भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 272

१८८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) वैदेश्यं सार्थं कृतसारफल्गुभाण्डविचयनमभिज्ञानं मुद्रां च दत्त्वा प्रेषयेदध्यक्षस्य । (२) वैदेहकव्यञ्जनो वा सार्थप्रमाणं राज्ञः प्रेषयेत् । तेन प्रदेशेन राजा शुल्काध्यक्षस्य सार्थप्रमाणमुपदिशेत्सर्वज्ञत्वख्यापनार्थम् । ततः सार्थ-मध्यक्षोऽभिगम्य ब्रूयात्—'इदममुष्यामुष्य च सारभाण्डं च निगूहंतव्यम्, एष राज्ञः प्रभावः' इति । (३) निगूहतः फल्गुभाण्डं शुल्काष्टगुणो दण्ड, सारभाण्डं सर्वापहारः । (४) राष्ट्रपीडाकरं भाण्डमुच्छिन्द्यादफलं च यत् । महोपकारमुच्छुल्कं कुर्याद्बीजं तु दुर्लभम् ॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शुल्काध्यक्षो नाम एकविंशोऽध्यायः, आदित एकचत्वारिंशः । —: ० :—

वस्तु गुम हो गई हो या चोरी गई हो तो अन्तपाल उसका पता लगावे । नष्ट हुई वस्तु मिल जाय तो दे दे, अन्यथा अपने ही पास रख दे ।

(१) अन्तपाल को चाहिए कि वह विदेशी व्यापारियों के माल की भली-भाँति जाँच कर उस पर मुहर लगाये और रमन्ना काटकर उन्हें चुङ्गी के अध्यक्ष ( शुल्का-ध्यक्ष ) के पास भेज दे ।

(२) उन विदेशी व्यापारियों के साथ गुप्त व्यापारी का भेष धारण किये राजा का खुफिया व्यापारियों के सम्बन्ध की सारी सूचनाऐं पहिले ही राजा तक पहुँचा दे । इस सूचना को तथा व्यापारियों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी राजा, शुल्काध्यक्ष के पास भेज दे, जिससे कि राजा की जानकारी पर विश्वास किया जा सके और राजा की बात को विश्वासपूर्वक कहा जा सके । तदनुसार शुल्काध्यक्ष व्यापारियों से कहे 'आप लोगों में से अमुक-अमुक व्यापारी के पास इतना घटिया और इतना बढ़िया माल है, आप लोगों को कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए । देखिये, राजा का इतना प्रभाव है कि उससे कोई बात छिपी नहीं रह सकती है ।'

(३) जो व्यापारी घटिया माल को छिपाने का यत्न करे, उस पर चुङ्गी से आठ गुना जुर्माना और जो बढ़िया माल को छिपाये उसका सारा माल जब्त कर लेना चाहिए ।

(४) राष्ट्र को हानि पहुँचाने वाले विष या फल आदि माल को राजा नष्ट कर दे और यदि प्रजा का उपकार करने वाला तथा कठिनाई से प्राप्त होने वाला धान्य आदि माल हो तो उस पर चुङ्गी न लगाई जाय, जिससे उस माल का अपने देश में अधिक आयात हो ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त । —: ० :—