कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 288, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण
(१) कुटुम्बिनः कृत्येषु श्वेतसुरामौषधार्थं वारिष्टमन्यद्वा कतुं लभेरन् । (२) उत्सवसमाजयात्रासु चतुरहः सौरिको देयः । तेष्वननुज्ञातानां प्रवहणान्तं दैवसिकमत्ययं गृह्णीयात् । (३) सुराकिण्वविचयं स्त्रियो बालाश्च कुर्युः । (४) अराजपण्याः पञ्चकं शतं शुल्कं दद्युः । सुरकामेदकारिष्टमधु-फलाम्लशीधूनां च । (५) अह्नश्च विक्रयं व्याजीं ज्ञात्वा मानहिरण्ययोः । तथा वैधरणं कुर्यादुचितं चानुवर्तयेत् ॥ इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे सुराध्यक्षो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चचत्वारिंशः ।
— : ० : —
शराब का रंग इतना निखर उठता है कि वह राजाओं तक को मोहित कर लेती है । स्वाद बढ़ाने के लिये उसमें पांच पल राब अधिक मिला देनी चाहिए ।
( १ ) नगर तथा जनपद के निवासी विवाह आदि उत्सवों में श्वेतसुरा और दवाई के लिए आसव अथवा मेदक आदि सुरा अपने घर में बना सकते हैं ।
( २ ) उत्सवों में, मित्र-बन्धुओं के समाज में और तीर्थयात्रा के अवसर पर, सुरा के अध्यक्ष को चार दिन तक सुरा पीने की इजाजत दे देनी चाहिए । यदि इन उत्सवों में कोई भी व्यक्ति बिना आज्ञा प्राप्त किये शराब पिये पकड़ा जाय तो उत्सव समाप्त होने पर उसको यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) सुरा को बनाने एवं उसका मसाला तैयार करने के लिये स्त्रियों और बालकों को नियुक्त करना चाहिए ।
( ४ ) बिना राजाज्ञा के जो व्यक्ति उत्सवों के अवसर पर शराब बेचें वे साधारण शराब, मेदक, अरिष्ट, मधु, ताड़ी और रसोत्तरा आदि सुराओं का पांच प्रतिशत शुल्क अदा करें ।
( ५ ) इस शुल्क अदायगी के अतिरिक्त सुराध्यक्ष दैनिक बिक्री और तोल-माप की उचित जानकारी प्राप्त कर नाप-तौल पर सोलहवाँ हिस्सा और नकद आमदनी पर बीसवां हिस्सा टैक्स वसूल करे, किन्तु उनके साथ सदा ही उचित व्यवहार बर्ताव बनाये रखे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में सुराध्यक्ष नामक पच्चीसवाँ अध्याय समाप्त ।
— : ० : —