कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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उनसे किस प्रकार लाभ उठाना चाहिए, इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६९-६७५ )।
ऐतिहासिक दृष्टि से अब हम उक्त संघराज्यों और उनकी प्रजातन्त्रात्मक शासन-प्रणाली पर विचार करेंगे।
लिच्छवी : भारतीय इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान् डा० विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि लिच्छवियों का सम्बन्ध तिब्बत से था। इस सम्बन्ध में पहिली दलील तो उन्होंने यह दी है कि लिच्छवियों के बीच तिब्बत में प्रचलित यह प्रथा वर्तमान थी कि वे अपने मृतकों को यों ही जंगल में फेंक आते थे; और दूसरा आधार उन्होंने यह दिया है कि लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली तिब्बत में प्रचलित न्याय-प्रणाली से बहुत-कुछ मिलती-जुलती है (अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया, तीसरा संस्करण, पृ० १५५ )। इसी अभिमत को स्मिथ साहब अपने एक निबन्ध ‘लिच्छवियों का तिब्बती रक्त-संबंध’ में बहुत पहिले प्रकट कर चुके थे ( इण्डियन एंटीक्वेरी, पृ० २३३-२३५, १६०३ )। इन आधारों पर उन्होंने लिच्छवियों का मूल-निवास तिब्बत बताया है।
किन्तु डा० जायसवाल ने संस्कृत के नाटकों, सनातनी हिन्दुओं में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों और मनुस्मृति में उल्लिखित प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि शव-संस्कार की उक्त प्रथा का पुरातन हिन्दुओं में व्यापक रूप से प्रचार था। इस सम्बन्ध में उन्होंने ‘अट्ठकथा’ के प्रामाणिक विवरण को भी उद्धृत करते हुए डा० स्मिथ की इस धारणा का भी खंडन किया है कि लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली, तिब्बतियों की न्याय-प्रणाली से मिलती है। लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली, को डा० जायसवाल ने महाभारत में प्रतिपादित ( शांतिपर्व, अध्याय १०७ ) गणतन्त्रों की न्याय-प्रणाली पर आधारित बताया है ( हिन्दू-राजतन्त्र, १, पृ० २४६-२५४ )।
व्याकरण-व्युत्पत्ति के अनुसार लिच्छु के अनुयायी या वंशज लिच्छवी कहलाते हैं। यह नाम उनकी आकृति के अनुसार पड़ा हुआ मालूम होता है। बौद्धग्रन्थ महापरिनिब्बान सुत्त ( ५।१९ ) में लिच्छवियों के पड़ोसी वाशिष्ठ मल्ल कहे गये हैं। लिच्छवियों का मूल-निवास वैशाली था, जिनकी वंशपरम्परा आर्यों से संबद्ध है। वे विशुद्ध भारतीय थे। विदेह और लिच्छवि, दोनों एक ही राष्ट्रीय नाम वृजि से प्रसिद्ध थे। दोनों ही एक राष्ट्र या एक जाति की दो शाखायें थीं ( हिन्दू-राजतन्त्र, १, पृ० २५४ )।