । यदि सीसा मिलाने से वह फटने लगे तो उसके साथ पके हुए पत्ते मिला लिए जाँय और तब उसको लकड़ी के तख्ते पर रखकर खूब कूटा जाना चाहिए । अथवा कन्दलीलता, श्रीवेर और कमलजड़ का क्वाथ बनाकर तब तक उस सुवर्ण को उसमें भिगोया जाय, जब तक कि उसका फटना दूर नहीं होता है ।
( २ ) चाँदी चार प्रकार की होती है : १. तुत्थोद्गत ( तुत्थ नामक पर्वत से उत्पन्न, चमेली पुष्प के समान ), २. गौडिक ( असम में उत्पन्न, तगरपुष्प की आकृति की ), ३. कांबुक ( कांबु पर्वत से उत्पन्न ) और ४. चाक्रवालिक ( चक्रवाल खान से उत्पन्न, कन्दपुष्प के समान ) । श्वेत, स्निग्ध और मुलायम चाँदी सर्वोत्तम समझी जाती है । इनके विपरीत काली, रूक्ष, खरखरी और फटी हुई चाँदी खराब होती है । खराब चाँदी में चौथाई सीसा डालकर उसको शुद्ध करना चाहिए ।
( ३ ) जिसमें बुदबुदे उठे हों, जो स्वच्छ, चमकदार और दही के समान श्वेत हो, वह शुद्ध चाँदी होती है ।
( ४ ) हल्दी के समान स्वच्छ, शुद्ध सुवर्ण का सोलह माष का वर्णक शुद्ध वर्णक कहलाता है । उसमें चतुर्थांश तांबा मिला दिया जाय और उतना ही हिस्सा सुवर्ण कम कर दिया जाय; इसी तरह सोने का हिस्सा कम करके और तांबे का हिस्सा मिलाकर सोलह वर्णक बन जाते हैं । ये सोलहों मिश्र वर्णक कहलाते हैं और उनमें शुद्ध वर्णक को जोड़ दिया जाय तो सत्रह वर्णक हो जाते हैं ।
( ५ ) वर्णक की परीक्षा करने से पूर्व सुवर्ण की परीक्षा कर लेनी चाहिए; सोने को पहिले कसौटी पर घिसना चाहिये और तत्पश्चात् वर्णक को घिसने के बाद