भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ३८# शुल्कव्यवहारः
अध्याय २२

(१) शुल्कव्यवहारो बाह्यमाभ्यन्तरं चातिथ्यम्; निष्क्राम्यं, प्रवेश्यं च शुल्कम् । (२) प्रवेश्यानां मूल्यपञ्चभागः । (३) पुष्पफलशाकमूलकन्दवल्लिक्यबीजशुष्कमत्स्यमांसानां षड्भागं गृह्णीयात् । (४) शंखवज्रमणिमुक्ताप्रवालहाराणां तज्जातपुरुषैः कारयेत्, कृत-कर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः । (५) क्षौमदुकूलक्रिमितानकङ्कटहरितालमनःशिलाहिङ्‌गुलुक्लोहवर्ण- धातूनां चन्दनागुरुकटुककिण्वावराणां सुरादन्ताजिनक्षौमदुकूलनिकरास्त- रणप्रावरणक्रिमिजातानामजैलकस्य च दशभागः, पञ्चदशभागो वा ।


करवसूली के नियम

( १ ) शुल्कव्यवहार ( उपयुक्त कर-वसूली ) के तीन प्रकार हैं : १. बाह्य ( अपने राज्य में उत्पन्न वस्तुओं की चुङ्गी ), २. आभ्यन्तर ( राजमहल तथा राज-धानी के भीतर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं की चुङ्गी ) और ३. आतिथ्य ( विदेश से आने वाले माल की चुङ्गी )। इनके दो भाग हैं : १. निष्क्राम्य और २. प्रवेश्य । बाहर जाने वाले माल पर लगाई गई चुङ्गी को निष्क्राम्य और बाहर से आने वाले माल पर लगाई चुङ्गी को प्रवेश्य कहते हैं ।

( २ ) आयात माल पर सामान्यतः उसकी लागत का पाँचवाँ हिस्सा चुङ्गी ली जानी चाहिए ।

( ३ ) फूल, फल, साग, गाजर, मूल, शकरकन्द, धान्य, सूखी मछली और मांस, इन वस्तुओं पर उनकी लागत का छठा हिस्सा चुङ्गी लेनी चाहिए ।

( ४ ) शंख, हीरा, मणि, मुक्ता, प्रबाल और हार, इन मूल्यवान् वस्तुओं की चुङ्गी उनके विशेषज्ञों, पारखियों अथवा विशिष्ट रूप से नियत समय के लिए नियत वेतन पर नियुक्त व्यक्तियों द्वारा निर्धारित करनी चाहिए ।

( ५ ) मोटे तथा महीन रेशमी कपड़ों, कीमखाब, सूती कवच, हरताल, मैन-सिल, हिङ्गुल, लोहा, गेरू, चन्दन, अगर पीपल, ( कटुक ), मादक बीजों से निकाला