भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) उदकद्रोणं तण्डुलानामर्धाढकं त्रयः प्रस्थाः किण्वस्येति मेदकयोगः । (२) द्वादशाढकं पिष्टस्य पञ्च प्रस्थाः किण्वस्य पुत्रकत्वक्फलयुक्तो वा जातिसम्भारः प्रसन्नायोगः । (३) कपित्थतुला फाणितं पञ्चतौलिकं प्रस्थो मधुन इत्यासवयोगः । पादाधिको ज्येष्ठः पादहीनः कनिष्ठः । (४) चिकित्सकप्रमाणाः प्रत्येकशो विकाराणामरिष्टाः । (५) मेषशृङ्गीत्वक्क्वाथाभिषुतो गुलप्रतीवापः पिप्पलीमरिचसम्भारस्त्रिफलायुक्तो वा मैरेयः । गुलयुक्तानां वा सर्वेषां त्रिफलासम्भारः । (६) मृद्वीकारसो मधु । तस्य स्वदेशे व्याख्यानं कापिशायनं हारहूरकमिति । (७) माषकलनीद्रोणमामं सिद्धं वा त्रिभागाधिकतण्डुलं मोरटादीनां कार्षिकभागयुक्तं किण्वाबन्धः ।


( १ ) एक द्रोण जल, आधा आढक चावल और तीन प्रस्थ सुराबीज (किण्व), इनके मेल से जो शराब बनाई जाती है उसका नाम मेदक है ।

( २ ) बारह आढक चावल की पिट्ठी, पाँच प्रस्थ सुराबीज ( किण्व ) अथवा उसकी जगह पुत्रक ( वृक्ष ) की छाल तथा फलों सहित जाति-संभार मिलाकर प्रसन्ना शराब तैयार की जाती है ।

( ३ ) सौ पल कैंथफल का सार, पाँच सौ पल राब और एक प्रस्थ शहद को एक साथ मिलाकर आसव शराब बनाई जाती है । उक्त वस्तुओं के योग को यदि सवापण कर दिया जाय तो उत्तम आसव और पौना कर दिया जाय तो घटिया आसव कहा जाता है ।

( ४ ) प्रत्येक रोग का अरिष्ट उसी प्रकार तैयार किया जाना चाहिए, जैसा कि रोग के अनुसार वैद्य बतलाये ।

( ५ ) मेढासिंगी की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें गुड़, पीपल और मिर्च का चूर्ण या पीपल, मिर्च की जगह त्रिफला का चूर्ण मिलाया जाय तो मैरेय शराब तैयार हो जाती है । गुड़ वाली सभी शराबों में त्रिफला का चूर्ण मिलाना आवश्यक है ।

( ६ ) दाख या अंगूर के रस से जो शराब बनाई जाती है उसी का नाम मधु है । अपने देश में उसके दो नाम है : कापिशायन और हारहूरक ।

( ७ ) एक द्रोण उड़द का कल्क, उसका तीसरा भाग ( १ ⅓ ) चावल और एक-एक कर्ष मोरटा आदि वस्तुएँ एक साथ मिलाकर किण्व सुरा बनती है, उसी को मद्यबीज या सुराबीज भी कहते हैं ।