भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ३७
अध्याय २१

शुल्काध्यक्षः


(१) शुल्काध्यक्षः शुल्कशालां ध्वजं च प्राङ्मुखम् उदङ्मुखं वा महाद्वाराभ्याशे निवेशयेत् । (२) शुल्कादायिनश्चत्वारः पञ्च वा सार्थोपयातान् वणिजो लिखेयुः—के कुतस्त्याः कियत्पण्याः क्व चाभिज्ञानमुद्रा वा कृतेति । (३) अमुद्राणामत्ययो देयद्विगुणः । (४) कूटमुद्राणां शुल्काष्टगुणो दण्डः । (५) भिन्नमुद्राणामत्ययो घटिकाः स्थाने स्थानम् । (६) राजमुद्रापरिवर्तने नामकृते सपादपणिकं वहनं दापयेत् । (७) ध्वजमलोपस्थितस्य प्रमाणमर्घं च वैदेहकाः पण्यस्य ब्रूयुः—एतत्प्रमाणेनार्घेण पण्यमिदं कः क्रेतेति । त्रिरुद्घोषितमर्थिभ्यो दद्यात् । क्रेतृसंघर्षे मूल्यवृद्धिः । सशुल्का कोशं गच्छेत् ।


शुल्क का अध्यक्ष

( १ ) शुल्क का अध्यक्ष शुल्कशाला ( चुंगीघर ) का निर्माण करवावे, उसके पूर्व तथा उत्तर की ओर, प्रधान द्वार के पास, शुल्कशाला की पहिचान के लिए एक पताका लगवा दे ।

( २ ) शुल्कशाला में चार-पाँच कर्मचारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, जो माल को लाने-ले जाने वाले व्यापारियों का नाम, उनकी जाति, उनका निवास स्थान, माल का विवरण और उस पर कहाँ-कहाँ की मुहर लगी है, इसका विवरण लिखें ।

( ३ ) जिन व्यापारियों के माल पर मुहर न लगी हो, उनको जितनी चुंगी ( शुल्क ) देनी चाहिए, उन पर उसका दुगुना जुर्माना किया जाय ।

( ४ ) जिन व्यापारियों ने अपने माल पर नकली मुहर लगाई है उन पर चुंगी का आठ गुना जुर्माना ठोकना चाहिए ।

( ५ ) जो व्यापारी मुहर लगाकर उसको मिटा दे, उन्हें तीन घड़ी तक ( ढाई घड़ी का एक घंटा ) ऐसे स्थान पर बैठाया जाय, जहाँ पर कि आने-जाने वाले सभी व्यापारी उनके अपराध को जान सकें ।

( ६ ) माल का नाम बदलने वाले व्यापारी पर सवापण दण्ड करना चाहिए ।

( ७ ) शुल्कशाला की ध्वजा के नीचे एकत्र होकर व्यापारी लोग अपने माल का नाम, उसकी कीमत और उसका वजन आदि की बोली बोलें । तीन बार आवाज