कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ४० : अ० २४ ] कृषि-विभाग का अध्यक्ष १९९
(१) षण्डवाटगोपालकदासकर्मकरेभ्यो यथापुरुषपरिवापं भक्तं कुर्यात् । सपादपणिकं मासं दद्यात् । कर्मानुरूपं कारुभ्यो भक्तवेतनम् । (२) प्रशीर्णं पुष्पफलं देवकार्यार्थं व्रीहियवमाग्रयणार्थं श्रोत्रियास्तपस्विनश्चाहरेयुः । राशीमूलमुच्छवृत्तयः । (३) यथाकालं च सस्यादि जातं जातं प्रवेशयेत् । न क्षेत्रे स्थापयेत् किञ्चित् पलालमपि पण्डितः ॥ (४) प्रकराणां समुच्छ्रायान् वलभीर्वा तथाविधाः । न संहतानि कुर्वीत न तुच्छानि शिरांसि च ॥ (५) खलस्य प्रकरान् कुर्यान्मण्डलान्ते समाश्रितान् । अनग्निकाः सोदकाश्च खले स्युः परिकर्मिणः ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सीताध्यक्षो नाम चतुर्विंशोऽध्यायः, आदितश्चतुश्चत्वारिंशः ।
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'प्रजापति, सूर्यपुत्र और मेघ, तुम्हारी सदैव हम वन्दना करते हैं, हे धरती माता, हमारे बीजों और अनाजों में सदा वृद्धि होती रहे'।
( १ ) खेतों की रखवाली करने वाले ग्वाले, दास और नौकर आदि प्रत्येक को उनकी मेहनत के अनुसार भोजन-वस्त्र आदि दिया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त उन्हें प्रतिमास सवा पण नियत वेतन मिलना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे कारीगरों को भी उनके परिश्रम के अनुसार भोजन, वस्त्र और वेतन आदि दिया जाना चाहिए।
( २ ) पेड़ों से अपने आप गिरे हुए फल-फूलों को देवकार्य के लिए, तथा गेहूँ जौ आदि अन्नों को इष्ट देवता को भोग लगाने के लिए श्रोत्रिय और तपस्वी लोग उठा लें। खलिहान उठ जाने पर जो अन्न के दाने पड़े रह जांय उन्हें सीता बीनकर गुजर करने वाले लोग उठा लें।
( ३ ) ठीक समय पर तैयार हुई फसल को सुरक्षित स्थान में रखवा देना चाहिए, पुआल और भूसा आदि असार वस्तुओं को भी उठाकर ले जाना चाहिए।
( ४ ) अनाज रखने का स्थान ( प्रकर ) कुछ ऊँची जगह में बनवाना चाहिए, उसी प्रकार के मजबूत तथा घिरे हुए अन्नागारों को बनवाना चाहिए, उनके ऊपरी हिस्से न तो आपस में मिले हुए हों और न वे खाली हों।
( ५ ) कटे हुए अनाज को रखने की जगह ( खलिहान ) और दाँई लेने की जगह ( मण्डल ) दोनों आस-पास होने चाहिए। खलिहान में काम करने वाले व्यक्ति अपने पास आग न रखें किन्तु उनके पास जल का प्रबन्ध अवश्य होना चाहिए।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में चौबीसवां अध्याय समाप्त।
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