भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) एतेन नस्यदम्ययुगपिङ्गनवर्तनकाला व्याख्याताः । (२) क्षीरद्रोणे गवां घृतप्रस्थः । पञ्चभागाधिको महिषीणाम् । द्विभागाधिकोऽजावीनाम् । मन्थो वा सर्वेषां प्रमाणं, भूमितृणोदकविशेषाद्धि क्षीरघृतवृद्धिर्भवति । (३) यूथवृषं वृषेणावपातयतः पूर्वः साहसदण्डः, घातयत उत्तमः । (४) वर्णाविरोधेन दशतीरक्षाः । उपनिवेशदिग्विभागो गोप्रचाराद् बलान्वयतो वा गवां रक्षासामर्थ्याच्च । अजावीनां षाण्मासिकोमूर्णां ग्राहयेत् । तेनाश्वखरोष्ट्रवराहव्रजा व्याख्याता । (५) बलीवर्दनां नस्याश्वभद्रगतिवाहिनां यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणं, तुला घाणपिण्याकस्य, दशाढकं कणकुण्डकस्य, पञ्चपलिकं मुखलवणं, तैलकुडुबो नस्यं, प्रस्थः पानम् । मांसतुला, दध्नश्चाढकं, यवद्रोणं, माषाणां वा पुलाकः । क्षीरद्रोणमर्धाढकं वा सुरायाः, स्नेहप्रस्थः क्षारदशपलं शृङ्गिबेरपलं च प्रतिपानम् ।


(१) इसी प्रकार जो व्यक्ति ठीक समय पर बैलों को न नाथे, ठीक समय पर नये बैलों को बाण पर न लगाये, नौसिखिये तथा पूरे बैल को एक साथ जोते, और बैलों को ठीक समय पर न सिखाये, उन्हें भी उस दिन का वेतन नहीं देना चाहिए ।

(२) एक द्रोण गाय के दूध में एक प्रस्थ घी निकलता है । यदि एक द्रोण भैंस का दूध हो तो उसमें पाँच प्रस्थ घी निकलता है । बकरी और भेड़ के एक द्रोण दूध में ३/२ घी निकलता है । किसी भी पशु के दही को मथकर ही उसमें निकलने वाले घी का ठीक परिमाण निर्धारित किया जा सकता है । भूमि, घास, पानी आदि की अधिक सुविधा के ऊपर ही दूध-घी की वृद्धि निर्भर है ।

(३) यदि कोई व्यक्ति गोष्ठ के सांड़ को किसी दूसरे सांड़ से लड़ाये तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए, उसको मारे तब भी उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

(४) एक रंग की दस गाएँ, इस प्रकार की दस वर्णों की सौ गाएँ करके किसी ग्वाले को रक्षा के लिए दे देनी चाहिएँ । गायों के रहने और चरने की नियमित व्यवस्था, उनकी तादात को एवं उनकी सुरक्षा को देखकर ही करनी चाहिए। बकरी और भेड़ की ऊन छह मास बाद उतार लेनी चाहिए । गाय, भैंसों के अनुसार ही घोड़े, गधे, ऊँट और सूअरों की भी यथोचित व्यवस्था की जानी चाहिए ।

(५) नथे हुए बैलों और घोड़ों के रथ पर जुते जाने वाले श्रेष्ठ बैलों को आधा भार (दस तुला) हरी घास, उससे दुगुनी भूसी, दस आढक सानी, पाँच पल नमक, एक कुडव तेल नाक में, एक प्रस्थ तेल पीने के लिये देना चाहिए, इसके अतिरिक्त