कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ३१ : अ० ३५ ] कोष्ठगाराध्यक्ष के कर्तव्य १६१
(१) पञ्चभागवृद्धिर्भृष्टानाम् । कलायो द्विगुणः लाजा भरुजाश्च । षट्कं तैलमतसीनाम् । निम्बकुशाम्रकपित्थादीनां पञ्चभागः । चतुर्भागिकास्तिलकुसुम्भमधूकेङ्गुदीस्नेहाः ।
(२) कार्पासक्षौमाणां पञ्चपले पलसूत्रम् ।
(३) पञ्चद्रोणे शालीनां द्वादशाढकं तण्डुलानां कलभभोजनम्, एकादशकं व्यालानां, दशकमौपवाह्यानाम्, नवकं सान्नाह्यानाम्, अष्टकं पत्तीनां, सप्तकं मुख्यानां, षट्कं देवीकुमाराणाम्, पञ्चकं राज्ञाम् । अखण्डपरिशुद्धानां वा तण्डुलानां प्रस्थः ।
(४) चतुर्भागः सूपः, सूपषोडशो लवणस्यांशः, चतुर्भागः सर्पिषः तैलस्य वा, एकमार्यभक्तम् । प्रस्थषड्भागः सूपः अर्धस्नेहमवराणाम् । पादोनं स्त्रीणाम् । अर्धं बालानाम् ।
हैं । पकाये जाने पर विरञ्जफूल चावल और बासमती पंचगुने हो जाते हैं । खेत से अधकच्ची हालत में काटा गया अन्न और व्रीहि धान पकाने पर दुगुने ही बढ़ पाते हैं । उन्हें कुछ अच्छी अवस्था में खेत से काटा जाय तो वे ढाई गुना भी बढ़ सकते हैं ।
( १ ) यदि वे भूने जांय तो उनका पंचमांश बढ़ जाता है । भुने हुए मटर, धान और जौ दुगुने हो जाते हैं । पेरने पर अलसी में छटा भाग ही तेल निकलता है । निंबौरी, कुशा; आम की गुठली और कैथे में पाँचवां हिस्सा ही तेल निकलता है । तिल, कुसुम्भ, महुआ और इंगुदी में चौथा हिस्सा ही तेल निकलता है ।
( २ ) पाँच पल कपास और रेशम में एक पल सूत तैयार होता है ।
( ३ ) पाँच द्रोण ( २० आढक ) धान में से कूट-छाटकर जब बारह आढक चावल शेष रह जाता है तब वह हाथी के बच्चों के खाने योग्य होता है । वही बीस आढक धान अधिक साफ कर देने पर जब ग्यारह आढक बचा रह जाय तो उन्मत्त हाथियों के खाने योग्य; जब दसवाँ हिस्सा रह जाय तो राज-सवारी के हाथियों के खाने योग्य; जब नवाँ हिस्सा रह जाय तो युद्धोपयोगी हाथियों के खाने योग्य; आठवाँ हिस्सा रह जाय तो पैदल सेना के भोजन योग्य; जब सातवाँ हिस्सा रह जाय तो प्रधान सेनापति के योग्य; जब छठा हिस्सा रह जाय तो रानियों एवं राजकुमारों के भोजन योग्य और जब साफ करते-करते बीस आढक में से पाँच आढक ही बचा रह जाय तो वह राजाओं के भोजन योग्य होता है । अथवा उस बीस आढक में से साफ और साबूत एक प्रस्थ दाना निकालकर राजा के उपयोग के लिए लेना चाहिए ।
( ४ ) प्रस्थ का चौथा हिस्सा दाल, दाल का सोलहवां हिस्सा नमक, दाल का चौथा हिस्सा घी या तेल; इतना एक आर्य की भोजन-सामग्री है । छोटी स्थिति
११ कौ०