कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १५६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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चेल्लं बोल्लनं शिर उत्सङ्गो मक्षिका स्वकायप्रेक्षा दृतिरुदकशेरावमग्निष्ठ-
मिति काचं विद्यात् ।
(१) राजतानां विस्रं मलग्राहि परुषं प्रस्तीतं विवर्णं वा दुष्टमिति विद्यात् ।
(२) एवं नवं च जीर्णं च विरूपं चापि भाण्डकम् ।
परीक्षेतार्त्ययं चैषां यथोद्दिष्टं प्रकल्पयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे विशिखायां सौवर्णिकप्रचारो नाम चतुर्दशोऽध्यायः, आदितश्चतुस्त्रिंशः ।
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माल को लेकर खोटा माल भिड़ा देना, ) २. प्रतिमान ( बदली करके चुरा लेना ), ३. अग्नि के बीच से चुरा लेना, ४. गाण्डिका ( पीटने के बहाने ), ५. भण्डिका ( घरिया में रखने के बहाने ), ६. अधिकरणी ( लोहे के पात्र में रखने के बहाने ), ७. पिच्छ ( मोर-पेंच से चुराना ), ८. सूत्र ( कांटे की डोरी के बहाने ), ९. चेल्ल ( वस्त्र में छिपा लेना ), १०. बोल्लन ( कोई किस्सा छेड़कर ) ११. उत्संग ( गोद या गुप्त अंग में छिपाकर ), १२. मक्षिका ( मक्खी उड़ाने के बहाने पिघली हुई धातु को अपने अङ्ग में लगा देना ) तथा १३. पसीना, १४. धौकनी, १५. जल का शकोरा और १६. आग में डाले हुये खोटे माल आदि के बहाने से सोना-चाँदी चुराया जा सकता है ।
( २ ) मिलावटी चाँदी के आभूषणों में पाँच प्रकार के दोष होते हैं : १. विस्र होना ( दुर्गन्ध ), २. मलिन हो जाना, ३. कठोर हो जाना, ४. खुरदुरा हो जाना और ५. रङ्ग बदल जाना ।
( १ ) इस प्रकार नये और पुराने विरूप हुए पात्रों या आभूषणों की भली-भांति परीक्षा कर लेनी चाहिए; और फिर मिलावट के अनुसार ही अपराधियों पर दण्ड की व्यवस्था करनी चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में विशिखा में सौवर्णिक-प्रचार नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।
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