कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) सस्ययाचनमन्यतः प्रामित्यकम् । (२) तदेव प्रतिदानार्थमापमित्यकम् । (३) कुट्टकरोचकसक्तुशुक्तपिष्टकर्म तज्जीवनेषु तैलपीडनमौरभ्र-चाक्रिकेष्विक्षूणां च क्षारकर्म सिंहनिका । (४) नष्टप्रस्मृतादिरन्यजातः । (५) विक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषं च व्ययप्रत्यायः । (६) तुलामानान्तरं हस्तपूरणमुत्करो व्याजी पर्यूषितं प्रार्जितं चोपस्थानमिति । (७) धान्यस्नेहक्षारलवणानाम् । (८) धान्यकल्पं सीताध्यक्षे वक्ष्यामः । सर्पिस्तैलवसामज्जानः स्नेहाः । (९) फाणितगुडमत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराः क्षारवर्गः ।
( १ ) किसी मित्र आदि से सहायता रूप में ऐसा अन्न लेना, जो फिर लौटाया न जाय, प्रामित्यक कहलाता है ।
( २ ) ब्याज सहित पुनः लौटा देने के वायदे पर लिया हुआ अन्न आदि कर्ज । आपमित्यक कहलाता है ।
( ३ ) कूट-पीस कर, छान-बीन कर, सत्तू पीस कर, गन्ना आदि को पेर कर, आटा पीस कर, तिलों का तेल निकाल कर, भेड़ों के बाल काट कर और गुड़, राव, शक्कर आदि पर आजीविका निर्भर करने वाले लोगों से जो कर लिया जाता है उसे सिंहनिका कहते हैं ।
( ४ ) नष्ट हुए तथा भूले हुए धन का नाम अन्यजात है ।
( ५ ) व्ययप्रत्याय तीन प्रकार का होता है : १, विक्षेपशेष (सेना के व्यय से बचा हुआ धन), २, व्यधितशेष (औषधालय के व्यय से बचा धन) और ३, अन्तरारम्भशेष (दुर्ग आदि की मरम्मत से बचा हुआ धन) सब व्ययप्रत्याय धन है ।
( ६ ) बाट-तराजू की पसंघा से, तौलने के बाद मुट्ठी-दो-मुट्ठी दिया हुआ अधिक अन्न, तौली या गिनी हुई वस्तु में कोई दूसरी ही वस्तु मिला देना, छीजन के रूप में ली हुई वस्तु, पिछले वर्ष का बकाया और चतुराई से उपार्जित धन उपस्थान कहलाता है ।
( ७ ) अब इसके उपरान्त धान्य, स्नेह, क्षार और लवण का निरूपण किया जाता है ।
( ८ ) इनमें धान्यवर्ग के पदार्थों का विस्तृत विवरण आगे 'सीताध्यक्ष' नामक प्रकरण में किया जायेगा । घी, तेल, वसा और मज्जा, ये चार प्रकार के स्नेह पदार्थ हैं ।
( ९ ) गन्ने से बने : राभ, गुड़, गुड़खांड़, खांड और शक्कर में क्षारवर्ग के पदार्थ हैं ।