भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रकरण ३९
अध्याय २३

सूत्राध्यक्षः


(१) सूत्राध्यक्षः सूत्रवर्मवस्त्ररज्जुव्यवहारं तज्जातपुरुषैः कारयेत् ।
(२) ऊर्णावल्ककार्पासतूलशणक्षौमाणि च विधवाव्यङ्गाकन्याप्रव्रजितादण्डाप्रतिकारिणीभी रूपाजीवामातृकाभिर्वृद्धराजदासीभिर्व्युपरतोपस्थानदेवदासीभिश्च कर्तयेत् ।
(३) श्लक्ष्णस्थूलमध्यतां च सूत्रस्य विदित्वा वेतनं कल्पयेत् । बह्वल्पतां च । सूत्रप्रमाणं ज्ञात्वा तैलामलकोद्वर्तनैरेता अनुगृह्णीयात् ।
(४) तिथिषु प्रतिपादनमानैश्च कर्म कारयितव्याः । सूत्रह्रासे वेतनह्रासो द्रव्यसारात् ।
(५) कृतकर्मप्रमाणकालवेतनफलनिष्पत्तिभिः कारुभिश्च कर्म कारयेत्, प्रतिसंसर्गं च गच्छेत् ।


सूत-व्यवसाय का अध्यक्ष

( १ ) सूत-व्यवसाय के अध्यक्ष ( सूत्राध्यक्ष ) को चाहिए कि वह सूत, कवच, कपड़ा और रस्सी आदि के कातने, बुनने तथा बटने वाले निपुण कारीगरों से उनके इन कार्यों की जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) ऊन, बल्क, कपास, सेंमल, सन और जूट आदि को कतवाने के लिए विधवाओं, अङ्गहीन स्त्रियों, कन्याओं, सन्यासिनों, सजायाफ्ता स्त्रियों, वेश्याओं की खालाओं, बूढी दासियों और मन्दिर की दासियों को नियुक्त करना चाहिए ।

( ३ ) सूत की एकसारता, मोटाई और मध्यमता की अच्छी तरह जाँच करने के बाद उक्त-महिलाओं की मजदूरी नियत करनी चाहिए । कम-ज्यादा सूत कातने वाली स्त्रियों को उनके कार्य के अनुसार वेतन देना चाहिए । सूत का वजन अथवा लम्बाई को जानकर पुरस्कार रूप में उन्हें तेल, आँवला और उबटन देना चाहिए, जिससे वे प्रसन्न होकर अधिक कार्य करें ।

( ४ ) त्यौहारों और छुट्टी के दिनों में उन्हें भोजन, दान या संमान देकर उनसे कार्य करवाना चाहिए । निर्धारित मात्रा से सूत कम काता जाय तो, सूत के मूल्य के अनुसार उनका वेतन काटना चाहिए ।

( ५ ) नियत कार्य-काल और निश्चित वेतन के अनुसार ही कारीगरों को नियुक्त