कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ४१ | सुराध्यक्षः अध्याय २५ |
(१) सुराध्यक्षः सुराकिण्वव्यवहारान् दुर्गे जनपदे स्कन्धावारे वा तज्जातसुराकिण्वव्यवहारिभिः कारयेदेकमुखमनेकमुखं वा, विक्रयक्रयवशेन वा। षट्छतमत्ययमन्यत्र कर्तृक्रेतृविक्रेतॄणां स्थापयेत् । ग्रामादनिर्णयनम-सम्पातं च सुरायाः, प्रमादभयात् कर्मसु निर्दिष्टानां मर्यादातिक्कमभया-दार्याणाम् । उत्साहभयाच्च तीक्ष्णानाम् ।
(२) लक्षितमल्पं वा चतुर्भागमर्धकुडुवं कुडुबमर्धप्रस्थं प्रस्थं वेति ज्ञातशौचा निर्हरेयुः ।
(३) पानागारेषु वा पिबेयुरसञ्चारिणः ।
(४) निक्षेपोपनिधिप्रयोगापहृतादीनामनिष्टोपगतानां च द्रव्याणां ज्ञानार्थमस्वामिकं कुप्यं हिरण्यं चोपलभ्य निक्षेप्तारमन्यत्र व्यपदेशेन ग्राहयेत् । अतिव्ययकर्तारमनायतिव्ययं च ।
आबकारी विभाग का अध्यक्ष
(१) आबकारी विभाग के अध्यक्ष (सुराध्यक्ष) को चाहिए कि वह दुर्ग, जनपद, अथवा छावनी आदि में सुरा के व्यापार का प्रबन्ध, शराब के बनाने वाले तथा बेचने वाले निपुण व्यक्तियों के द्वारा करवाये, शराब का ठेका एक बड़े व्यापारी को दिया जाय या अनेक छोटे-छोटे व्यापारियों को, अथवा क्रय-विक्रय की जैसी व्यवस्था उचित जँचे, तदनुसार ही उसकी विक्री का प्रबन्ध किया जाय । ठेक़ों के अलावा अन्यत्र शराब बनाने, बेचने और खरीदने वालों पर ६०० पण जुर्माना किया जाय । शराब तथा शराबी को गाँव से बाहर, एक घर से दूसरे घर, अथवा भीड़ में न जाने दिया जाय, क्योंकि ऐसा करने से एक तो राजकीय कर्मचारी कार्यों की हानि करने लगेंगे, दूसरे में आर्य लोग अपनी मर्यादा को भंग कर सकते हैं, और तीसरे में तेज मिजाज सैनिक हथियारों का भी प्रयोग कर सकते हैं ।
(२) सुविदित आचार-व्यवहार वाले लोग चौथाई कुडव, आधा कुडव, एक कुडव, आधा प्रस्थ या एक प्रस्थ मुहरबन्द शराब साथ भी ले जा सकते हैं ।
(३) जिन लोगों को शराब साथ ले जाने की आज्ञा न हो वे मदिरालय में ही बैठकर शराब पीयें ।
(४) यदि कोई व्यक्ति धरोहर, गिरवी, चोरी-डाका आदि का धन और सोना-चांदी आदि वस्तुओं को शराबखाने में गिरवी रख कर शराब पीये तो उसको वहाँ