कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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(१) तेषामाढकप्रस्थकुडवाश्चतुर्भागावराः । (२) षोडशद्रोणा खारी, विंशतिद्रोणिकः कुम्भः, कुम्भैर्दशभिर्वहः । (३) शुष्कसारदारुमयं समं चतुर्भागशिखं मानं कारयेत् । अन्तःशिखं वा । रसस्य तु । (४) सुरायाः पुष्पफलयोः तुषाङ्गाराणां सुधायाश्च शिखामानं द्विगुणोत्तरा वृद्धिः । (५) सपादपणो द्रोणमूल्यम् । आढकस्य पादोनः । षण्माषकाः प्रस्थस्य । माषकः कुडवस्य । (६) द्विगुणं रसादीनां मानमूल्यम् । (७) विंशतिपणाः प्रतिमानस्य । तुलामूल्यं त्रिभागः ।
(१) द्रोण का चौथाई आढक, आढक का चौथाई प्रस्थ और प्रस्थ का चौथाई कुडव होता है ।
(२) सोलह द्रोण की एक खारी, बीस द्रोण का एक कुम्भ और दस कुम्भ परिमाण का एक वह होता है, यथा :
१६ द्रोण = १ खारी
२० द्रोण / १ १/४ खारी = १ कुम्भ
१० कुम्भ = १ वह
(३) अनाज मापने के लिए बढ़िया सूखी लकड़ी का ऐसा मान बनवाया जाय, कि जितना अनाज उसमें समा सके, उसका चतुर्थांश उसकी गर्दन में आ जाय, अथवा गर्दन बनाकर ऊपर से नीचे तक उसकी एक जैसी बनावट रहे, उसका मुँह खुला रहना चाहिए । घी-तेल मापने के लिए भी ऐसा ही मान बनवाया जाय ।
(४) शराब, फल, फूल, भूसी, कोयला, और चूना-कलई, इन छह पदार्थों को मापने के लिए जो बर्तन बनवाया जाय उसके ऊपर का हिस्सा, नीचे के हिस्से से दुगुना चौड़ा होना चाहिए और उस पर गर्दन भी बनी होनी चाहिए ।
(५) लकड़ी के बने एक द्रोण परिमाण बर्तन का मूल्य सवा पण होना चाहिए । इसी प्रकार एक आढक परिमाण के बर्तन की कीमत पौन पण, एक प्रस्थ के वर्तन की छह माषक और एक कुडव परिमाण वाले वर्तन की कीमत एक माषक होनी चाहिए ।
(६) घी-तेल आदि द्रव पदार्थों को मापने वाले बर्तनों की कीमत अनाज मापने वाले बर्तनों से दुगुनी होनी चाहिए ।
(७) चौदह प्रकार के सम्पूर्ण बाटों की कीमत बीस पण और सम्पूर्ण तुलाओं की कीमत उसके तिहाई अर्थात् ६ २/३ पण होती है ।