कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
शरत् । मार्गशीर्षः पौषश्च हेमन्तः । माघः फाल्गुनश्च शिशिरः । चैत्रो वैशाखश्च वसन्तः । ज्येष्ठामूलीय आषाढश्च ग्रीष्मः ।
(१) शिशिराद्युत्तरायणम् । वर्षादि दक्षिणायनम् ।
(२) द्वचयनः संवत्सरः । पञ्चसंवत्सरो युगमिति ।
(३) दिवसस्य हरत्यर्कः षष्टिभागमृत्तौ ततः ।
करोत्येकमहश्छेदं तथैवैंकं च चन्द्रमाः ॥
एवमर्धतृतीयानामब्दानामधिमासकम् ।
ग्रीष्मे जनयतः पूर्वं पञ्चाब्दान्ते च पश्चिमम् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे देशकालमानं नाम विंशोऽध्यायः, आदितश्चत्वारिंशः ।
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माघ—फाल्गुल में शिशिर ऋतु होती है । चैत्र—वैशाख में वसन्त ऋतु होती है । ज्येष्ठ-आषाढ में ग्रीष्म ऋतु होती है ।
(१) शिशिर, वसन्त तथा ग्रीष्म उत्तरायण और वर्षा, शरद् तथा हेमन्त दक्षिणायन कहलाते हैं ।
(२) उत्तरायण और दक्षिणायन दोनों का एक संवत्सर होता है । पाँच संवत्सरों का एक युग होता है ।
(३) प्रतिदिन सूर्य एक घटिका छेद करता है, इस क्रम से वह एक वर्ष में छह दिन, दो वर्ष में बारह दिन और ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन अधिक बना लेता है । इसी प्रकार चन्द्र भी प्रत्येक ऋतु में एक-एक दिन कम करता जाता है, जिससे ढाई वर्ष में पन्द्रह दिन कम हो जाते हैं । इस दृष्टि से सूर्य और चन्द्रमा की गति के अनुसार एक महीने की कमी-बेशी हो जाती है । इस गणना के अनुपात से प्रति ढाई वर्ष बाद ग्रीष्म ऋतु में प्रथम मलिमास और प्रति पाँच वर्ष के बाद हेमन्त ऋतु में दूसरा मलिमास, सूर्य तथा चन्द्रमा बनाते हैं। यही मलिमास अधिकमास कहलाता है, जो ढाई वर्ष में एक महीने के अन्तर को पूरा कर देता है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में देशकालमान नामक बीसवाँ अध्याय समाप्त ।
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