कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण ४६
अध्याय ३०
अश्वाध्यक्षः
(१) अश्वाध्यक्षः पण्यागारिकं क्रयोपगतमाहवलब्धमाजातं साहा-
य्यागतं पणस्थितं यावत्कालिकं वाश्वपर्यग्रं कुलवयोवर्णचिह्नकर्मवर्गा-
गमैर्लेखयेत् ।
(२) अप्रशस्तन्यङ्गव्याधितांश्चावेदयेत् ।
(३) कोशकोष्ठागाराभ्यां च गृहीत्वा मासलाभमश्ववाहश्चिन्तयेत् ।
(४) अश्वविभवेनायतामश्वायामद्विगुणविस्तारां चतुर्द्वारोपावर्तन-
मध्यां सप्रग्रीवां प्रद्वारासनफलकयुक्तां वानरमयूरपृषतनकुलचकोरशुकशा-
रिकाभिराकीर्णां शालां निवेशयेत् ।
(५) अश्वायामचतुरश्रश्लक्ष्णफलकास्तारं सखादनकोष्ठकं समूत्र-
पुरीषोत्सर्गमेकैकशः प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा स्थानं निवेशयेत् । शालावशेन
वा दिग्विभागं कल्पयेत् । वडबावृषकिशोराणाम् एकान्तेषु ।
अश्वविभाग का अध्यक्ष
( १ ) अश्वशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, भेंटस्वरूप प्राप्त, खरीदे हुए, युद्ध में मिले हुए, अपने यहाँ पैदा हुए, बदले में प्राप्त, रेहन रखे हुए और कुछ समय के लिए सहायतार्थ प्राप्त, इन सभी प्रकार के घोड़ों को उनकी नस्ल, उम्र, रंग, चिह्न, समूह, कर्म और कहाँ से वे मिले हैं, इन सभी बातों का विवरण अपने रजि-स्टर में दर्ज करे ।
( २ ) बुरी नस्ल वाले, लंगड़े-लूले और बीमार घोड़ों को बदल देना चाहिए या उनका उचित इलाज करना चाहिए ।
( ३ ) कोष और कोष्ठागार से एक महीने का पूरा खर्च लेकर साईस को चाहिए कि वह सावधानीपूर्वक घोड़ों की टहल-सेवा करे ।
( ४ ) घोड़ों को रखने के लिये ऐसी घुड़साल बनवाई जाय, जो घोड़ों की संख्या के अनुसार लम्बी और घोड़ों की लम्बाई से दुगुनी चौड़ी हो, उसमें चार दरवाजे, काफी फैलाव, बड़ा बरामदा, दरवाजों के दोनों ओर चबूतरे हों और जो बन्दर, मोर, नेवला, चकोर, तोता तथा मैना आदि से घिरी हुई हो ।
( ५ ) घोड़े की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार एक समतल चौकोर तख्ता बिछा होना चाहिए । इसके अतिरिक्त घास-भूसा खाने के लिए लकड़ी की नाँद, पेशाब