भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पड़ोसी हैं जिनको कि अपरांत कहा गया है, प्रजातन्त्र राज्य थे, जिनमें से कुछ तो अपने सुदृढ़ संघातों में बद्ध होकर बहुत बाद तक बने रहे; जैसे कि राष्ट्रिक, भोजक आदि; और कुछ संघातरहित गणराज्यों को मौर्य साम्राज्य ने स्वायत्त कर सदा के लिए विच्छिन्न कर दिया था।

इस प्रकार हिन्दू प्रजातन्त्र का इतिहास बहुत प्राचीन है और प्रत्येक युग की शासन-प्रणाली में प्रजा की अभिरुचियों एवं धारणाओं को अधिक सम्मान के साथ अपनाया जाता रहा है। प्राचीन भारत के संघातराज्यों का अविजित शासन इस बात का प्रमाण है कि राज्यों के निर्माण-विकास में प्रजा का कितना महत्त्वपूर्ण सहयोग प्राप्त था।

अर्थशास्त्र में वर्णित संघराज्यों का वृत्तान्त

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में तत्कालीन संघराज्यों के वृत्तांत के लिए स्वतन्त्र अधिकरण ( ११ वाँ अधिकरण ) की रचना की है। इन संघराज्यों के वृत्त से हमें उनके सुदृढ़ संघटन और साम्राज्य के प्रति उनकी रीति-नीति का अच्छा परिचय मिलता है। यद्यपि प्रतापी सिकन्दर के आक्रमणों ने तत्कालीन भारत के बहुत-से छोटे राज्यों को ध्वस्त कर दिया था, तथापि उससे एक बड़ा कार्य यह हुआ कि विघटित छोटे-छोटे राज्यों को एक संघटित संघराज्य की स्थापना के लिए प्रेरित किया।

कौटिल्य ने दो प्रकार के संघराज्यों का उल्लेख किया है : एक तो राजा उपाधि धारण करने वाले राजशासित राज्य और दूसरे बिना राजा की उपाधि धारण करने वाले संघराज्य। इन संघराज्यों की उपयोगिता के संबंध में कौटिल्य का अभिमत है कि ‘दण्डलाभ और मित्रलाभ, दोनों की अपेक्षा संघलाभ उत्तम होता है। संघटित होने के कारण संघराज्यों को बलवान्-से-बलवान् शत्रु भी दबा नहीं सकता।’ ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६६ )

राजा की उपाधि धारण करने वाले जिन संघराज्यों के सम्बन्ध में कौटिल्य ने प्रकाश डाला है उनके नाम हैं : लिच्छिविक, वृजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु और पांचाल। दूसरी श्रेणी के, बिना राजा की उपाधि वाले संघराज्यों को कौटिल्य ने शस्त्र, व्यापार और कृषि द्वारा जीविका-निर्वाह करने वाले बताये हैं। उनके नाम हैं : कांबोज, सुराष्ट्र, क्षत्रिय और श्रेणी आदि ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६६ )। विजय की इच्छा रखने वाले राजा को किस रीति-नीति से इन संघराज्यों को स्वायत्त करना चाहिए अथवा मित्रता द्वारा