कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र . [ दूसरा अधिकरण
वा मुद्गमाषाणां वा पुलाकः । स्नेहप्रस्थश्च । पञ्चपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशत्पलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दघ्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारपञ्चपलिकः सुरायाः प्रस्थः पयसो वा द्विगुणः प्रतिपानम् । दीर्घपथभारक्लान्तानां च खादनार्थं स्नेहप्रस्थोऽनुवासनम् । कुडुबो नस्यकर्मणः । यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणः, षडरत्निपरिक्षेपः पुञ्जीलग्रहो वा ।
(१) पादावरमेतन्मध्यमावरयाः । उत्तमसमो रथ्यो वृषश्च मध्यमः । मध्यमसमश्चावरः पादहीनं वडवानां पारशमानां च । अतोऽर्धं किशोराणां च । इति विधायोगः ।
(२) विधापाचकमूत्रग्राहचिकित्सकाः प्रतिस्वादभाजः ।
(३) युद्धव्याधिजराकर्मक्षीणाः पिण्डगोचरिकाः स्युः । असमरप्रयोज्याः पौरजानपदानांर्थेन वृषा बडबास्वायोज्याः ।
द्रोण धान्य अधपका या अधसूखा, ख़ूराक में देना चाहिए; अथवा इतना ही मूंग या उड़द का साँदा बनाकर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त एक प्रस्थ घी या तेल; पाँच पल नमक पचास पल मांस एक आढक शोरवा या दो आढक दही में भीगी हुई सानी, पाँच पल गुड़ के साथ एक प्रस्थ शराब अथवा दो प्रस्थ दूध, प्रतिदिन तीसरे पहर पीने के लिये दिया जाना चाहिए । लम्बा सफर और अधिक बोझा उठाने के कारण थके हुये घोड़ों को एक प्रस्थ घी या तेल और साथ ही उतने ही परिमाण की थकावट को दूर करने वाली दवाइयों का मिश्रण ( अनुवासन ) पिलाना चाहिए । एक कुडव घी या तेल उसके नाक में छोड़ना चाहिए, खाने के लिये उसको दस तुला भूसा, बीस तुला हरी घास या जई आदि देना चाहिए ।
( १ ) उत्तम घोड़े की उक्त ख़ूराक का चौथाई हिस्सा कम मध्यम घोड़े की और उसमें से भी चौथाई हिस्सा कम अधम घोड़े की ख़ूराक है । जो मध्यम घोड़ा रथ में जोता जाय तथा जो साँड़ घोड़ी पर छोड़ा गया हो उनको भी उत्तम घोड़े का आहार देना चाहिये । इसी प्रकार जो अधम घोड़े रथ में जोते जाँय या साँड़ छोड़े जाँय उनको मध्यम घोड़े का आहार देना चाहिए । इस आहार से चौथा हिस्सा कम घोड़ी और खच्चरों का आहार है । उसका आधा आहार बछड़ों को देना चाहिए । यही घोड़ों के आहार का विधान है ।
( २ ) घोड़ों की परिचर्या करने वाले साईसों और उनकी चिकित्सा करने वाले वैद्यों को भी घोड़े के आहार में से कुछ हिस्सा दिया जाना चाहिए ।
( ३ ) जो घोड़े युद्ध के कारण, बीमारी, बुढ़ापे और भार ढोने के कारण, अशक्त तथा बेकार हो चुके हैं, उन्हें उतना ही आहार दिया जाय कि वे भूखे न मर सकें । जो घोड़े हृष्ट-पुष्ट होकर भी युद्धोपयोगी न हों, उन्हें नगर तथा जनपद के निवासियों की घोड़ियों में नस्ल पैदा करने के लिए साँड़ बना दिया जाय ।