कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२३
(१) बडबायाः प्रजातायास्त्रिरात्रं घृतप्रस्थपानम् । अत ऊर्ध्वं सक्तु प्रस्थः स्नेहभैषज्यप्रतिपानं दशरात्रं, ततः पुलाको यवसमार्तवश्चाहारः । (२) दशरात्रादूर्ध्वं किशोरस्य घृतचतुर्भागः सक्तुकुडवः क्षीरप्रस्थ- श्चाहार आ षण्मासादिति । ततः परं मासोत्तरमर्धवृद्धैर्यवप्रस्थ आत्रि- वर्षाद्, द्रोण आ चतुर्वर्षादिति । अत ऊर्ध्वं चतुर्वर्षः पंचवर्षो वा कर्मण्यः पूर्णप्रमाणः । (३) द्वात्रिंशदङ्गुलं मुखमुत्तमाश्वस्य, पञ्चमुखान्यायामः, विंशत्य- ङ्गुला जङ्घा, चतुर्जङ्घ उत्सेधः । त्र्यङ्गुलावरं मध्यमावरयोः । शताङ्गुलः परिणाहः । पञ्चभागावरं मध्यमानरयोः । (४) उत्तमाश्वस्य द्विद्रोणं शालिव्रीहियवप्रियङ्गुणामर्धशुष्कमर्धसिद्धं
तथा लीद रखने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, घुड़सालों के दरवाजे पूरव तथा उत्तर की ओर होने चाहिएँ, घोड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग खूंटे होने चाहिएँ। घुड़साल, या तो राजमहल के उत्तर-पूरव में होनी चाहिए; यदि ऐसा सम्भव न हो तो सुविधानुसार उचित दिशाओं की ओर उनके दरवाजे बना दिए जाँय । प्रसवा घोड़ियों, साँड़, घोडों और छह मास से तीन वर्ष तक के बछेड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिएँ ।
( १ ) जब घोड़ी व्याये तो उसे तीन दिन तक एक प्रस्थ घी पीने के लिए दिया जाना चाहिए । तदनन्तर दस दिन तक उसे एक प्रस्थ सत्तू और चिकनाई में मिली दवा पीने के लिए दी जानी चाहिए । उसके बाद उसे अधपके जौ का साँदा, घास और ऋतु के अनुसार आहार देना चाहिए ।
( २ ) नये पैदा हुए घोड़ों के बछड़े को दस दिन बाद एक कुडव सत्तू में चौथाई घी मिला कर देना चाहिए । छह महीने तक उसे एक प्रस्थ दूध प्रतिदिन दिया जाना चाहिए । तदनन्तर उसको जौ का एक प्रस्थ और उसमें उत्तरोत्तर प्रतिमास आधा प्रस्थ बढ़ाकर तीन वर्ष तक यही आहार देना चाहिए । उसके बाद पूरे एक वर्ष तक प्रतिदिन उसे एक द्रोण आहार मिलना चाहिए । तब जाकर चार या पाँच वर्ष में वह पूरी तरह काम लेने लायक होता है ।
( ३ ) जिस घोड़े की खाब बत्तीस अंगुल, लम्बाई एक-सौ-साठ अंगुल, जंघा बीस अंगुल और ऊँचाई अस्सी अंगुल हो वह उत्तम होता है । उससे तीन अंगुल कम परिमाण का घोड़ा मध्यम और उससे भी तीन अंगुल कम परिमाण को घोड़ा अधम कोटि का समझना चाहिए । उत्तम घोड़े की मोटाई सौ अंगुल, मध्यम घोड़े की मोटाई अस्सी अंगुल और अधम घोड़े की मोटाई चौंसठ अंगुल होती है ।
( ४ ) उत्तम घोड़ों को साठी, चावल, गेहूँ, जौ, काकुन आदि में से कोई भी दो