कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० ३५ : अ० १९ ] तौल और माप का अध्यक्ष १७९
(१) चातुर्मासिकं प्रातिवेधनिकं कारयेत्। अप्रतिविद्धस्यात्ययः सपादः सप्तविंशतिपणः। प्रातिवेधनिकं काकणिकमहरहः पौतवाध्यक्षाय दद्युः। (२) द्वात्रिंशद्भागस्तप्तव्याजी सर्पिषश्चतुःषष्टिभागस्तैलस्य। पञ्चाशद्भागो मानस्त्रावो द्रवाणाम्। (३) कुडवार्धचतुरष्टभागानि मानानि कारयेत्। (४) कुडबाश्चतुराशीतिर्वारकः सर्पिषो मतः। चतुःषष्टिस्तु तैलस्य पादश्च घटिकानयोः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे तुलामानपौतवं नामैकोनविंशोऽध्यायः, आदित एकोनचत्वारिंशः।
—: ० :—
(१) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि हर चौथे मास वह तुला, बाट, द्रोण आदि का निरीक्षण करे। जो व्यापारी निर्धारित समय पर जाँच न करवावे उसे सवा सत्ताईस पण जुर्माना देना चाहिए। व्यापारियों को चाहिए कि वे एक काकणी प्रतिदिन के हिसाब से चार मास की एक-सौ-बीस काकणी निरीक्षण-कर के रूप में पौतवाध्यक्ष को दें।
(२) यदि गरम घी खरीदा जाय तो उसका बत्तीसवाँ हिस्सा और तेल खरीदा जाय तो उसका चौंसठवाँ हिस्सा छीजन के रूप में अधिक (व्याजी) लेना चाहिए। द्रव पदार्थों में पाँचवाँ हिस्सा छीजन होती है।
(३) छोटी तोल के लिए एक कुडव, आधा कुडव, चौथाई कुडव तथा आठवाँ हिस्सा कुडव, ये चार प्रकार के बाट और माप बनवाने चाहिए।
(४) घी तोलने के लिए चौरासी कुडव परिमाण का एक वारक और तेल तोलने के लिए चौसठ कुडव का एक वारक माना गया है। इक्कीस कुडव की एक घृतघटिका और सोलह कुडव की एक तैलघटिका होती है।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में तुलामानपौतव नामक उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त।
—: ० :—
| प्रकरण ३६ | देशकालमानम् |
|---|---|
| अध्याय २० |
(१) मानाध्यक्षो देशकालमानं विद्यात् । (२) अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट् । ता अष्टौ लिक्षा । ता अष्टौ यूकामध्यः । ते अष्टौ यवमध्यः । अष्टौ यवमध्याः अङ्गुलम् । (३) मध्यमस्य पुरुषस्य मध्यमाया अङ्गुल्या मध्यप्रकर्षो वाऽङ्गुलम् । (४) चतुरङ्गुलो धनुर्ग्रहः । अष्टाङ्गुला धनुर्मुष्टिः । (५) द्वादशाङ्गुला वितस्तिः, छायापौरुषं च । चतुर्दशाङ्गुलं शमः शलः परिरयः पदं च । द्विवितस्तिररत्निः प्राजापत्यो हस्तः । (६) सधनुर्ग्रहः पौतवविवीतमानम् । सधनुर्मुष्टिः किष्कुः कंसो वा ।
देश और काल का मान
( १ ) पौतवाध्यक्ष को चाहिए कि वह देश और काल का मान भी अच्छी तरह से जान ले । उसकी जानकारी के सूत्र इस प्रकार हैं :
( २ ) ८ परमाणु = १ धूलकण
८ धूलकण = १ लिक्षा
८ लिक्षा = १ यूकामध्य
८ यूकामध्य = १ यवमध्य
८ यवमध्य = १ अंगुल
( ३ ) अथवा मध्यम कोटि के पुरुष की मध्यमा की मोटाई का माप एक अंगुल बराबर होता है ।
( ४ ) ४ अंगुल = १ धनुर्ग्रह
$$\left.\begin{aligned} &\text{८ अंगुल} \ &\text{२ धनुर्ग्रह} \end{aligned}\right}$$ = १ धनुर्मुष्टि
(पाठ संरचना: ८ अंगुल / २ धनुर्ग्रह = १ धनुर्मुष्टि)
( ५ )
$$\left.\begin{aligned} &\text{१२ अंगुल} \ &\text{३ धनुर्ग्रह} \ &\text{१ ½ धनुर्मुष्टि} \end{aligned}\right}$$ = १ वितस्ति या १ छायापुरुष
(पाठ संरचना: १२ अंगुल / ३ धनुर्ग्रह / १ ½ धनुर्मुष्टि = १ वितस्ति या १ छायापुरुष)
१४ अंगुल = १ शम, शल परिरय या पद ( पैर )
२ वितस्ति = १ अरत्नि, प्राजापत्य हाथ
( ६ ) २८ अङ्गुल = १ हाथ ( विवीत और पौतव नापने के लिये )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस
प्र० ३६ : अ० २० ] देश और काल का मान १४१
(१) द्विचत्वारिंशदङ्गुलस्तक्षणः क्राकचिककिष्कुः स्कन्धावारदुर्ग-राजपरिग्रहमानम् । चतुःपञ्चाशदङ्गुलः कुप्यवनहस्तः । (२) चतुरशीत्यङ्गुलो व्यामो रज्जुमानं खातपौरुषं च । (३) चतुररत्निर्दण्डो धनुर्नालिका पौरुषं च । (४) गार्हपत्यमष्टशताङ्गुलं धनुः पथिप्राकारमानम् । पौरुषं च अग्निचित्यानाम् । (५) षट्कंसो दण्डो ब्रह्मदेयातिथ्यमानम् । दशदण्डा रज्जुः । द्विरज्जुकः परिदेशः । त्रिरज्जुकं निवर्त्तनम् । (६) एकतो द्विदण्डाधिको बाहुः द्विधनुःसहस्रं गोरुतम् । चतुर्गोरुतं योजनम् । इति देशमानम् । (७) कालमानमत ऊर्ध्वम् । तुटो लवो निमेषः काष्ठा कला नालिका
( १ ) ४२ अङ्गुल = १ हाथ ( छावनी आदि में बढ़ई के उपयोगार्थ )
३२ अङ्गुल = १ किष्कु या कंस ( छावनी आदि में लकड़ी चीरने के लिये )
५४ अङ्गुल = १ हाथ (जंगली लकड़ी और पदार्थ नापने के लिये)
( २ ) ८४ अङ्गुल = १ हाथ ( रस्सी, खाई और कुआँ नापने के लिए )
( ३ ) ४ अरत्नि = १ दण्ड, धनु, नालिका, पौरुष
( ४ ) १०८ अङ्गुल = १ गार्हपत्यधनु ( विश्वकर्मा द्वारा निश्चित, सड़क, किला एवं परकोटा नापने के लिए )
१०८ अङ्गुल = १ पौरुष ( यज्ञसम्बन्धी कार्यों के लिए )
( ५ ) ६ कंस } = १ दण्ड ( ब्राह्मण आदि को भूमिदान देने के लिए )
८ हाथ }
१० दण्ड } = १ रज्जु
४ अरत्नि }
२ रज्जु = १ परिदेश
३ रज्जु } = १ निवर्त्तन
१३ परिदेश }
( ६ ) ३० + ३२ दण्ड = १ बाहु ( पूरा हाथ )
६६६ २/३ निवर्त्तन } = १ गोरुत ( १ कोश )
२००० धनु }
४ गोरुत = १ योजन
यहाँ तक देश-मान का निरूपण किया गया है ।
( ७ ) इसके बाद काल-मान का निरूपण किया जाता है । तुट, लव, निमेष,
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
मुहूर्तः पूर्वापरभागौ दिवसो रात्रिः पक्षो मास ऋतुरयनं संवत्सरो युगमिति कालः ।
(१) निमेषचतुर्भागस्तुटः ।
(२) द्वौ त्रुटौ लवः ।
(३) द्वौ लवौ निमेषः ।
(४) पञ्च निमेषाः काष्ठाः ।
(५) त्रिंशत् काष्ठाः कला ।
(६) चत्वारिंशत् कला नाडिका ।
(७) सुवर्णमाषकाश्चत्वारश्चतुरंगुलायामाः कुम्भच्छिद्रकाढकमम्भसो वा नालिका ।
(८) द्विनालिको मुहूर्तः । पञ्चदशमुहूर्तो दिवसो रात्रिश्च चैत्रे मास्याश्वयुजे च मासि भवतः । ततः परं त्रिभिर्मुहूर्तैरन्यतरः षण्मासं वर्धते ह्सते चेति ।
(९) छायायामष्टपौरुष्यामष्टादशभागच्छेदः, षट्पौरुष्यां चतुर्दश-
काष्ठा, कला, नालिका, मुहूर्त, पूर्वाह्ण, अपराह्न, दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर और युग, काल के ये सत्रह विभाग हैं ।
( १ ) निमेष = पलक मारने तक का समय, त्रुटि = निमेष का चौथा हिस्सा
( २ ) २ त्रुटि = १ लव
( ३ ) २ लव = १ निमेष
( ४ ) ५ निमेष = १ काष्ठा
( ५ ) ३० काष्ठा = १ कला
( ६ ) ४० कला = १ नालिका
( ७ ) अथवा एक घड़े में चार सुवर्णमाषक के बराबर चौड़ा और चार अंगुल लम्बा छेद बनाकर इतने ही परिमाण की एक नली घड़े में लगा दी जाय, उस घड़े में एक आढ़क जल भर दिया जाय । वह जल उस नली के द्वारा जितने समय में बाहर निकले, उतने समय को नलिका कहते हैं ।
२ नालिका = १ मुहूर्त
१५ मुहूर्त = १ दिन या १ रात
( ८ ) इस मान के दिन और रात केवल चैत तथा आश्विन मास में होते हैं । इसके बाद छह-मास तक दिन बढ़ता और रात्रि घटती है, दूसरे छह महीने तक रात्रि बढ़ती है और दिन घटता रहता है ।
( ९ ) जब धूपघड़ी की छाया ९६ अङ्गुल लम्बी हो तो दिन का अठारहवां भाग समाप्त हुआ समझना चाहिए, ७२ अङ्गुल छाया रहने पर दिन का चौदहवां भाग,
प्र० ३६ : अ० २० ] देश और काल का मान १८३
भागः, चतुष्पौरुष्यामष्टभागः, द्विपौरुष्यां षड्भागः, पौरुष्यां चतुर्भागः, अष्टाङ्गुलायां त्रयोदशभागाः, चतुरङ्गुलायामष्टभागाः, अच्छाया मध्याह्न इति । (१) परावृत्ते दिवसे शेषमेव विद्यात् । (२) आषाढे मासि नष्टच्छायो मध्याह्नो भवति । अतः परं श्रावणादीनां षण्मासानां द्वयङ्गुलोत्तरा माघादीनां द्वयङ्गुलावरा छाया इति । (३) पञ्चदशाहोरात्राः पक्षः । सोमाप्यायनः शुक्लः सोमावच्छेदनो बहुलः । (४) द्विपक्षो मासः । त्रिंशदहोरात्रः प्रकर्ममासः । सार्धः सौरः । अर्धन्यूनश्चान्द्रमासः । सप्तविंशतिर्नक्षत्रमासः । द्वात्रिंशद् मलमासः । पञ्चत्रिंशदश्ववाहायाः । चत्वारिंशद्धस्तिवाहायाः । (५) द्वौ मासावृतुः । श्रावणः प्रोष्ठपदश्च वर्षाः । आश्वयुजः कार्तिकश्च
४८ अङ्गुल लम्बी रहने पर आठवां हिस्सा, २४ अङ्गुल लम्बी रहने पर छठा हिस्सा, १२ अङ्गुल लम्बी रहने पर चौथा हिस्सा, ८ अङ्गुल लम्बी रहने पर दिन के दस भागों में तीसरा हिस्सा, चार अङ्गुल लम्बी रह जाने पर आठ भागों में तीसरा हिस्सा और जब छाया बिल्कुल न रहे तो मध्याह्न समझना चाहिए ।
(१) मध्याह्न अर्थात् बारह बजे के बाद उक्त छाया-मान के अनुसार दिन का शेष भाग समझना चाहिए ।
(२) आषाढ़ के महीने की दोपहरी ( मध्याह्न ) छायारहित होती है । श्रावण से पौष तक मध्यान्ह में दो अङ्गुल छाया अधिक रहती है, और फिर माघ से ज्येष्ठ तक दो अङ्गुल कम हो जाती है ।
(३) पन्द्रह दिन-रात का एक पक्ष होता है । जिस पक्ष में चन्द्रमा बढ़ता रहता है उसे शुक्लपक्ष और जिस पक्ष में चन्द्रमा घटता है उसे कृष्ण ( बहुल ) पक्ष कहते हैं ।
(४) दो पक्ष का एक महीना होता है । वेतन देने के लिए तीस दिन-रात का एक महीना माना जाता है । साढ़े तीस दिन-रात का एक सौर मास होता है । साढ़े उनतीस दिन-रात का एक चान्द्रमास होता है । सत्ताईस दिन-रात का एक नक्षत्र-मास होता है । बत्तीस दिन-रात का एक मलीमास होता है । पैंतीस दिन रात का महीना घोड़ों के सईसों को वेतन देने के उपयोग में लाया जाता है । हाथियों की सेवा में नियुक्ति कर्मचारियों का एक महीना, चालीस दिन-रात का होता है ।
(५) दो मास की एक ऋतु होती है । श्रावण-भादों में वर्षा ऋतु होती है । आश्विन-कार्तिक में शरद ऋतु होती है । मार्गशीर्ष-पौष में हेमन्त ऋतु होती है ।
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
शरत् । मार्गशीर्षः पौषश्च हेमन्तः । माघः फाल्गुनश्च शिशिरः । चैत्रो वैशाखश्च वसन्तः । ज्येष्ठामूलीय आषाढश्च ग्रीष्मः ।
(१) शिशिराद्युत्तरायणम् । वर्षादि दक्षिणायनम् ।
(२) द्वचयनः संवत्सरः । पञ्चसंवत्सरो युगमिति ।
(३) दिवसस्य हरत्यर्कः षष्टिभागमृत्तौ ततः ।
करोत्येकमहश्छेदं तथैवैंकं च चन्द्रमाः ॥
एवमर्धतृतीयानामब्दानामधिमासकम् ।
ग्रीष्मे जनयतः पूर्वं पञ्चाब्दान्ते च पश्चिमम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे देशकालमानं नाम विंशोऽध्यायः, आदितश्चत्वारिंशः ।
—: ० :—
माघ—फाल्गुल में शिशिर ऋतु होती है । चैत्र—वैशाख में वसन्त ऋतु होती है । ज्येष्ठ-आषाढ में ग्रीष्म ऋतु होती है ।
(१) शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म उत्तरायण और वर्षा, शरद् तथा हेमन्त दक्षिणायन कहलाते हैं ।
(२) उत्तरायण और दक्षिणायन दोनों का एक संवत्सर होता है । पाँच संवत्सरों का एक युग होता है ।
(३) प्रतिदिन सूर्य एक घटिका छेद करता है, इस क्रम से वह एक वर्ष में छह दिन, दो वर्ष में बारह दिन और ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन अधिक बना लेता है । इसी प्रकार चन्द्र भी प्रत्येक ऋतु में एक-एक दिन कम करता जाता है, जिससे ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन कम हो जाते हैं । इस दृष्टि से सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार एक महीने की कमी-बेशी हो जाती है । इस गणना के अनुपात से प्रति ढाई वर्ष बाद ग्रीष्म ऋतु में प्रथम मलिमास और प्रति पाँच वर्ष के बाद हेमन्त ऋतु में दूसरा मलिमास, सूर्य तथा चन्द्रमा बनाते हैं। यही मलिमास अधिकमास कहलाता है, जो ढाई वर्ष में एक महीने के अन्तर को पूरा कर देता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में देशकालमान नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ३७ |
|---|
| अध्याय २१ |
शुल्काध्यक्षः
(१) शुल्काध्यक्षः शुल्कशालां ध्वजं च प्राङ्मुखम् उदङ्मुखं वा महाद्वाराभ्याशे निवेशयेत् । (२) शुल्कादायिनश्चत्वारः पञ्च वा सार्थोपयातान् वणिजो लिखेयुः—के कुतस्त्याः कियत्पण्याः क्व चाभिज्ञानमुद्रा वा कृतेति । (३) अमुद्राणामत्ययो देयद्विगुणः । (४) कूटमुद्राणां शुल्काष्टगुणो दण्डः । (५) भिन्नमुद्राणामत्ययो घटिकाः स्थाने स्थानम् । (६) राजमुद्रापरिवर्तने नामकृते सपादपणिकं वहनं दापयेत् । (७) ध्वजमलोपस्थितस्य प्रमाणमर्घं च वैदेहकाः पण्यस्य ब्रूयुः—एतत्प्रमाणेनार्घेण पण्यमिदं कः क्रेतेति । त्रिरुद्घोषितमर्थिभ्यो दद्यात् । क्रेतृसंघर्षे मूल्यवृद्धिः । सशुल्का कोशं गच्छेत् ।
शुल्क का अध्यक्ष
( १ ) शुल्क का अध्यक्ष शुल्कशाला ( चुंगीघर ) का निर्माण करवावे, उसके पूर्व तथा उत्तर की ओर, प्रधान द्वार के पास, शुल्कशाला की पहिचान के लिए एक पताका लगवा दे ।
( २ ) शुल्कशाला में चार-पाँच कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जो माल को लाने-ले जाने वाले व्यापारियों का नाम, उनकी जाति, उनका निवास स्थान, माल का विवरण और उस पर कहाँ-कहाँ की मुहर लगी है, इसका विवरण लिखें ।
( ३ ) जिन व्यापारियों के माल पर मुहर न लगी हो, उनको जितनी चुंगी ( शुल्क ) देनी चाहिए, उन पर उसका दुगुना जुर्माना किया जाय ।
( ४ ) जिन व्यापारियों ने अपने माल पर नकली मुहर लगाई है उन पर चुंगी का आठ गुना जुर्माना ठोकना चाहिए ।
( ५ ) जो व्यापारी मुहर लगाकर उसको मिटा दे, उन्हें तीन घड़ी तक ( ढाई घड़ी का एक घंटा ) ऐसे स्थान पर बैठाया जाय, जहाँ पर कि आने-जाने वाले सभी व्यापारी उनके अपराध को जान सकें ।
( ६ ) माल का नाम बदलने वाले व्यापारी पर सवापण दण्ड करना चाहिए ।
( ७ ) शुल्कशाला की ध्वजा के नीचे एकत्र होकर व्यापारी लोग अपने माल का नाम, उसकी कीमत और उसका वजन आदि की बोली बोलें । तीन बार आवाज
१४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) शुल्कभयात्पण्यप्रमाणं मूल्यं वा हीनं ब्रुवतस्तदतिरिक्तं राजा हरेत् । शुल्कमष्टगुणं वा दद्यात् । (२) तदेव निविष्टपण्यस्य भाण्डस्य हीनप्रतिवर्णकेनाघार्यापकर्षणे सारभाण्डस्य फल्गुभाण्डेन प्रतिच्छादने च कुर्यात् । (३) प्रतिक्रेतृभयाद्वा पण्यमूल्यादुपरि मूल्यं वर्धयतो मूल्यवृद्धिं राजा हरेत् । द्विगुणं वा शुल्कं कुर्यात् । (४) तदेवाष्टगुणमध्यक्षस्य छादयतः । (५) तस्माद्विक्रयः पण्यानां धृतो मितो गणितो वा कार्यः । तर्कः फल्गुभाण्डानामानुग्राहिकाणां च । (६) ध्वजमूलमतिक्रान्तानां चाकृतशुल्कानां शुल्कादष्टगुणो दण्डः । पथिकोत्पथिकास्तद्विद्युः ।
लगाने पर जो भी खरीद दे, उसे माल दे देना चाहिए, यदि खरीदने वालों में होड़ लग जाय तो माल का मूल्य बढ़ा कर बोली बोली जाय और निर्धारित आमदनी से अधिक मूल्य एवं उसकी चुङ्गी राजकीय कोष में जमा कर दी जाय ।
( १ ) अधिक चुंगी देने के डर से जो व्यापारी अपने माल और उसके मूल्य को कम करके बताये, उस अतिरिक्त माल को राजा ले ले, अथवा व्यापारी से आठ गुना शुल्क वसूल किया जाय ।
( २ ) यही दण्ड उस व्यापारी को भी देना चाहिए जो कि बढ़िया माल की जगह, उसी प्रकार की दूसरी पेटी आदि में घटिया माल रख कर उसका मूल्य कम कर दे अथवा जो व्यापारी नीचे के हिस्से में अच्छा माल भर कर ऊपर से सस्ता माल भर दे और उसी के अनुसार चुंगी दे ।
( ३ ) प्रतिद्वन्द्विता के कारण जो ग्राहक किसी चीज का मूल्य बढ़ा दे, उस बढ़े हुए मूल्य को राजा ले ले अथवा उस मूल्य बढ़ाने वाले खरीद्दार से दुगुनी चुंगी वसूल कर ली जाय ।
( ४ ) मित्रता या रिश्वत के कारण यदि अध्यक्ष किसी अपराधी व्यापारी को माफ कर दे तो अपराध के अनुपात से आठगुना दण्ड अध्यक्ष को दिया जाय ।
( ५ ) इसलिए माल की बिक्री तौल कर अथवा गिन कर भली भांति करनी चाहिए, जिससे छल-कपट न हो सके । कोयला, नमक आदि कम चुंगी वाली वस्तुओं पर अन्दाज से ही कर लेना चाहिए, उन्हें तौलने की आवश्यकता नहीं है ।
( ६ ) जो व्यापारी छिपकर या किसी छल से चुंगी दिए बिना ही चुंगीघर को लांघ कर चले जांय उन्हें नियत शुल्क से आठ गुना अधिक शुल्क देना चाहिए । असली रास्ता छोड़ कर इधर-उधर से निकल जाने वाले लकड़हारे और ग्वाले आदि पर भी निगरानी रखनी चाहिए ।
प्र० ३७ : अ० २१ ] शुल्क का अध्यक्ष १८७
(१) वैवाहिकमन्वायनमौपायनिकं यज्ञकृत्यप्रसवनैमित्तिकं देवेज्या-चौलोपनयनगोदानव्रतदक्षिणादिषु क्रियाविशेषेषु भाण्डमुच्छुल्कं गच्छेत् । (२) अन्यथावादिनः स्तेयदण्डः । (३) कृतशुल्केनाकृतशुल्कं निर्वाहयतो द्वितीयमेकमुद्रया भित्त्वा पण्यपुटमपहरतो वैदेहकस्य तच्च तावच्च दण्डः । (४) शुल्कस्थानाद्गोमयपलालं प्रमाणं कृत्वा अपहरत उत्तमः साहसदण्डः । (५) शस्त्रवर्मकवचलोहरथरत्नधान्यपशूनामन्यतमानिर्वाह्यं निर्वाहयतो यथावघुषितो दण्डः पण्यनाशश्च । (६) तेषामन्यतमस्यानयने बहिरेवोच्छुल्को विक्रयः । (७) अन्तपालः सपादपणिकां वर्तनीं गृह्णीयात् पण्यवहनस्य, पणिकामेकमुखरस्य, पशूनामर्धपणिकां, क्षुद्रपशूनां पादिकाम्, असभारस्य माषिकाम् । नष्टापहृतं च प्रतिविदध्यात् ।
( १ ) विवाहसंबंधी, विवाह में प्राप्त, सदावर्त्त या क्षेत्रों के लिये दिया गया दान, यज्ञकर्म एवं जन्मोत्सव के लिए भेजा हुआ देवपूजा, मुंडन, जनेऊ, गोदान और व्रत आदि धार्मिक कार्यों से संबद्ध माल पर चुंगी न ली जानी चाहिए ।
( २ ) किन्तु चुंगी के भय से जो व्यक्ति अपने माल का संबंध उक्त कार्यों से बताये तो उसे चोरी का दण्ड दिया जाय ।
( ३ ) यदि कोई व्यापारी चुंगी दिए माल के साथ बिना चुंगी दिए माल को निकाल ले जाय या इसी प्रकार बिना मुहर लगे माल को निकाल ले जाय, अथवा चुंगी दिए माल में बिना चुंगी का माल मिला दे, उस व्यापारी का वह बिना चुङ्गी का माल जब्त कर लिया जाय और उस पर उतना ही दण्ड निर्धारित किया जाय ।
( ४ ) जो व्यापारी चुङ्गी देने के भय से अपने अच्छे माल को घटिया बताकर धोखे से निकाल ले जाने की चेष्टा करे, उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ५ ) शस्त्र, कवच, लोहा, रथ, रत्न, अन्न और पशु आदि किसी भी प्रतिबन्ध लगी वस्तु को लाने-ले जाने वाले व्यापारी को पूर्व निर्धारित दण्ड दिया जाय और उसकी उस वस्तु को जब्त कर लिया जाय ।
( ६ ) इनमें से कोई वस्तु यदि बाहर लायी जाये तो वह बिना चुङ्गी दिये भी नगर-सीमाओं के बाहर बेची जा सकती है ।
( ७ ) सीमा रक्षक अन्तपाल को चाहिए कि वह माल ढोने वाली प्रति गाड़ी से मार्गरक्षा-कर ( वर्त्तनी ) के रूप में १¼ पण कर वसूल करे । घोड़े, खच्चर, गधे आदि एक खुर वाले पशुओं की गाड़ी पर एक पण, बैल आदि पशुओं पर आधा पण, बकरी, भेड़ आदि छोटे पशुओं पर चौथाई पण और कंधे पर भार ढोने वाले व्यक्तियों पर एक माष ( तांबे का सिक्का ) कर लेना चाहिए । यदि किसी व्यापारी की कोई
१८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वैदेश्यं सार्थं कृतसारफल्गुभाण्डविचयनमभिज्ञानं मुद्रां च दत्त्वा प्रेषयेदध्यक्षस्य । (२) वैदेहकव्यञ्जनो वा सार्थप्रमाणं राज्ञः प्रेषयेत् । तेन प्रदेशेन राजा शुल्काध्यक्षस्य सार्थप्रमाणमुपदिशेत्सर्वज्ञत्वख्यापनार्थम् । ततः सार्थ-मध्यक्षोऽभिगम्य ब्रूयात्—'इदममुष्यामुष्य च सारभाण्डं च निगूहंतव्यम्, एष राज्ञः प्रभावः' इति । (३) निगूहतः फल्गुभाण्डं शुल्काष्टगुणो दण्ड, सारभाण्डं सर्वापहारः । (४) राष्ट्रपीडाकरं भाण्डमुच्छिन्द्यादफलं च यत् । महोपकारमुच्छुल्कं कुर्याद्बीजं तु दुर्लभम् ॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्काध्यक्षो नाम एकविंशोऽध्यायः, आदित एकचत्वारिंशः । —: ० :—
वस्तु गुम हो गई हो या चोरी गई हो तो अन्तपाल उसका पता लगावे । नष्ट हुई वस्तु मिल जाय तो दे दे, अन्यथा अपने ही पास रख दे ।
(१) अन्तपाल को चाहिए कि वह विदेशी व्यापारियों के माल की भली-भाँति जाँच कर उस पर मुहर लगाये और रमन्ना काटकर उन्हें चुङ्गी के अध्यक्ष ( शुल्का-ध्यक्ष ) के पास भेज दे ।
(२) उन विदेशी व्यापारियों के साथ गुप्त व्यापारी का भेष धारण किये राजा का खुफिया व्यापारियों के सम्बन्ध की सारी सूचनाऐं पहिले ही राजा तक पहुँचा दे । इस सूचना को तथा व्यापारियों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी राजा, शुल्काध्यक्ष के पास भेज दे, जिससे कि राजा की जानकारी पर विश्वास किया जा सके और राजा की बात को विश्वासपूर्वक कहा जा सके । तदनुसार शुल्काध्यक्ष व्यापारियों से कहे 'आप लोगों में से अमुक-अमुक व्यापारी के पास इतना घटिया और इतना बढ़िया माल है, आप लोगों को कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए । देखिये, राजा का इतना प्रभाव है कि उससे कोई बात छिपी नहीं रह सकती है ।'
(३) जो व्यापारी घटिया माल को छिपाने का यत्न करे, उस पर चुङ्गी से आठ गुना जुर्माना और जो बढ़िया माल को छिपाये उसका सारा माल जब्त कर लेना चाहिए ।
(४) राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले विष या फल आदि माल को राजा नष्ट कर दे और यदि प्रजा का उपकार करने वाला तथा कठिनाई से प्राप्त होने वाला धान्य आदि माल हो तो उस पर चुङ्गी न लगाई जाय, जिससे उस माल का अपने देश में अधिक आयात हो ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त । —: ० :—
| प्रकरण ३८ | # शुल्कव्यवहारः |
|---|---|
| अध्याय २२ |
(१) शुल्कव्यवहारो बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यम्; निष्क्राम्यं, प्रवेश्यं च शुल्कम् । (२) प्रवेश्यानां मूल्यपञ्चभागः । (३) पुष्पफलशाकमूलकन्दवल्लिक्यबीजशुष्कमत्स्यमांसानां षड्भागं गृह्णीयात् । (४) शंखवज्रमणिमुक्ताप्रवालहाराणां तज्जातपुरुषैः कारयेत्, कृत-कर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः । (५) क्षौमदुकूलक्रिमितानकङ्कटहरितालमनःशिलाहिङ्गुलुक्लोहवर्ण- धातूनां चन्दनागुरुकटुककिण्वावराणां सुरादन्ताजिनक्षौमदुकूलनिकरास्त- रणप्रावरणक्रिमिजातानामजैलकस्य च दशभागः, पञ्चदशभागो वा ।
करवसूली के नियम
( १ ) शुल्कव्यवहार ( उपयुक्त कर-वसूली ) के तीन प्रकार हैं : १. बाह्य ( अपने राज्य में उत्पन्न वस्तुओं की चुङ्गी ), २. आभ्यन्तर ( राजमहल तथा राज-धानी के भीतर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की चुङ्गी ) और ३. आतिथ्य ( विदेश से आने वाले माल की चुङ्गी )। इनके दो भाग हैं : १. निष्क्राम्य और २. प्रवेश्य । बाहर जाने वाले माल पर लगाई गई चुङ्गी को निष्क्राम्य और बाहर से आने वाले माल पर लगाई चुङ्गी को प्रवेश्य कहते हैं ।
( २ ) आयात माल पर सामान्यतः उसकी लागत का पाँचवाँ हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।
( ३ ) फूल, फल, साग, गाजर, मूल, शकरकन्द, धान्य, सूखी मछली और मांस, इन वस्तुओं पर उनकी लागत का छठा हिस्सा चुङ्गी लेनी चाहिए ।
( ४ ) शंख, हीरा, मणि, मुक्ता, प्रबाल और हार, इन मूल्यवान् वस्तुओं की चुङ्गी उनके विशेषज्ञों, पारखियों अथवा विशिष्ट रूप से नियत समय के लिए नियत वेतन पर नियुक्त व्यक्तियों द्वारा निर्धारित करनी चाहिए ।
( ५ ) मोटे तथा महीन रेशमी कपड़ों, कीमखाब, सूती कवच, हरताल, मैन-सिल, हिङ्गुल, लोहा, गेरू, चन्दन, अगर पीपल, ( कटुक ), मादक बीजों से निकाला
१९० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वस्त्रचतुष्पदद्विपदसूत्रकार्पासगन्धभैषज्यकाष्ठवेणुवल्कचर्ममृद्भा- ण्डानां धान्यस्नेहक्षारलवणमद्यपक्वान्नादीनां च विंशतिभागः पञ्चविंशति- भागो वा । (२) द्वारादेयं शुल्कपञ्चभागः आनुग्राहिकं वा यथादेशोपकारं स्था- पयेत् । (३) जातिभूमिषु च पण्यानामविक्रयः । (४) खनिभ्यो धातुपण्यादाने षट्छतमत्ययः । (५) पुष्पफलवाटेभ्यः पुष्पफलादाने चतुष्पञ्चाशत्पणो दण्डः । (६) षण्डेभ्यः शाकमूलकन्दादाने पादोनं द्विपञ्चाशतपणः । (७) क्षेत्रेभ्यः सर्वसस्यादाने त्रिपञ्चाशतपणः, पणोऽध्यर्धपणश्च सीतातत्ययः ।
गया द्रव्य, शराब, हाथदाँत, मृगचर्म, रेशमी तागे, बिछौना, ओढ़ना, अन्य रेशमी वस्त्र और बकरी तथा भेड़ की ऊन के बने कपड़ों आदि पर उनके मूल्य का पन्द्रहवां हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।
(१) मामूली सूती कपड़ों, चौपायों, दुपायों, सूत, कपास, दवाई, लकड़ी, बाँस, छाल, बैल आदि का चमड़ा, मिट्टी के बर्तन, अनाज, घी, तेल, खारा नमक, शराब और पके हुए अनाजों पर उनकी कीमत का बीसवां या पच्चीसवां भाग चुङ्गी लेनी चाहिए ।
(२) द्वारपाल को चाहिए कि वह, नगर के प्रधान द्वार से प्रविष्ट होने वाली वस्तुओं पर, उनके नियत कर का पांचवां हिस्सा टैक्स वसूल करे । हर प्रकार का कर इस ढंग से नियत करना चाहिए, जिससे देश का उपकार हो ।
(३) जिन प्रदेशों में जो चीजें पैदा होती हैं वहीं उनको बेचना नहीं चाहिए ।
(४) खानों से तैयार किया हुआ कच्चा माल खरीदने-बेचने वालों को ६०० पण दण्ड देना चाहिए ।
(५) फूल-फल के बगीचों में ही फूल-फल खरीदने-बेचने वालों को ५४ पण दण्ड देना चाहिए ।
(६) साक-भाजी के खेतों में ही साक, भाजी, तथा कन्द-मूल खरीदने-बेचने वालों को ५२ ३/४ पण दण्ड देना चाहिए ।
(७) इसी प्रकार अनाज के खेतों में ही अनाज खरीदने वालों को ५३ पण दण्ड देना चाहिए और अनाज को खेत से ही खरीदने-बेचने वालों को क्रमशः एक पण तथा डेढ़ पण दण्ड देना चाहिए ।
प्र० ३८ : अ० २२ ] कर वसूली के नियम १९१
(१) अतो नवपुराणानां देशजातिचरित्रतः । पण्यानां स्थापयेच्छुल्कमत्ययं चापकारतः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्कव्यवहारो नाम द्वाविंशोऽध्यायः, आदितो द्विचत्वारिंशः ।
—: ० :—
( १ ) इसलिए राजा को चाहिए कि वह देश, जाति तथा आचार के अनुसार नये एवं पुराने हर पदार्थों पर कर की व्यवस्था करे, और उनमें जहाँ से नुकसान की सम्भावना हो, उसके लिए उचित दण्ड की व्यवस्था भी करे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शुल्कव्यवहार नामक बाइसवाँ अध्याय समाप्त ।
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प्रकरण ३९
अध्याय २३
सूत्राध्यक्षः
(१) सूत्राध्यक्षः सूत्रवर्मवस्त्ररज्जुव्यवहारं तज्जातपुरुषैः कारयेत् ।
(२) ऊर्णावल्ककार्पासतूलशणक्षौमाणि च विधवाव्यङ्गाकन्याप्रव्रजितादण्डाप्रतिकारिणीभी रूपाजीवामातृकाभिर्वृद्धराजदासीभिर्व्युपरतोपस्थानदेवदासीभिश्च कर्तयेत् ।
(३) श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । बह्वल्पतां च । सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात् ।
(४) तिथिषु प्रतिपादनमानैश्च कर्म कारयितव्याः । सूत्रह्रासे वेतनह्रासो द्रव्यसारात् ।
(५) कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारुभिश्च कर्म कारयेत्, प्रतिसंसर्गं च गच्छेत् ।
सूत-व्यवसाय का अध्यक्ष
( १ ) सूत-व्यवसाय के अध्यक्ष ( सूत्राध्यक्ष ) को चाहिए कि वह सूत, कवच, कपड़ा और रस्सी आदि के कातने, बुनने तथा बटने वाले निपुण कारीगरों से उनके इन कार्यों की जानकारी प्राप्त करे ।
( २ ) ऊन, बल्क, कपास, सेंमल, सन और जूट आदि को कतवाने के लिए विधवाओं, अङ्गहीन स्त्रियों, कन्याओं, सन्यासिनों, सजायाफ्ता स्त्रियों, वेश्याओं की खालाओं, बूढी दासियों और मन्दिर की दासियों को नियुक्त करना चाहिए ।
( ३ ) सूत की एकसारता, मोटाई और मध्यमता की अच्छी तरह जाँच करने के बाद उक्त-महिलाओं की मजदूरी नियत करनी चाहिए । कम-ज्यादा सूत कातने वाली स्त्रियों को उनके कार्य के अनुसार वेतन देना चाहिए । सूत का वजन अथवा लम्बाई को जानकर पुरस्कार रूप में उन्हें तेल, आँवला और उबटन देना चाहिए, जिससे वे प्रसन्न होकर अधिक कार्य करें ।
( ४ ) त्यौहारों और छुट्टी के दिनों में उन्हें भोजन, दान या संमान देकर उनसे कार्य करवाना चाहिए । निर्धारित मात्रा से सूत कम काता जाय तो, सूत के मूल्य के अनुसार उनका वेतन काटना चाहिए ।
( ५ ) नियत कार्य-काल और निश्चित वेतन के अनुसार ही कारीगरों को नियुक्त
प्र० ३६ : अ० २३ ] सूत व्यवसाय का अध्यक्ष १९३
(१) क्षौमदुकूलकृमितानराङ्कवकार्पाससूत्रवानकर्मान्तांश्च प्रयुञ्जानो गन्धमाल्यदानै रन्यैश्चौपग्राहिकै राराधयेत् । वस्त्रास्तरणप्रावरणविकल्पानुत्थापयेत् । (२) कंकटकर्मान्तांश्च तज्जातकारुशिल्पिभिः कारयेत् । (३) याश्चानिष्कासिन्यः प्रोषितविधवा व्यङ्गाः कन्यका वाऽऽत्मानं बिभृयुस्ताः स्वदासीभिरनुसार्य सोपग्रहं कर्म कारयितव्याः । (४) स्वयमागच्छन्तीनां वा सूत्रशालां प्रत्यूषसि भाण्डवेतनविनिमयं कारयेत् । सूत्रपरीक्षार्थमात्रः प्रदापः । (५) स्त्रिया मुखसन्दर्शनेऽन्यकार्यसम्भाषायां वा पूर्वः साहसदण्डः । वेतनकालातिपातने मध्यमः, अकृतकर्मवेतनप्रदाने च । (६) गृहीत्वा वेतनं कर्माकुर्वत्याः अङ्गुष्ठसन्दंशं दापयेत् । भक्षितापहृतावस्कन्दितानां च । वेतनेषु च कर्मकराणामपराधतो दण्डः ।
किया जाना चाहिए और उनसे सम्पर्क बनाये रखना चाहिए, जिससे कि कार्य में किसी प्रकार का कपट न होने पावे ।
( १ ) अध्यक्ष को चाहिए मोटे-महीन रेशमी कपड़े, चीनी रेशम, रंकु मृग की ऊन ( रांकव ) और कपास का सूत कातने-बुनने वाले कारीगरों को इत्र, फुलेल तथा अन्य पारितोषिक देकर सदा प्रसन्न चित्त रखे । उनसे वह ओढ़ने, बिछाने एवं पहनने के डिजाइनदार वस्त्र बनवाये ।
( २ ) निपुण कारीगरों से मोटे महीन सूत के कवच बनवाने चाहिए ।
( ३ ) जो स्त्रियाँ परदानसीन हों, जिनके पति परदेश गए हों, विधवा हों, जो लूली-लंगड़ी हों, जिनका विवाह न हुआ हो, जो आत्म निर्भर रहना चाहती हों, ऐसी स्त्रियों के सम्बन्ध में अध्यक्ष को चाहिए कि वह दासियों द्वारा सूत भेज कर उनसे कतवाये और उनके साथ अच्छा व्यवहार करे ।
( ४ ) घर पर काते हुए सूत को लेकर जो स्त्रियाँ स्वयं या दासियों को साथ लेकर प्रातः काल ही पुतलीघर ( सूत्रशाला ) में उपस्थित हों, उन्हें यथोचित मजदूरी दी जानी चाहिए । सूत्रशाला में अधिक सबेरा होने के कारण यदि कुछ अन्धेरा हो तो वहाँ उतना ही प्रकाश किया जाय, जिससे सूत अच्छी तरह देखा जा सके ।
( ५ ) स्त्री का मुख देखने या कार्य के अलावा इधर-उधर की बात करने वाले परीक्षक को प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । उन्हें उचित समय पर वेतन या मजदूरी न दी जाय तो मध्यम साहस दण्ड और कार्य न करने पर भी यदि वेतन दिया जाय तब भी मध्यम साहस दण्ड देना चाहिए ।
( ६ ) जो स्त्री वेतन लेकर भी कार्य न करे उसका अंगूठा कटवा देना चाहिए ।
१३ कौ०
१९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) रज्जुवर्त्तकैश्चर्मकारैश्च स्वयं संसृज्येत। भाण्डानि च वरत्रादीनि वर्तयेत्। (२) सूत्रवल्कमयी रज्जूर्वरत्रा वैत्रवैणवीः। सांनाह्या बन्धनीयाश्च यानयुग्यस्य कारयेत्॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सूत्राध्यक्षो नाम त्रयोविंशोऽध्यायः, आदितस्त्रयश्चत्वारिंशः।
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यही दण्ड उसको भी देना चाहिए, जो माल को चुराये, खो दे अथवा लेकर भाग जाय। प्रत्येक कर्मचारी को उसके अपराध के अनुसार शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए।
(१) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह रस्सी वटकर जीविकोपार्जन करने वाले तथा चमड़े का कार्य करने वाले कारीगरों से सम्पर्क बनाये रखे। उनसे वह गाय आदि बाँधने के लिए रस्सी तथा हर तरह का चमड़े आदि का सामान बनवाता रहे।
(२) सूत्राध्यक्ष को चाहिए कि वह सूत, सन आदि की रस्सियां और कवच बनाने तथा घोड़ा बांधने के उपयोगी बेत एवं बाँस की रस्सियां बनवाये।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सूत्राध्यक्ष नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त।
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| प्रकरण ४० |
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| अध्याय २४ |
सीताध्यक्षः
(१) सीताध्यक्षः कृषितन्त्रशुल्बवृक्षायुर्वेदज्ञस्तज्जसखो वा सर्वधान्य-पुष्पफलशाककन्दमूलवाल्लिक्यक्षौमकार्पासबीजानि यथाकालं गृह्णीयात् । (२) बहुहलपरिकृष्टायां स्वभूमौ दासकर्मकरदण्डप्रतिकर्तृभिर्वापयेत् । (३) कषणयन्त्रोपकरणबलीवर्दैश्चैषामसङ्गं कारयेत् । कारुभिश्च कर्मारकुट्टाकमेदकरज्जुवर्तकसर्पग्राहादिभिश्च । (४) तेषां कर्मफलविनिपाते तत्फलहानं दण्डः । (५) षोडशद्रोणं जांगलानां वर्षप्रमाणमध्यर्धमानूपानाम् । देशवापा-नाम् । अर्धत्रयोदशाश्मकानां, त्रयोविंशतिरवन्तीनाम्, अमितमपरान्तानाम्, हैमन्त्यानां च कुल्यावापानां च कालतः ।
कृषि विभाग का अध्यक्ष
(१) कृषि-विभाग के अध्यक्ष (सीताध्यक्ष) को यह आवश्यक है कि वह कृषिशास्त्र, शुल्बशास्त्र (पैमाइश) और वृक्ष-विज्ञान की पूरी जानकारी हासिल करें, अथवा इन सभी विद्याओं के विशेषज्ञों को अपना सहायक बनाकर यथासमय अन्न, फूल, फल, शाक, कंद, मूल, सन, जूट और कपास आदि के बीजों का संग्रह करे ।
(२) उन संग्रह किए हुए बीजों को वह क्रीतदासों, नौकरों और सपरिश्रम सजायाफ्ता कैदियों के द्वारा ऐसी भूमि में बुवाये, जो कई बार जोती गई हो ।
(३) खेत जोतने-बोने के साधन हल-बैल आदि से उनका कोई स्थायी सम्बन्ध न रखा जाय । इसी प्रकार कारीगरों, बढ़इयों, खाई खोदने वालों, रस्सी बटने वालों और संपेरों से उन कर्मचारियों का कोई स्थायी संसर्ग न होने दिया जाय ।
(४) यदि इन कारीगरों तथा बढ़ई आदि कर्मचारियों से खेती आदि में कोई नुकसान हो तो उसकी हानि उन्हीं से पूरी की जाय ।
(५) वर्षा-जल को मापने के लिए बनाये हुए एक हाथ मुँह वाले कुण्ड में यदि सोलह द्रोण पानी भर जाय तो समझना चाहिये कि रेतीली जमीन फसल बोने के योग्य हो गई है । इसी प्रकार जल बरसने वाले प्रदेशों के लिए चौबीस द्रोण पानी, दक्षिणी प्रदेशों के लिए साढ़े तेरह द्रोण पानी, मालव प्रदेश के लिए तेइस द्रोण पानी, पश्चिमी प्रदेशों के लिए अधिक-से-अधिक और हिमालय प्रदेशों तथा नहरी प्रांतों के लिए समय-समय का पानी, फसल बोने के लिए उचित है ।
१९६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वर्षत्रिभागः पूर्वपश्चिममासयोः, द्वौ त्रिभागौ मध्यमयोः सुषमारूपम् । (२) तस्योपलब्धिर्बृहस्पतेः स्थानगमनगर्भाधानेभ्यः शुक्रोदयास्तमयचारेभ्यः सूर्यस्य प्रकृतिवैकृताच्च । (३) सूर्याद्बीजसिद्धिः । बृहस्पतेः सस्यानां स्तम्बकारिता । शुक्राद्वृष्टिरिति । (४) त्रयः साप्ताहिका मेघा अशीतिः कणशीकराः ।
षष्टिरातपमेघानामेषा वृष्टिः समाहिता ॥
(५) वातमातपयोगं च विभजन् यत्र वर्षति ।
त्रीन् कर्षकांश्च जनयंस्तत्र सस्यागमो ध्रुवः ॥
(६) ततः प्रभूतोदकमल्पोदकं वा सस्यं वापयेत् ।
(७) शालिव्रीहिकोद्रवतिलप्रियङ्गुदारकवरकाः पूर्ववापाः । मुद्गमाषशैम्ब्या मध्यवापाः । कुसुम्भमसूरकुलत्थयवगोधूमकलायातसीसर्षपाः पश्चाद्वापाः ।
( १ ) वारिश के अनुपात से यदि एक हिस्सा श्रावण-कार्तिक में और दो हिस्सा भाद्रपद-आश्विन में पानी बरसे तो वह वर्ष फसल के लिए लाभदायी समझना चाहिए।
( २ ) अच्छे वर्ष के आसार इन बातों पर निर्भर हैं : जब बृहस्पति मेष राशि से वृष राशि पर संक्रमण करें, जब गर्भाधान अर्थात् मार्गशीर्ष आदि छह महीनों में कोहरा, वर्षा, बादल आदि देखे जांय, जब शुक्र ग्रह की उदयास्त गति आषाढ की पंचमी आदि नौ तिथियों में संचारित हो, और जब सूर्य के चारों ओर मंगल दिखाई दे, ये सभी अच्छी वर्षा के लक्षण है ।
( ३ ) यदि सूर्य के चारों ओर मंडल पड़ा हो तो अनाज के अच्छे दाने का अनुमान करना चाहिए । यदि बृहस्पति वृष राशि का हो तो अच्छी फसल का अनुमान करना चाहिए । यदि शुक्र की उदयास्त गति कारण हो तो अच्छी वृष्टि का अनुमान करना चाहिए ।
( ४ ) लगातार सात दिन में तीन बार वर्षा उत्तम है, सारी वर्षार्ऋतु में अस्सी बार बूंदों की वर्षा भी उत्तम है, यदि साठ बार धूप खिल कर फिर बार-बार वर्षा होती रहे तो वह वर्षा अति उत्तम मानी गई है ।
( ५ ) बीच-बीच में हवा के चलने और धूप के खिलने का अन्तर छोड़कर यदि वर्षा हो ओर तीन-तीन दिन हल चलाने का अवसर देकर यदि वर्षा हो तो उत्तम फसल होने का अनुमान करना चाहिए ।
( ६ ) वर्षा के अनुपात से ही बीज बोना चाहिए ।
( ७ ) साठी या धान ( शालि ), गेहूँ-जौ-ज्वार ( ब्रीहि ), कोदो, तिल, कांगनी ( प्रियंगु ) और लोभिया आदि को वर्षा शुरू होने के पहिले ही बो देना चाहिए । मूंग, उड़द और छीमी आदि को वर्षा के मध्य में बोना चाहिए । कुसुंबी, मसूर,
प्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९७
(१) यथर्तुवशेन वा बीजवापाः । (२) वापातिरिक्तमर्धसीतिकाः कुर्युः । स्ववीर्योपजीविनो वा चतुर्थ-पञ्चभागिकाः । यथेष्टमनवसितभागं दद्युरन्यत्र कृच्छ्रेभ्यः । (३) स्वसेतुभ्यो हस्तप्रावर्तितममुदकभागं पंचमं दद्युः । स्कन्दप्रावर्तितं चतुर्थम् । स्रोतोयन्त्रप्रावर्तितं च तृतीयम् । (४) चतुर्थं नदीसरस्तटाककूपोद्घाटम् । (५) कर्मोदकप्रमाणेण कैदारं हैमनं ग्रैष्मिकं वा सस्यं स्थापयेत् । (६) शाल्यादि ज्येष्ठम् । षण्डो मध्यमः । इक्षुः प्रत्यवरः । इक्षवो हि बह्वाबाधा व्ययग्राहिणश्च । (७) फेनाघातो वल्लीफलानाम्, परीवाहान्ताः पिप्पलीमुद्वीकेक्षूणाम्, कूपपर्यन्ताः शाकमूलानाम्, हरिणिपर्यन्ता हरितकानाम्, पाल्यो लवानां
कुल्थी, जो, गेहूँ, मटर, अलसी और सरसों आदि अन्नों को वर्षा के अन्त में बोना चाहिए ।
( १ ) अथवा इन सभी अन्नों को ऋतु के अनुसार, जैसा उचित हो बोना चाहिए।
( २ ) जो खेत बोये न गये हों, उन्हें सीताध्यक्ष आधी कटाई पर दूसरे किसानों को बोने के लिए दे दे । अथवा जो लोग शारीरिक श्रम पर ही जीवित हैं, उनको यह जमीन दे दी जाय और उस जमीन की पैदावार का चौथा या पाचवां भाग उन्हें दिया जाय या स्वामी की इच्छानुसार ही उनको दिया जाय, किन्तु इस बात का ध्यान रहे कि उन्हें उस प्रदत्त भाग को स्वीकार करने में कोई कष्ट न हो ।
( ३ ) अपने धन और बाहुबल से बनाये गए तालाबों से यदि सिंचाई की जाय तो उस उपज का पांचवां हिस्सा राजा को देना चाहिए । अपने कन्धों पर जल लाकर यदि वह खेतों की सिंचाई करता है तो उसे चौथाई हिस्सा राजा को देना चाहिए । यदि वह नहर या नालियां बना कर खेतों को सींचता है तो उसे पैदावार का तीसरा ही हिस्सा देना चाहिए ।
( ४ ) अपने धन और श्रम से यदि नदी, झील और कुओं पर रहट लगाकर खेत की सिंचाई की जाय तो पैदावार का चौथा भाग राजा को देना चाहिए ।
( ५ ) ऋतु के अनुसार तथा पानी की सुविधा देखकर ही खेतों में बीज बोना चाहिए ।
( ६ ) धान, गेहूँ आदि की फसल उत्तम मानी गई है । कँदली आदि की फसल मध्यम कोटि की है । ईख की फसल ओछी मानी गई है, क्योंकि इसके बोने में बड़ा श्रम करना पड़ता है और अनेक बाधाओं से उसकी रक्षा करनी पड़ती है ।
( ७ ) नदी के कछारों एवं किनारों की जमीन का पेठा, कद्दू, ककड़ी तथा तरबूज आदि बोने के लिए उपयुक्त है, पीपल और ईख आदि बोने के लिए वह जमीन उपयुक्त है, जहाँ पर नदी का जल एक बार घूम गया हो, साग-भाजी बोने के
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गन्धभैषज्योशीरह्रीबेरपिण्डालुकादीनाम् । यथास्वं भूमिषु च स्थूल्याश्चा-
नूप्याश्चौषधीः स्थापयेत् ।
(१) तुषारपायनमुष्णशोषणं चासप्तरात्रादिति धान्यबीजानां, त्रिरात्रं पंचरात्रं वा कोशीधान्यानां, मधुघृतसूकरवसाभिः शकृद्युक्ताभिः काण्डबीजानां छेदलेपो मधुघृतेन कन्दानाम् । अस्थिबीजानां शकृदालेपः । शाखिनां गर्तदाहो गोऽस्थिशकृद्भिः काले दौहृदं च ।
(२) प्ररूढांश्चाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहिक्षीरेण पाययेत् ।
(३) कार्पास्सारं निर्मोकं सर्पस्य च समाहरेत् ।
न सर्पास्तत्र तिष्ठन्ति धूमो यत्रैष तिष्ठति ॥
(४) सर्वबीजानां तु प्रथमवापे सुवर्णोदकसंप्लुतां पूर्वमुष्टिं वापयेत् अमुं च मन्त्रं ब्रूयात्—
'प्रजापतये काश्यपाय देवाय नमः सदा ।
सीता मे ऋध्यतां देवी बीजेषु च धनेषु च' ॥
लिए कुए के आस-पास की जमीन उपयुक्त है, जई आदि बोने के लिए भील तथा तालाबों के किनारे की गीली जमीन उपयुक्त है, धनिया, जीरा, खस, नेत्रवाला तथा कचालू आदि बोने के लिए ऐसे खेत उपयुक्त हैं जिनके बीच में तालाब बने हों, सूखी और गीली, जमीन में जिन-जिन अनाजों की अधिक उपज हो उनको समझ कर बोना चाहिए ।
( १ ) धान के बीजों की सात दिन तक रात की ओस और दिन की धूप में रखना चाहिए । मूंग, उड़द आदि के बीजों को इसी प्रकार तीन दिन-रात या पांच दिन-रात ओस और धूप में रखना चाहिए, बोए जाने वाले ईख के पोरों की कटी हुई जगहों में शहद, घी या सुअर की चर्बी के साथ गोबर मिला कर लगा देना चाहिए, सूरन, शकरकन्द आदि कन्दफलों के कटे हुए स्थानों पर गोबर-शहद का लेप अथवा घी का लेप लगा देना चाहिए, कपास आदि के बीजों को गोबर आदि से लपेट कर बोना चाहिए, आम, कटहल आदि वृक्षों के बीजों को किसी गढ़े में डाल कर कुछ गर्मी दी जाने के बाद उन्हें गाय की हड्डी और गोबर के साथ मिलाकर रखा जाना चाहिए, निष्कर्ष यह कि इन सब प्रकार के बीजों का यथाविधि संस्कार करके फिर इनको खेत में बोना चाहिए ।
( २ ) बीज बोने के बाद जब उनमें अंकुर निकल जांय तब उनमें छोटी मछलियों की खाद छुड़वा देनी चाहिए और उन्हें सेहुड़ के दूध से सींचना चाहिए ।
( ३ ) साँप की केंचुली और बिनौलों को एक साथ मिलाकर जला दिया जाय, जहां तक उसका धुआं फैलेगा वहां तक कोई भी सांप नहीं ठहर सकता ।
( ४ ) बोने से पहिले हरेक बीज को सुवर्ण से स्पर्श हुए जल में भिगोना चाहिए और तब बोते समय बीज की पहिली मुट्ठी भरकर यह मन्त्र पढ़ना चाहिए ;