कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ४४ : अ० २८ ] नौकाध्यक्ष २१५
(१) तेन भाण्डभारो व्याख्यातः । द्विगुणो महानदीषु तरः । (२) कॢप्तमानूपग्रामा भक्तवेतनं दद्युः । (३) प्रत्यन्तेषु तराः शुल्कमातिवाहिकं वर्तनीं च गृह्णीयुः । निर्गच्छतश्चासमुद्रस्य भाण्डं हरेयुः । अतिभारेणावेलायामतीर्थे तरतश्च । (४) पुरुषोपकरणहीनायामसंस्कृतायां वा नावि विपन्नायां नावध्यक्षो नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत् । (५) सप्ताहवृत्तामाषाढीं कार्त्तिकीं चान्तरा तरः । कार्मिकप्रत्ययं दद्यान्नित्यं चाह्निकमावहेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नावध्यक्षो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः, आदितोऽष्टपञ्चाशः । — : ० : —
छोटी गाड़ी का पाँच माषक, मझौली गाड़ी छह माषक, और बड़ी बैलगाड़ी का सात माषक भाड़ा देना चाहिए । बीस तुला बोझ का ३/४ पण भाड़ा निर्धारित है ।
( १ ) इसी हिसाब से भैंस या ऊँट आदि पर ढोये जाने वाले बोझा का भाड़ा समझ लेना चाहिए । बड़ी-बड़ी नदियों की उतराई इससे दुगुनी होनी चाहिए ।
( २ ) नदियों के किनारे बसे हुए लोग सरकारी टैक्स के अतिरिक्त कुछ निर्धारित भत्ता या वेतन भी मल्लाहों को दें ।
( ३ ) पार उतारने वाले राजकीय मल्लाह सीमाप्रदेशों में व्यापारियों से मार्ग का टैक्स और अन्तपाल को दिया जाने वाला शुल्क भी अदा करें । जो व्यापारी बिना मुहर के माल को निकालते पकड़ा जाय उसका सारा माल जब्त कर लिया जाय । जो व्यक्ति, अनिमियत बोझा असमय और बिना घाट के ही पार उतारने की कोशिश करे उसका भी सारा माल जब्त कर लिया जाय ।
( ४ ) मल्लाहों की असावधानी, अन्य आवश्यक साधनों से हीन और बिना मरम्मत की सरकारी नौका यदि डूब जाय तो यात्रियों का सारा हर्जाना नौकाध्यक्ष पूरा करे ।
( ५ ) आषाढ़ी पूर्णिमा से लेकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के एक सप्ताह बाद तक की अवधि के बीच बरसाती नदियों में नौका-कर लिया जाना चाहिए ( किन्तु सदा बहने वाली नदियों में तो हमेशा ही टैक्स लेना चाहिए ) । प्रत्येक मल्लाह को चाहिए कि वह प्रतिदिन के कार्य का विवरण और दैनिक भाग नौकाध्यक्ष के सुपुर्द कर दे ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नौकाध्यक्ष नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ।
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