भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ३१कोष्ठागाराध्यक्षः
अध्याय १५

(१) कोष्ठागाराध्यक्षः सीताराष्ट्रक्रयिमपरिवर्तकप्रामित्यकापमित्यक-सिंहनिकान्यजातव्ययप्रत्यायोपस्थानान्युपलभेत । (२) सीध्यक्षोपनीतः सस्यवर्णकः सीता । (३) पिण्डकरः, षड्भागः सेनाभक्तं, बलिः, करः, उत्सङ्गः, पार्श्वं, पारिहीणिकम्, औपायनिकं, कौष्ठेयकं च राष्ट्रम् । (४) धान्यमूल्यं कोशनिर्हारः प्रयोगप्रत्यादानं च क्रयिमम् । (५) सस्यवर्णानामर्घान्तरेण विनिमयः परिवर्तकः ।


कोष्ठागार का अध्यक्ष

( १ ) कोष्ठागार ( कोठार ) के अध्यक्ष ( कोठारी ) को चाहिए कि वह १. सीता, २. राष्ट्र, ३. क्रयिम, ४. परिवर्तक, ५. प्रामित्यक, ६. आपमित्यक, ७. सिंहनिका, ८. अन्यजात, ९. व्ययप्रत्याय और १०. उपस्थान, इन दस बातों के संबंध में अच्छी जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) राजकीय कर के रूप में एकत्र धान्य को सीता कहा जाता है; उसको एकत्र करने वाले अधिकारी को सीताध्यक्ष कहते हैं । कोष्ठागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह शुद्ध एवं पूरा सीता लेकर उसको व्यवस्था से रखे ।

( ३ ) राष्ट्र के दस भेद होते हैं : १. पिण्डकर ( गाँवों से वसूल किया जाने वाला नियत राजकीय कर ) २. षड्भाग ( राजा को दिया जाने वाला अन्न का छठा भाग ), ३. सेनाभक्त ( युद्धकाल में विशेष रूप से निर्धारित कर ), ४. बलि ( छठे भाग के अतिरिक्त कर ), ५. कर ( जलाशयों और जंगलों का कर ), ६. उत्संग ( राजकुमार के जन्मोत्सव पर दी जाने वाली भेंट ), ७. पार्श्व ( नियत कर के अतिरिक्त कर ) ८. पारिहीणिक ( गाय बच्छियों के नुकसान पर दंड रूप में प्राप्त धन ), ९. औपायनिक ( भेंट स्वरूप प्राप्त धन ) और १०. कौष्ठेयक ( राजधन से बने हुए तालाबों तथा बगीचों का कर ) ।

( ४ ) क्रयिक तीन प्रकार का होता है : १. धान्यमूलक ( धान्य को बेच कर प्राप्त हुआ धन ), २, कोशनिर्हार ( धन देकर खरीदा हुआ अन्न ) और ३. प्रयोग-प्रत्यादान ( ब्याज आदि से प्राप्त धन ) ।

( ५ ) एक अनाज देकर उसके बदले दूसरा अनाज लेना परिवर्त्तक कहलाता है ।