कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 263, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्र० ३५ : अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७९
(१) चातुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत्। अप्रतिविद्धस्यात्ययः सपादः सप्तविंशतिपणः। प्रातिवेधनिकं काकणिकमहरहः पौतवाध्यक्षाय दद्युः। (२) द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिषश्चतुःषष्टिभागस्तैलस्य। पञ्चाशद्भागो मानस्त्रावो द्रवाणाम्। (३) कुडवार्धचतुरष्टभागानि मानानि कारयेत्। (४) कुडबाश्चतुराशीतिर्वारकः सर्पिषो मतः। चतुःषष्टिस्तु तैलस्य पादश्च घटिकानयोः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे तुलामानपौतवं नामैकोनविंशोऽध्यायः, आदित एकोनचत्वारिंशः।
—: ० :—
(१) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि हर चौथे मास वह तुला, बाट, द्रोण आदि का निरीक्षण करे। जो व्यापारी निर्धारित समय पर जाँच न करवावे उसे सवा सत्ताईस पण जुर्माना देना चाहिए। व्यापारियों को चाहिए कि वे एक काकणी प्रतिदिन के हिसाब से चार मास की एक-सौ-बीस काकणी निरीक्षण-कर के रूप में पौतवाध्यक्ष को दें।
(२) यदि गरम घी खरीदा जाय तो उसका बत्तीसवाँ हिस्सा और तेल खरीदा जाय तो उसका चौंसठवाँ हिस्सा छीजन के रूप में अधिक (व्याजी) लेना चाहिए। द्रव पदार्थों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन होती है।
(३) छोटी तोल के लिए एक कुडव, आधा कुडव, चौथाई कुडव तथा आठवाँ हिस्सा कुडव, ये चार प्रकार के बाट और माप बनवाने चाहिए।
(४) घी तोलने के लिए चौरासी कुडव परिमाण का एक वारक और तेल तोलने के लिए चौसठ कुडव का एक वारक माना गया है। इक्कीस कुडव की एक घृतघटिका और सोलह कुडव की एक तैलघटिका होती है।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तुलामानपौतव नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—