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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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उनसे किस प्रकार लाभ उठाना चाहिए, इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। ( अर्थशास्त्र, पृ० ६६९-६७५ )।

ऐतिहासिक दृष्टि से अब हम उक्त संघराज्यों और उनकी प्रजातन्त्रात्मक शासन-प्रणाली पर विचार करेंगे।

लिच्छवी : भारतीय इतिहास के प्रकाण्ड विद्वान् डा० विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि लिच्छवियों का सम्बन्ध तिब्बत से था। इस सम्बन्ध में पहिली दलील तो उन्होंने यह दी है कि लिच्छवियों के बीच तिब्बत में प्रचलित यह प्रथा वर्तमान थी कि वे अपने मृतकों को यों ही जंगल में फेंक आते थे; और दूसरा आधार उन्होंने यह दिया है कि लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली तिब्बत में प्रचलित न्याय-प्रणाली से बहुत-कुछ मिलती-जुलती है (अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया, तीसरा संस्करण, पृ० १५५ )। इसी अभिमत को स्मिथ साहब अपने एक निबन्ध ‘लिच्छवियों का तिब्बती रक्त-संबंध’ में बहुत पहिले प्रकट कर चुके थे ( इण्डियन एंटीक्वेरी, पृ० २३३-२३५, १६०३ )। इन आधारों पर उन्होंने लिच्छवियों का मूल-निवास तिब्बत बताया है।

किन्तु डा० जायसवाल ने संस्कृत के नाटकों, सनातनी हिन्दुओं में प्रचलित सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों और मनुस्मृति में उल्लिखित प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि शव-संस्कार की उक्त प्रथा का पुरातन हिन्दुओं में व्यापक रूप से प्रचार था। इस सम्बन्ध में उन्होंने ‘अट्ठकथा’ के प्रामाणिक विवरण को भी उद्धृत करते हुए डा० स्मिथ की इस धारणा का भी खंडन किया है कि लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली, तिब्बतियों की न्याय-प्रणाली से मिलती है। लिच्छवियों की न्याय-प्रणाली, को डा० जायसवाल ने महाभारत में प्रतिपादित ( शांतिपर्व, अध्याय १०७ ) गणतन्त्रों की न्याय-प्रणाली पर आधारित बताया है ( हिन्दू-राजतन्त्र, १, पृ० २४६-२५४ )।

व्याकरण-व्युत्पत्ति के अनुसार लिच्छु के अनुयायी या वंशज लिच्छवी कहलाते हैं। यह नाम उनकी आकृति के अनुसार पड़ा हुआ मालूम होता है। बौद्धग्रन्थ महापरिनिब्बान सुत्त ( ५।१९ ) में लिच्छवियों के पड़ोसी वाशिष्ठ मल्ल कहे गये हैं। लिच्छवियों का मूल-निवास वैशाली था, जिनकी वंशपरम्परा आर्यों से संबद्ध है। वे विशुद्ध भारतीय थे। विदेह और लिच्छवि, दोनों एक ही राष्ट्रीय नाम वृजि से प्रसिद्ध थे। दोनों ही एक राष्ट्र या एक जाति की दो शाखायें थीं ( हिन्दू-राजतन्त्र, १, पृ० २५४ )।

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वृज्जी : अर्थशास्त्रकार ने जहाँ वृज्जियों का उल्लेख किया है, वहाँ विदेहों को ही लिया है। पाणिनि ने वृजिक और मद्रक शब्दों के लिए जो अर्थ दिया है (अष्टाध्यायी ४।२।१३१) उसी को अर्थशास्त्रकार ने भी ग्रहण किया है। कात्यायन ने भी मद्रों और वृजियों के प्रजातन्त्री उदाहरण दिये हैं; अर्थात् मद्र का भक्त (राजभक्त) मद्रक और वृजी का भक्त वृजिक कहा जायेगा (अष्टाध्यायी वार्तिक ४।३।१००; महाभाष्य, ४।२।४५; ५।३।५२) कौटिल्य ने ऊपर राजशब्दोपजीवी संघों में मद्रक और वृजिक रूपों का ही उल्लेख किया है। वृजियों की शासन-प्रणाली कुलिक (उच्चकुलोत्पन्न) आधार पर थी। उसके न्यायालय के तीन प्रमुख अधिकारी हुआ करते थे। सेनापति, उपराज और राजा। वृजि लोग दाक्षिणात्य थे।

वृजियों के संबंध में हमें बौद्ध ग्रन्थ 'दीघनिकाय' में पुष्कल सामग्री देखने को मिलती है। प्रसंग ऐसा है कि एक समय मगध के राजा की ओर से उसका महामन्त्री भगवान् बुद्ध के पास इस आशय की एक जिज्ञासा लेकर आया कि वज्जियों (वृजियों), लिच्छवियों और विदेहों पर उसे आक्रमण करना चाहिए या नहीं। उसके उत्तर में बुद्ध ने अपने शिष्य आनन्द को सम्बोधित करते हुए वृजियों के संबंध में सात प्रश्न किये थे। इन सात प्रश्नों में उन्होंने वृजियों की शासन-प्रणाली और उनके सुदृढ़ संघटन पर प्रकाश डाला है। (डाइलाग्स आफ दि बुद्धा, भाग २, पृ० ७६-८५; सेक्रेड बुक्स आफ दि ईस्ट, भाग ११, पृ० ३-६; हिन्दू-राजतन्त्र, भाग १, पृ० ५९-६१)।

मल्ल : लिच्छवियों और वृजियों की ही भाँति मल्लों का उल्लेख भी विभिन्न ग्रन्थों में पाया जाता है। मज्झिमनिकाय में संघों और गणों के प्रसंग में कहा गया है कि "हे गोतम, यह बात संघों और गणों के सम्बन्ध में है; जैसे वज्जि और मल्ल" (मज्झिमनिकाय १।४।५।३५)। एक जैन-ग्रंथ में गण शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि गण मनुष्यों का वह समूह है जिसका मुख्य गुण मनयुक्त (सचित्त) अथवा विवेक युक्त होता है; जैसे मल्लों का गण (अभिधानराजेन्द्र, खण्ड ३, पृ० ८१२)।

प्रो० रायस डेविड्स तथा डा० जायसवाल का अभिमत है कि मल्लों का राज्य बहुत विस्तृत था। उसका विस्तार गोरखपुर जिला से पटना तक फैला हुआ था। वह दो भागों में विभक्त था, जिसमें एक की राजधानी कुशीनगर और दूसरे की पावा में थी। डायलाग्स आफ दि बुद्धा, भाग २, पृ० १७९—१७९०; हिन्दू-राजतंत्र, भाग १, पृ० ६२) राजनीतिक दृष्टि से वृजियों और मल्लों, दोनों का प्राचीन भारत के संघ राज्यों में सर्वोच्च स्थान था।

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मल्लों के बृहद् संस्थागार ( सार्वजनिक भवन—House of Communal Law ) का उल्लेख महापरिनिब्बान सुत्त ( ६।२३ ) में हुआ है। इसमें लिखा गया है कि बुद्ध भगवान् के निर्वाण की सूचना देने के लिए आनंद जब मल्लों के यहाँ पहुँचा तो उस समय उक्त संस्थागार में मल्ल लोग एकत्र होकर उसी विषय पर विचार कर रहे थे। जैनों के ‘कल्पसूत्र’ ( पृ० १२८ ) से विदित होता है कि विदेहों और लिच्छवियों ने एक संयुक्त लीग की स्थापना की थी, जिसमें नौ सदस्य मल्लों के थे।

लिच्छवियों के प्रसंग में पहिले बताया गया है कि वे मल्लों के पड़ोसी थे। मल्लों को महापरिनिब्बान सुत्त ( ५।१६ ) में वाशिष्ठ कहा गया है, जो आर्यों का एक प्रसिद्ध गोत्र था। डा० जायसवाल का कहना है कि मौर्य राज्य की स्थापना के बाद मल्लों की प्रजातंत्र शासन-प्रणाली समाप्त हो चुकी थी, किन्तु ११वीं शताब्दी तथा उसके बाद तक तिरहुत तथा नेपाल में उनके भिन्न-भिन्न वंश प्रतिष्ठित-प्रकाशित होते रहे। गोरखपुर और आजमगढ़ में आज भी मल्लों के वंशज बचे हुए हैं, जो कि व्यापार आदि से जीविकोपार्जन करते हैं हिन्दू-राजतंत्र भाग १, पृ० ७७)।

मद्रक : मद्रकों का इतिहास बहुत प्राचीन है। यजुर्वेद ( १५।११।१३ ) और ऐतरेय ब्राह्मण ( ८।१४ ) में जिस प्रजातंत्री शासन-प्रणाली का उल्लेख मिलता है, उसमें उत्तर मद्र और उत्तर कुरु भी सम्मिलित हैं। पाणिनि की अष्टाध्यायी में मद्रों का उल्लेख दिशा के विचार से हुआ है, जिससे प्रतीत होता है कि उनके शासन के दो विभाग थे। (अष्टाध्यायी ४।२।१०८, ७।३।१३)। एक गुप्तकालीन शिलालेख (फ्लीट : गुप्त इन्सक्रिप्शन्स, पृ० ८) से विदित होता है कि पाणिनि के समय में मद्र लोगों की प्रजातंत्र शासन-प्रणाली प्रचलित थी और उनकी यह स्थिति लगभग चौथी शताब्दी ई० पूर्व तक बनी रही, मद्रों के दो कुल थे : एक तो उत्तर में और दूसरा दक्षिण में। दोनों की शासन-प्रणाली भिन्न-भिन्न थी। इस संबंध में हमें यह भी पता चलता है कि उत्तर-कुरुओं के प्रकाश में आने तक उत्तर मद्रों का अस्तित्व पौराणिक कोटि में चला गया था। उनका वैभव अब कथा-कहानियों भर में ही रह गया था। (मिलिंदपञ्ह, खंड १, पृ० २-३)।

महाभारत (कर्णपर्व, अध्याय ११, ४४) से हमें पता चलता है कि उत्तर मद्रों की राजधानी शाकल (संभवतः स्यालकोट) थी। उन्होंने शाकल के आसपास के प्रदेश का नाम अपने नाम पर मद्र रख छोड़ा था। मिलिंदपञ्ह के उल्लेखानुसार दूसरी शताब्दी ई० पूर्व में उक्त शाकल नगर मिनेडर

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के कब्जे में चला गया था ( गुप्त इन्सक्रिप्शन्स, पृ० ८ )। संभवतः उसी समय मद्र लोग उत्तर को छोड़कर दक्षिण में गये, जहाँ उस समय गुप्तों का सुख-संपन्न शासन स्थापित था ( हिन्दू-राजतंत्र, भाग १, पृ० १२६ )। मद्रों की मुठभेड़ समुद्रगुप्त के साथ हुई थी। इसके बाद उनका कोई इतिहास नहीं मिलता है।

मद्रों की एक विशेषता उनके सिक्कों में दिखाई देती है। उन्होंने हस्ताक्षर-युक्त सिक्के चलाये थे। उनका कोई भी ऐसा सिक्का नहीं मिला है, जिस पर किसी प्रकार का लेख न खुदा हो।

कुकुर : कौटिल्य ने जिस राजा-शासित कुकुर संघ का उल्लेख किया है, वह अंधक वृष्णी के संयुक्त संघ का एक अंग था। पश्चिम भारत में प्रथम शताब्दी के अंत में उपलब्ध होने वाले शिलालेखों में कुकुरों का उल्लेख मिलता है ( एपिप्राफिया इण्डिका, भाग ८, पृ० ४४, ६० )। कुकुरों के संबंध में अधिक विवरण उपलब्ध नहीं होता है। संभवतः १५० ई० पूर्व के बाद रुद्र-दामन् का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर कुकुरों का अस्तित्व उसी में खो गया।

कुरु : कुरुओं का इतिहास बहुत पुराना जान पड़ता है। वैदिक युग में हिन्दू समाज के जिन विभिन्न वर्गों ( विशों ) का उल्लेख मिलता है उनमें कुरुओं का नाम भी आता है। वे स्वयं को आर्य कहा करते थे ( मेकडानल तथा कीथ : वैदिक इण्डेक्स )।

कुरुओं को कौटिल्य ने प्रजातंत्रवादी बताया है; किन्तु ऐतरेय ब्राह्मण ( पृ० ८।१४ ) में कुरुओं और पांचालों को एकराजत्व शासन-प्रणाली वाले संघ बताया गया है। बुद्ध के समय में उनके राज्य का अस्तित्व धुंधला पड़ गया था। संभवतः बुद्ध के बाद और कौटिल्य से पूर्व ही उन्होंने प्रजातंत्र को अपनाया होगा।

पांचाल : पांचालों के संबंध में जैसा बताया गया है कि पहिले वे एक राजस्त्र शासन के पोषक रहे हैं; किन्तु कुरुओं की ही भाँति बुद्ध के निर्वाण के बाद वे भी प्रजातंत्रवादी हो गये थे, जिस रूप उल्लेख कौटिल्य ने किया है। पांचालों का राज्य मौर्यों के उपरान्त भी बना रहा।

काम्बोज : राजा की उपाधि धारण करने वाले उक्त राजसंघों के अतिरिक्त कौटिल्य ने शस्त्र, व्यापार और कृषि द्वारा जीविका-निर्वाह करने वाले गणतंत्रों में काम्बोज, सुराष्ट्र, क्षत्रिय तथा श्रेणी आदि का उल्लेख किया है।

काम्बोजों का मूल स्थान पूर्वी अफगानिस्तान ( काबुल नदी, आधुनिक

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कंबोह के तट पर ) था। अशोक के शिलालेखों में उनका उल्लेख गांधारों के बाद आया है ( पाँचवां अभिलेख ) । पाणिनि ने कांबोजों का उल्लेख किया है ( अष्टाध्यायी ४।१।१७५ ), जिससे प्रतीत होता है कि कांबोजों में जो राजा होता था वह एकराज होता था अथवा निर्वाचित शासक होता था। कौटिल्य के समय में कांबोजों की शासन-व्यवस्था, पाणिनि के दृष्टिकोण की अपेक्षा सर्वथा बदली हुई दिखाई देती है। कांभोज का शब्दार्थ है : निकृष्ट भोज । कांबोज भी उसका पर्याय है।

यास्क ( ७०० ई० पूर्व ) के कथनानुसार कांभोजों की मातृभाषा संस्कृत थी; किन्तु उनकी भाषा में पड़ोसी ईरानियों की भाषा के रूप मिल गये थे ( निरुक्त २।१।३।४ ) ।

सुराष्ट्र : सुराष्ट्र लोग काठियावाड़ के निवासी थे । वलभी के ५८ ई० पूर्व के शिलालेखों ( जिनका प्रामाणिक वंशक्रम डा० जायसवाल ने तैयार किया है, देखिए जे० बी० ओ० आर० एस०, १, १०१; १९१४; एपिग्रफिया इण्डिका, भाग ८, पृ० ४४ ) और रुद्रदामन् के जूनागढ़ वाले शिलालेखों ( एपिग्राफिया इण्डिका, भाग ८, पृ० ६० ), जिनकी स्थिति दूसरी शताब्दी ई० की है, से विदित होता है कि सुराष्ट्र लोग मौर्य-साम्राज्य के बाद भी बने रहे । किन्तु दूसरी शताब्दी ई० के लगभग उनके संघटन का महत्त्व लोप हो गया था; उसके बाद उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व न रह गया था ( हिन्दू-राजतंत्र १, पृ २१६ ) ।

क्षत्रिय : श्रेणी : क्षत्रियों और श्रेणियों के संबंध में कहा गया है कि ये सिंध के रहने वाले, एक-दूसरे के पड़ोसी थे एरियन, भाग ६, प्रकरण १५ ) । यूरोपीय विद्वानों ने क्षत्रियों को एक विशिष्ट उपजाति ( Xathroi ) कहा है किन्तु अर्थशास्त्र से विदित होता है कि वह नाम एक विशिष्ट राजनीतिक संघ का था । श्रेणियों के लिए भिन्न-भिन्न नाम दिये गये हैं ( ऐश्येंट इण्डिया, इट्स इन्वेजन बाई अलेक्जेंडर दि ग्रेट, पृ. ३६७ ) । ऐसा प्रतीत होता है कि श्रेणी लोग कई उपवर्गों में विभाजित थे और जिन श्रेणियों से सिकन्दर की मुठभेड़ हुई थी वे अग्र या प्रथम श्रेणी थे । आधुनिक सिंधी खत्री, प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं ।

अग्र श्रेणियों के संबंध में कहा गया है कि वे बड़े वीर थे । अपनी पराजय के समय उन्होंने अपने स्त्री-बच्चों को उसी प्रकार आग में जला डाला था जैसे जोहर के समय राजपूत अपने स्त्री-बच्चों को जला डालते थे ( कर्टियस, भाग ९

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प्रक० ४, अलेक्जैंडर, पृ० २३२)। प्राचीन भारत के राजसंघों में क्षत्रियों और श्रेणियों का अधिकता से उल्लेख पाया जाता है।

मंत्रिपरिषद्

प्राचीन भारत में राष्ट्र-संघटन की दृष्टि से मंत्रिपरिषद् का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उसकी उत्पत्ति वैदिक युग की राष्ट्रीय सभा से हुई, किन्तु बाद में हिन्दू राज्यों के अभ्युदय तथा उन्नयन की दृष्टि से उसकी उपयोगिता निरन्तर बढ़ती गयी। धर्म, अर्थ, शासन, न्याय आदि विषयों पर लिखे गये ग्रन्थों में मंत्रिपरिषद् पर इसीलिए गंभीरता से विचार किया गया कि एक चिरस्थायी एवं सर्वांगीण साम्राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था के लिये उसकी पर आवश्यकता है।

कौटिल्य ने मंत्रियों की इस सभा को 'मंत्रिपरिषद्' ही कहा है (अर्थशास्त्र, पृ० ४७) इससे पहले जातक (खण्ड ६, पृ० ४०५, ४३१) महावस्तु (खंड २, पृ० ४१६-४४२) और अशोक के शिलालेखों (तीसरा, छठा) में उसको परिसा कहा गया है। धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र विषय के ग्रन्थों में कहा गया है मंत्रिपरिषद् की स्वीकृति तथा उसके सहयोग के बिना राजा को कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। मनु ने कहा है कि छोटे-बड़े सभी कार्य राजा को मंत्रिपरिषद् के साथ विचार करके करने चाहिए (मनुस्मृति ७।३०-३१, ५५, ५६)। याज्ञवल्क्य (याज्ञवल्क्यस्मृति १।३११) तथा अन्य ग्रन्थकारों ने भी यही बात कही है।

कौटिल्य यद्यपि एक राज्य-शासन-प्रणाली का समर्थक रहा है, जिसमें राजा ही एकमात्र कर्ता-धर्ता होता है, किन्तु मंत्रिपरिषद् की अनिवार्यता को उसने भी माना है। उसका कहना है कि राजा को अपने प्रत्येक महत्त्वपूर्ण कार्य मंत्रिपरिषद् के परामर्श से करने चाहिए और संदिग्ध या विवादग्रस्त विषयों में जो बहुमत द्वारा समर्थित हों उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ४७)। कौटिल्य ने कहा है कि इन्द्र का सहस्राक्ष अभिधान इसलिये हुआ कि उसकी मंत्रिपरिषद् में एक हजार बुद्धिमान् सदस्य थे। वे ही उसके नेत्र कहे जाते थे (अर्थशास्त्र, पृ० ४७)।

संपूर्ण प्रजा, सारा राज्य और यहां तक कि राजा भी मंत्रिपरिषद् पर निर्भर है। अर्थशास्त्र की दृष्टि से मंत्री के बिना राजा का कोई अस्तित्व नहीं है। राजा और मंत्री के पारस्परिक संबंध और राज्य के लिये उनकी क्या आवश्यकता है, इसकी चर्चा करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि राजा और

३ कौ० भू०

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मंत्री साम्राज्यरूपी शकट के दो पहिये हैं, जिनके बिना वह राज्य-शकट आगे नहीं बढ़ सकता है । ( अर्थशास्त्र, पृ० १९ ) । मंत्री ही राजा का ऐसा सहायक है, जो विपत्ति के समय उसकी रक्षा और प्रमाद के समय उसको सावधान करता है ।

मंत्रिपरिषद् की योजना का मुख्य उद्देश्य है प्रत्येक राजकीय समस्या पर विचार करना और राज्य की उन्नति के लिये योजनाएँ बनाना । सभी राज-कार्यों को मंत्रणा के बाद ही क्रियान्वित करने का कौटिल्य ने विधान किया है । इस मंत्रणा को राजा एकाकी नहीं कर सकता । अकेले में विचारित कार्यक्रमों की सफलता संदिग्ध होती है । इसलिए समुचित परामर्श के लिये मन्त्रि-परिषद् की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है ।

कौटिल्य का कहना है कि अज्ञात विषय को जान लेना, ज्ञात विषय का निश्चय करना, निश्चित विषय को स्थायी रूप देना, मतभेद हो जाने पर संशय का निराकरण करना, किसी विषय का आंशिक ज्ञान होने पर ही उस सारे विषय को हृदयंगम करना ये सभी कार्य मन्त्रिपरिषद् के अधीन होते हैं । इसलिए मन्त्रियों का अत्यन्त बुद्धिमान् होना आवश्यक है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४४ ) ।

किसी भी सुविचारित गुप्त विषय के रहस्य को सुरक्षित रखने के लिये कौटिल्य ने बड़ा जोर दिया है । कौटिल्य का कहना है कार्यान्वित होने से पहले ही किसी गुप्त योजना का फूट जाना, राजा और मंत्रिपरिषद दोनों के लिये अनिष्ट का कारण हो सकती है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४३ ) । इसलिए मंत्र की सुरक्षा के लिये पहली आवश्यकता यह है कि मंत्रणा-गृह अत्यन्त सुरक्षित हो । दूसरे में राजा तथा उसके परिषद् इतने संयमी एवं विचारवान् होने चाहिये कि उनकी किसी चेष्टा से उनके गुप्त रहस्यों का भेद प्रकट न हो सके । मंत्र की सुरक्षा के लिये तीसरी आवश्यकता इस बात की है कि मंत्रणा में भाग लेने वाला कोई भी व्यक्ति मादक वस्तुओं का सेवन न करता हो ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ४३-४४ ) ।

कौटिल्य ने मंत्र के पाँच अंग बताये हैं : कार्य आरंभ करने का तरीका, योग्य पुरुषों का सहयोग तथा द्रव्य-संचय, देश तथा काल का विचार, अनर्थों से आत्मरक्षा और अपनी अभीष्ट सिद्धि का विचार ।

मनु ( मनुस्मृति ७।५७ ) और कौटिल्य ( अर्थशास्त्र, पृ० ४६ ) दोनों इस बात में सहमत हैं कि राजा को चाहिये कि पहले वह सब मंत्रियों से अलग-अलग परामर्श करे और तब उन सबको एक साथ बैठा कर उनके साथ विचार करे । बृहस्पति ( बृहस्पतिशास्त्र १।४, ५ ) का तो यहाँ तक कहना है

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कि प्रत्येक ऐसा कार्य भी, जो कि सर्वथा न्यायसंगत एवं धर्मानुमोदित हो, उसको भी मन्त्रियों की संमति-स्वीकृति से ही करना चाहिये ।

मन्त्रियों की संख्या : मन्त्रिपरिषद् की अनिवार्यता को सभी आचार्यों ने स्वीकार किया है, किन्तु उसके सदस्यों की संख्या कितनी होनी चाहिये इस सम्बन्ध में उनकी राय एक नहीं है । मन्त्रियों की संख्या के प्रसंग में कौटिल्य ने वृहस्पति और शुक्राचार्य के मतों को उद्धृत किया है । इस प्रसंग में कौटिल्य ने न तो अपना ही अभिमत दिया है और न उक्त दो आचार्यों के अतिरिक्त किसी तीसरे पुरातन आचार्य को उद्धृत किया है । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि वृहस्पति और शुक्राचार्य का मत ही कौटिल्य को अभीष्ट था ।

आचार्य वृहस्पति के अनुयायी विद्वानों के मतानुसार मन्त्रियों की संख्या सोलह और शुक्राचार्य के समर्थक विद्वानों के अनुसार बीस बतायी गयी है । कौटिल्य ने इस सम्बन्ध में केवल इतना ही कहा है कि परिषद् में मन्त्रियों की संख्या इतनी होनी चाहिये कि जिससे वे सभी कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पादन करते हुए राज्य की उन्नति करते रहें ।

कौटिल्य ने मन्त्रिपरिषद् के प्रमुख चार सदस्य बताये हैं, श्रेष्ठता के अनुसार जिनका क्रम है : मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज ( अर्थशास्त्र, पृ० ३३ ) इनके अतिरिक्त पौर, जानपद आदि भी परिषद् के सदस्य होते थे ।

मन्त्रिपरिषद् वस्तुतः राष्ट्रपरिषद् थी । उसके कार्यों की सीमा मन्त्रियों तथा राजा तक ही सीमित नहीं थी, अपितु वह सारे राष्ट्र के कार्यों, विभिन्न विभागीय अध्यक्षों की रीति-नीति को निर्धारित करने वाली परिषद् थी । उसका अधिकार क्षेत्र बहुत व्यापक था ।

मन्त्री और अमात्य : कौटिल्य के अनुसार मन्त्री और अमात्य दो अलग-अलग पद थे । कौटिल्य ने लिखा है कि 'इस प्रकार राजा को चाहिए कि यथोचित गुण, देश, काल और कार्य की व्यवस्था को देखकर वह सर्वगुण-सम्पन्न व्यक्तियों को अमात्य बना सकता है; किन्तु सहसा ही उनको मन्त्रिपद पर नियुक्त न करे ( अर्थशास्त्र, पृ० २३ ) ।

इससे स्पष्ट है कि मन्त्री और अमात्य, दो भिन्न-भिन्न पद थे और अमात्य की अपेक्षा मन्त्री का पद बड़ा था । कदाचित् बात यह रही होगी कि मन्त्री, मन्त्रिपरिषद् का सदस्य भी होता था और राजा को भी सुझाव दे सकता था; जब कि अमात्य मन्त्रिपरिषद् का सदस्य तो होता था किन्तु उसको मन्त्रिपद

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प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। कौटिल्य की विवेचन-प्रणाली से हमें यह भी विदित होता है कि मन्त्रिपरिषद् के निर्णय बहुमत पर आधारित थे। बहुमत द्वारा स्वीकृत-समर्थित कार्यों को ही कौटिल्य ने क्रियान्वित करने का विधान किया है।

राजा : कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' और उसके जीवन-सम्बन्धी ध्येयों का अध्ययन कर यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ जाती है कि कौटिल्य का उद्देश्य एक ऐसे विराट् साम्राज्य की स्थापना करना था, जिसकी शासन-सत्ता निरंकुश हो और जिसके अतुल बल-वैभव के समक्ष किसी को भी शिर उठाने का साहस न हो, फिर भी उसकी नीति के अन्तराल में लोक-कल्याण की एक व्यापक भावना विद्यमान थी, जिसका उल्लंघन उसने कभी भी नहीं किया और सम्भवतः यही एक भारी कारण रहा कि कौटिल्य की निरंकुश नीति में प्रजातन्त्री विचारों का आश्चर्यमय समन्वय था।

कौटिल्य का निर्देश है कि राजा का पहिला कर्त्तव्य प्रजा को प्रसन्न रखना है। वस्तुतः राजा नाम की कोई हस्ती ही कौटिल्य के सामने नहीं दिखाई देती है; प्रजा ही सब कुछ है। राजा का अपना कोई हित या सुख अथवा अभीष्ट नहीं होना चाहिए। वह तो प्रजा की सुख-सुविधाओं एवं प्रजा के अभीष्टों की व्यवस्था करने वाला एक व्यवस्थापक मात्र है। उस विराट् प्रजा के कुशल-क्षेम के लिए किन-किन बातों और किन-किन साधनों की आवश्यकता है, इसकी सारी जिम्मेदारी और सारा भार राजा के ऊपर निर्भर है। (अर्थशास्त्र पृ० ६२-६३) कदाचित् इसी लिए विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नाटक में एक बार चन्द्रगुप्त अपने परतन्त्र जीवन के लिए इतना झुंझला पड़ता है कि सारा राजपाट छोड़ देने के लिए वह उत्तेजित हो उठता है।

इसलिए राजा के चारित्रिक गुणों के सम्बन्ध में कौटिल्य ने जो सीमाएँ निर्धारित की हैं, उन तक पहुँचना प्रत्येक व्यक्ति के वश की बात नहीं है। सत्कुलोत्पन्न, दैवबुद्धि, बलवान्, धार्मिक, सत्यवादी, तत्त्ववक्ता, कृतज्ञ, उच्चादर्श-युक्त, उत्साही, शीघ्र कार्य करने वाला, समर्थ सामंतों से युक्त, दृढ़निश्चयी और विद्या-व्यसनी; राजा के चरित्र के ये प्रधान गुण हैं। (अर्थशास्त्र, पृ० १८) इनके अतिरिक्त उसकी बुद्धि में शास्त्रों को सुनने की उत्कण्ठा, शास्त्रोपदेश को ग्रहण करने की क्षमता, तदनुसार आचरण करने का संयम और तर्क-वितर्क के द्वारा तत्त्व की बात को जान लेने की निपुणता होनी चाहिए।

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शौर्य, अमर्ष, शीघ्रता और दक्षता, ये चार बातें उसके उत्साह में होनी चाहिये, इन बातों के साथ-साथ उसमें वे सभी बातें भी होनी चाहिए, जिनके कारण वह विराट् प्रजा के उच्चादर्शों को जान सके और अपने उन्नत गुणों को प्रजा में क्रियान्वित कर सके । राजा के चरित्र की यह सम्पदा ( पूंजी ) है ।

राजा के सदाचरण पर कौटिल्य ने बड़ा जोर दिया है । अपने आचरण को विशुद्ध बनाये रखने के लिए राजा को जितेन्द्रिय होना चाहिए; उसको वृद्धजनों का सहवास करना चाहिए; उसको परस्त्री, परधन और हिंसा आदि कार्यों से सदा दूर रहना चाहिए; अधिक शयन करना तथा लोभ, मिथ्या-व्यवहार, उद्धतवेष एवं अनर्थकारी कार्यों को त्याग देना चाहिए; अधर्मकारी तथा अनर्थकारी कार्यों से उसको दूर रहना चाहिए; धर्म और अर्थ को क्षति न पहुँचाने वाले काम का सेवन करना चाहिए; यदि वह धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में से किसी एक का अधिक सेवन करता है तो अपने लिए वह नाशकारी अनर्थ को पैदा करता है ।

कौटिल्य का सुझाव है कि राजा के आचरण पर ही उसके कर्मचारियों का आचरण निर्भर है । यदि वह प्रमादी होगा तो उसके कर्मचारी भी प्रमाद करने लगेंगे और यह भी असंभव नहीं कि प्रमादी राजा के कर्मचारी उसके शत्रु से सन्धि करके एक दिन उसका सर्वस्व ही समाप्त कर डालेंगे । इसके विपरीत यदि राजा उदार, परिश्रमी और विवेकशील होगा तो उसका सारा भृत्यवर्ग उसके इन गुणों को अपनायेगा । इसलिए, कौटिल्य का कहना है कि, उक्त बातों पर ध्यान रखकर राजा को चाहिए कि यत्नपूर्वक सावधानी से वह अपनी उन्नति की ओर सचेष्ट रहे ।

ऐसा तभी सम्भव है यदि उसकी कार्य-व्यवस्था का ढंग निश्चित रूप से विचारपूर्वक संपन्न होता रहे । राजा की कार्य व्यवस्था नियमित ढंग से संचालित होती रहे, इसके लिए कौटिल्य ने रात और दिन को दो भागों में विभक्त कर प्रत्येक भाग को आठ-आठ उप-भागों में बाँट दिया है । ब्राह्ममुहूर्त में उठने के बाद रात्रि में शयनपर्यन्त राजा को किस समय क्या कार्य करना चाहिए, इसका कौटिल्य ने ब्योरेवार विवरण दिया है ।

राजा के प्रमुख कर्तव्य हैं यज्ञ, प्रजापालन, न्याय, दान, शत्रु-मित्र से उचित व्यवहार, विभिन्न विषयों के प्रकांड विद्वानों को उनके उपयुक्त स्थानों पर नियुक्त करना । ( अर्थशास्त्र, पृ० ६३-६४ ) इसी को अच्छी नीति (सुशासन) कहा गया है और ऐसी नीति के अनुसार आचरण करने वाले राजा की सभी विघ्न-बाधायें दूर होकर उसकी उन्नति एवं कल्याण होता है ।

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प्राचीन भारत की एकराजत्व शासन-प्रणाली को दृष्टि में रखकर स्वभावतः होना तो यह चाहिये था कि सर्वसत्तामान शासक ( राजा ) ही सम्पूर्ण राज-सत्ता का एकाधिकारी व्यक्ति होता, किन्तु अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्र विषयक ग्रन्थों में जो नीति-नियम निर्धारित हैं उनको देखकर ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दू राजा की स्थिति एक वेतनभोगी सेवक से बढ़कर कुछ न थी। राजा और राजपरिवार का वेतन ( वृत्ति ) निर्धारित था, जो कि देश की आय तथा देश की स्थिति पर निर्भर था। राजमाता, पटरानी, दूसरी रानियां, राजकुमार और दूसरे राजपरिवार के व्यक्तियों के लिये वेतन नियत था ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ )। राजा को यद्यपि स्वामी कहा जाता था, किन्तु उसके अधिकार की सीमाएँ अपराधियों के दमन तक ही सीमित थीं। सार्वजनिक बहुमत से वह बँधा रहता था। वह पौरजानपद की राष्ट्र-संघटन की शक्ति के अधीन था। इस दृष्टि से उसकी स्थिति राष्ट्र के एक सेवक या भृत्य से बढ़कर नहीं थी। उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व और उसकी कोई व्यक्तिगत रुचि-अरुचि नहीं हुआ करती थी। हिन्दू राजा की यह दास या भृत्य जैसी स्थिति ही वस्तुतः नैतिक दृष्टि से उसे स्वामित्व के उच्चासन पर अडिग बनाये रखी रही। राज्यरूपी वृक्ष का मूल बताते हुए शुक्रनीतिसार ( ५।१२ ) में उसकी स्थिति को बड़े अच्छे ढंग से दर्शाया गया है। कहा गया है कि “राजा, राज्यरूपी वृक्ष का मूल है, मन्त्रि-परिषद् उसका धड़ या स्कंध हैं, सेनापति उसकी शाखाएँ हैं, सैनिक उसके पल्लव है, प्रजा उसके पुष्प हैं, देश की सम्पन्नता उसके फल हैं और समस्त देश उसका बीज है।”

इसलिये यदि राजा न हो तो प्रजा और राष्ट्र की क्या स्थिति हो सकती है, यह स्पष्ट हो जाता है।

हिन्दू राजनीति की दृष्टि से राज्य एक ऐसी पुनीत थाती है जो राजा को इसलिये सौंपी जाती है कि वह प्रजा की सुख-समृद्धि और कल्याण-कामना के लिए सतत यत्नशील बना रहे। प्रत्येक राज्याभिषेक के समय अभिषिक्त राजा को यह कह कर इस पुनीत थाती को सौंपा जाता था कि “यह राष्ट्र तुम्हें सौंपा जाता है। तुम इसके संचालक, नियामक और उत्तरदायित्व के दृढ़ वाहन-कर्ता हो। यह राज्य तुम्हें कृषि के कल्याण, सम्पन्नता, प्रजा के पोषण के लिए दिया जाता है ( शुक्लयजुर्वेद ९।२२ )।

इसलिये राजा के लिये पहिली प्रतिज्ञा राष्ट्रहित और प्रजा की हित-कामना की हुआ करती थी। हिन्दुओं की एकराजता का यह महान आदर्श, जिसका

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एकमात्र उद्देश्य प्रजा की भलाई या, संसार की तत्कालीन राजनीति के इतिहास में अपना अनन्य स्थान रखता है। वस्तुतः वह एक नागरिक राज्य था, जिसके प्रांतीय शासक या मांडलिक सदा ही नागरिक हुआ करते थे। इस एकराज शासन की अनेक प्रणालियाँ प्रलचित थीं जैसे राज्य, महाराज्य, आधिपत्य और सार्वभौम । सार्वभौम शासन-प्रणाली का विकास आगे चलकर चक्रवर्ती शासन-प्रणाली के रूप में प्रकट हुआ। कौटिल्य ने इसके संबंध में कहा है कि 'सारी भूमि या भारत; देश है। उसमें हिमालय से लेकर समुद्र तक सीधे उत्तर-दक्षिण एक हजार योजन में चक्रवती क्षेत्र है' ( अर्थशास्त्र, पृ० ५९० )। ये शासन प्रणालियाँ भी आगे-आगे बदलती रहीं, किन्तु उन सभी में प्रजा-कल्याण की भावना सदा ही बनी रही।

शासन-व्यवस्था

वैदिक साहित्य में हमें दो प्रकार की राजतंत्रात्मक शासन पद्धतियों के दर्शन होते हैं : नियंत्रित और अनियंत्रित । इन पद्धतियों के स्वामी ( राजा ) का यह दावा रहा है कि उसकी उत्पत्ति दैवी है, जो या तो बिना किसी प्रकार के विरोध के देश पर अधिकार कर लेता था अथवा विरोध को दबाकर बलात् सारे शासन को स्वायत्त कर लेता था। नियंत्रण की दशा में तो वह जनता की रजामंदी से ही जनता पर अधिकार करता था और दूसरी अनियंत्रित दशा में अपने बल द्वारा उस पर काबू करता था। ये दोनों प्रकार की पद्धतियाँ वंशगत थीं। अनियंत्रित राज्य बलपूर्वक भी प्राप्त किया जा सकता है ऐसा विधान हमें अथर्ववेद ( ४।२२ ) में भी देखने को मिलता है। साथ ही वैदिक ग्रन्थों में हमें यह भी देखने को मिलता है कि नियंत्रित राज्यतंत्र में राजा या तो चुना जाता है या स्वीकार किया जाता था। ( देखिए : ऋग्वेद १।२४।८; १०।१७५।१; अथर्ववेद ३।४।२ )।

तत्कालीन गण आधुनिक प्रजातंत्र के स्वरूप थे। उन गणों ( सभा या समूह ) का अध्यक्ष जनता द्वारा निर्वाचित होता था। इस प्रकार के प्राचीन गणों में शाक्य, मल्ल, विज्जी, लिच्छवी, मालव, क्षुद्रक, समवस्ताई, पहला, योधेय, कुनिन्द, शिवि, अर्जुनायन आदि प्रमुख हैं। इन सभी गणों का मुखिया ( राजा ) वंशगत होता था और उनके सार्वजनिक कार्यों का संचालन निर्वाचित सभासदों की एक कमेटी द्वारा संपन्न होता था। इनकी शासनपद्धति राजतंत्रात्मक थी; किन्तु उनकी संघ-व्यवस्था प्रजातंत्रात्मक थी। गौतमबुद्ध के समय तक अस्तित्व में आये गणों का उल्लेख रायस डेविड्स की बुद्धिस्ट इंडिया में किया गया है, जिनके नाम हैं : कपिलवस्तु के शाक्य, सुमसुकमार की

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पहाड़ियों के भाग, अलकप्पा के बुली, केशपट्ट के कलामा, रामगांव के कालया कुशीनगर के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मौर्य, विमिथा के विदेह और वैशाली के लिच्छवी या विज्जी। इन प्रजातन्त्रात्मक गणराज्यों का संचालन प्रौढ़ों की एक राजसभा, एक सार्वजनिक सभा ( संघ ) और ग्रामीणों की पंचायत द्वारा हुआ करता था। सारे शासन का आधार ग्राम्यसंगठन था। ग्राम का मुखिया ( ग्रामीण ) ही कर के भुगतान तथा ग्राम सम्बन्धी दूसरे शासन-प्रबंधों के लिए उत्तरदायी समझा जाता था। एक प्रबंधक के नियंत्रण में पाँच से दस गाँव तक होते थे। इसे गोप ( जिला ) कहा गया है। इसी प्रकार के चार ग्राम-समूहों ( गोपों ) का समूह-पति होता था, जिसके शासक को स्थानिक और उसके ऊपर का शासक नागरिक नाम से कहा जाता था। नागरिक अर्थात् राजधानी का प्रमुख। इन सबके ऊपर देख-रेख के लिए जिस अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी उसको समाहर्ता कहा जाता था। ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ९९-१०२ ) ।

शासन-व्यवस्था के प्रसंग में कौटिल्य ने नगर की व्यवस्थापिका सभा ( नगर पालिका ) का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है। उसके छह विभाग बताये गये हैं। प्रत्येक विभाग का संचालन पाँच सदस्यों के हाथ में हुआ करता था। एक विभाग का कार्य कारीगरों ( कलाकारों ) की निगरानी करना था; दूसरे विभाग के हाथ में विदेशियों की देखरेख तथा उनके आवास आदि की व्यवस्था थी; तीसरा विभाग जनगणना, स्वास्थ्य तथा आय-व्यय से संबंधित था; चौथा विभाग मुद्रा तथा विनिमय, तौल, चुंगी, पासपोर्ट आदि का कार्य करता था; पाँचवां विभाग निर्मित वस्तुओं की निगरानी के लिये नियुक्त था; और छठा विभाग केवल कर-वसूली का था।

विभागीय अध्यक्ष : धर्म और शासन के क्षेत्र के कार्य करने वाले जिन प्रमुख विभागीय अध्यक्षों का कौटिल्य ने (अर्थशास्त्र, पृ० ३३) उल्लेख किया है, उनकी सूची डा० जायसवाल ने ( हिन्दू राज्यतंत्र, भाग २; पृ० २६१-२६२ ) इस प्रकार दी है :

१. मंत्री
२. पुरोहित
३. सेनापति—सेना-विभाग का मंत्री
४. युवराज
५. दौवारिक—राजप्रासाद का प्रधान अधिकारी
६. अंतर्वंशिक—राजवंश के गृहकार्यों का प्रधान अधिकारी

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७. प्रशास्तृ या प्रशास्ता—कारागारों का प्रधान अधिकारी ८. समाहर्ता—माल-विभाग का मंत्री ९. सन्निधाता—राजकोष का मंत्री १०. प्रदेष्टा—राजाज्ञाओं का प्रचार करने वाला ११. नायक—सैनिकों का प्रधान अधिकारी १२. पौर—राजधानी का प्रधान शासक १३. व्यावहारिक—न्यायकर्ता, न्यायाधीश १४. कार्मांतिक—खानों और कारखानों आदि का प्रधान अधिकारी १५. सभ्य—मंत्रि-परिषद् का अध्यक्ष १६. दण्डपाल—सेना के निर्वाह का कार्य करने वाला प्रमुख अधिकारी १७. अंतपाल या राष्ट्रांतपाल—सीमाप्रांतों का प्रधान अधिकारी १८. दुर्गपाल—शत्रुओं से देश की रक्षा करने वाला अधिकारी

उक्त अठारह प्रकार के राज्याधिकारियों को कौटिल्य ने तीन भागों में विभक्त किया और उसी क्रम से उनका वेतन निर्धारित किया है । पहिली श्रेणी में मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज; दूसरी श्रेणी में दौवारिक, अंतर्वंशिक, प्रशास्तृ, समाहर्ता, सन्निधाता; और तीसरी श्रेणी में प्रदेष्टा, नायक, पौर, व्यावहारिक, कार्मांतिक, सभ्य, दण्डपाल, दुर्गपाल तथा अंतपाल को रखा गया है । इन तीनों श्रेणियों के अधिकारियों का वेतन प्रतिवर्ष क्रमशः ४८००० पण ( रौप्य ), २४००० पण, और १२००० पण निर्धारित किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ ) ।

राजदूत

राजनीति के क्षेत्र में राजदूत का आज जो महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है, प्राचीन भारत में भी उसको ऐसा ही गौरव प्राप्त था । रामायण, महाभारत धर्मशास्त्र और कौटिल्य द्वारा उद्धृत पुरातन अर्थशास्त्रकारों की दृष्टि में राजदूत का एक जैसा प्रतिष्ठित स्थान माना गया है । कुछ आचार्यों ने तो आज की भाँति, राजदूत को, मंत्रि-परिषद् का एक सदस्य स्वीकार किया है । कौटिल्य ने राजदूत को राजा का मुख माना है । ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० ) राजा का मुख उसको इसलिये कहा गया है कि अपने राष्ट्र में राजा जैसी व्यवस्था और जैसे नीति-नियम निर्धारित करता है, परराष्ट्र में राजा का वही कार्य राजदूत करता है । परराष्ट्र संबंधी कार्यों में वह राजा का प्रतिनिधि माना जाता है ।

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मनुस्मृति ( ७।६३-६४ ) में राजदूतों की योग्यता के संबंध में कहा गया है कि वह बहुश्रुत आकार तथा चेष्टाओं के विकार से हृदयस्थ भावों को पकड़ने वाला, स्मृतिमान, दर्शनीय, दक्ष, सत्कुलीन, राजभक्त, देश-काल का ज्ञाता, पवित्र आचरण करने वाला, वाग्मी और समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए। महाभारत ( शांति० ८५।२८ ) में भी दूत के यही विशेषण गिनाये गये हैं।

राजदूतों को किस ढंग से प्रस्थान करना चाहिये और उनके आचार-व्यवहार के क्या तरीके होने चाहिए, इस संबंध में कौटिल्य ने बड़ी बारीकी से विचार किया है। इस संबंध में उसका कहना है कि प्राणबाधा उपस्थित हो जाने पर भी राजदूत को चाहिये कि वह अपने राजा के संदेश को अविकल रूप में दूसरे राजा के सामने पेश करे। ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )

राजदूत पर जहाँ एक साथ इतनी जिम्मेदारियाँ और प्राणभय तक की भारी विपत्तियाँ निर्भर हैं, वहाँ उसकी सुरक्षा तथा उसके महत्त्वपूर्ण कार्यों को दृष्टि में रखकर उसको कुछ विशेषाधिकार भी दिये गये हैं। सबसे पहिला विशेषाधिकार उसको आत्मरक्षा का दिया गया है। सभी धर्म-शास्त्रकारों और राजनीति के आचार्यों ने एकमत होकर इस बात व्यवस्था दी है कि राजदूत अवध्य है। कौटिल्य ने तो यहाँ तक कहा है कि राजदूत भले ही चांडाल हो, वह अवध्य है, क्योंकि दूत का धर्म अपने मालिक का संदेश पहुँचाना भर है ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )। रामायण में भी कहा गया है कि दूत चाहे साधु हो या असाधु; वह तो दूसरे का भेजा हुआ एवं दूसरे की बात को कहने वाला होता है। इसलिए दूत का वध सर्वथा निषिद्ध है ( रामायण सुन्द० सर्ग ५२ श्लो० १३ )। महाभारत ( शांति० अध्या० ८५, श्लो० २७ ) में तो कहा गया है कि क्षात्रधर्मरत जो राजा सत्यवादी दूत का वध करता है उसके पितर भ्रूण-हत्या के भागी होते हैं।

राजदूत के संबंध में ऐसे नीति-नियम निर्धारित थे, जिनको प्राचीन काल में भी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त थी। कदाचित् कोई दूत ऐसा महान अपराध कर भी बैठता था, जो वैधानिक दृष्टि से क्षम्य नहीं होता था, तब भी उसको सजा दी जाती थी, प्राणदण्ड नहीं, जैसे कि रावण के अनुरोध पर धर्मवेत्ता विभीषण ने हनूमान के लिए दण्ड निर्धारित किया था।

कौटिल्य ने दूतों की तीन श्रेणियाँ बतायीं हैं : १ निसृष्टार्थ, २ परिमितार्थ और ३ शासनहर ( अर्थशास्त्र, पृ० ४९ )। पहिली श्रेणी के दूतों का प्रमुख कार्य अपने राजा का संदेश ले जाना और अपने राजा के लिये संदेश

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लाना था। उन्हें समयानुसार यह भी अधिकार प्राप्त था कि अपने राजा की कार्यसिद्धि के लिये वे स्वयं भी अपनी ओर से बात-चीत कर सकते हैं । इस श्रेणी के दूतों में अमात्य की सारी योग्यतायें बतायी गयी हैं। दूसरी श्रेणी के परिमितार्थ दूतों के लिये अमात्य की तीन-चौथाई योग्यताएँ निर्धारित की गयी हैं। परिमितार्थ दूत की पहुँच कुछ निर्धारित सीमाओं तक ही रखी गई हैं, जिससे कि उसका ऐसा नामकरण हुआ। तीसरे शासनहर दूतों का एकमात्र कार्य संदेशों का आदान-प्रदान करना था।

गुप्तचर

कौटिल्य की अर्थनीति में गुप्तचरों का स्थान बहुत ऊँचा है। गुप्तचर ( खुफिया विभाग ) का जैसा एकमात्र उद्देश्य आज अपराधों का पता लगाना मात्र माना जाता है, पुराने भारत में इस उद्देश्य को नितांत ही गौण समझा जाता रहा है। वस्तुतः गुप्तचरों की आवश्यकता राजनीति के क्षेत्र में इसलिए आवश्यक प्रतीत हुई जिससे शासक को प्रजा के कष्टों, क्लेशों और पीड़ाओं का पता लग सके । प्रजा की सुख-शांति में बाधा उत्पन्न करने वालों और राजकीय नियमों के पालन करने-कराने में रोक लगाने वालों का दमन कैसे हो, इसकी सूचना राजा तक पहुँचाना, गुप्तचरों का प्रमुख कार्य था।

क्योंकि समाज में अनेक वर्ग और उन वर्गों में भी अनेक उपवर्ग होते हैं। इसलिए, समाज के ओर-छोर तक के छिद्रों का पता लगाने वाले गुप्तचरों के तौर-तरीकों में भी विविधता का होना स्वाभाविक-सा है। इस दृष्टि से कौटिल्य ने कार्य भेद से गुप्तचरों के नौ विभाग किये हैं, जिनके नाम हैं : ( १ ) कापटिक, ( २ ) उदास्थित, ( ३ ) गृहपतिक, ( ४ ) वैदेहक, ( ५ ) तापस, ( ६ ) सत्री, ( ७ ) तीक्ष्ण, ( ८ ) रसद और ( ६ ) भिक्षुकी।

राज्य की सुव्यवस्था, शासन का पूर्णतया पालन और प्रजा की सुख-शांति का बहुत-कुछ दायित्व गुप्तचरों पर निर्भर है। ऊपर जिन नौ प्रकार के गुप्तचरों का निर्देश किया गया है, उनकी कार्य-विधि और उनके पारस्परिक सहयोग का ढंग कैसा होना चाहिए, इसका विस्तार से विवेचन एक पूरे प्रकरण में किया गया है।

इन गुप्तचरों के कार्यों का अध्ययन करने के बाद हमें पता लगता है कि प्राचीन भारत की शासन-व्यवस्था का यह गुप्तचर-विभाग कितना उपयोगी और ठोस था। उनका संगठन, उनके गुप्त रहस्य और उनकी संकेत-प्रणाली इतनी जटिल, किन्तु इतनी व्यवस्थित थी कि उस समय की अन्तरराष्ट्रीय

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राजनीति के किस हिस्से में क्या हो रहा है, इसका ज्ञान राजा की गुप्तचरों के द्वारा ही प्राप्त होता था ।

पुर और जनपद की स्थापना

शासन-व्यवस्था और सुख-सुविधा की दृष्टि से कौटिल्य ने समग्र राष्ट्र को दो भागों में विभक्त किया है : पुर और जनपद । पुर से उनका अभिप्राय नगर, दुर्ग या राजधानी से और जनपद से शेष सारे राष्ट्र से है । राज्य की सात प्रकृतियों में जनपद और दुर्ग ( पुर ) को इसीलिए अलग-अलग माना गया है ।

पुर ( राजधानी ) के प्रमुख अधिकारी को नागरिक कहा गया है और उसी प्रकार जनपद की शासन-व्यवस्था का दायित्व समाहर्ता पर निर्भर किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ९९ ) । राजधानी में शांति-सुरक्षा बनी रहे, इसके लिए कौटिल्य ने नगर में प्रवेश करने वाले नवागंतुक व्यक्तियों की देख-रेख, नगर-रक्षकों की व्यवस्था, संदिग्ध व्यक्तियों पर निगरानी, अग्निभय की रक्षा का प्रबन्ध, और नगरवासियों के स्वास्थ्य-लाभ के लिए यथोचित व्यवस्था आदि जितनी भी आवश्यक बातें हैं सबको ध्यान में रखा है ।

जनपद की स्थापना किस प्रकार की जानी चाहिए, इस संबन्ध में कौटिल्य ने विस्तार से प्रकाश डाला है । जनपद की सबसे छोटी बस्ती को ग्राम और दस ग्रामों के संघटन से संग्रहण नामक राजकीय कार्यालय की स्थापना का निर्देश किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ७७ ) । दस-दस ग्रामों के उक्त क्रम से दो सौ ग्रामों का संघटन करके एक क्षेत्र का निर्माण और उसमें खार्वटक नाम की बस्ती ( शासन स्थान ) बसाये जाने की व्यवस्था दी गई है ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर चार-सौ गाँवों का संघटन कर उनके शासन के लिए द्रोणमुख की स्थापना होनी चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर आठ-सौ गांवों के बीच पूर्वोक्त विधि से स्थानीय नामक राजकीय कार्यालय को स्थापित करना चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । इसी प्रकार जनपद के सीमान्त पर अंतपालों की संरक्षता में दुर्गों का निर्माण करना चाहिए, जिनसे कि जनपद में शत्रुओं को न आने दिया जाय ( अर्थशास्त्र, पृ० ८५ ) । जनपद की कुछ अंतपाल रहित सीमाओं पर व्याध, शबर, पुलिंद, चाण्डाल और अन्य वनचर जातियों को बसा कर वहाँ की सुरक्षा का भार उन्हीं को सौंप देना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ७७) ।

जनपद को ऐसी भूमि में बसाया जाना चाहिए जहां नदियां, पर्वत, वन

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हों; जहाँ अल्पश्रम से ही अधिक उपज की प्राप्ति हो; जहाँ अच्छी-अच्छी खानें, हाथियों के जंगल हों; जहाँ की जलवायु नागरिकों के स्वास्थ्यलाभ के लिए उपयोगी सिद्ध हो; जहाँ तरह-तरह के पशु हों; जहाँ परिश्रमी किसान हों; जहाँ की प्रजा दण्ड तथा कर को सहन करने की क्षमता रखती हो । कौटिल्य ने इसको उत्तम जनपद कहा है ( अर्थशास्त्र, पृ० ७७–८१ ) ।

दण्ड : समाज के सभी वर्ग, अथ च, समस्त प्रजा अपने-अपने धर्मपालन में एकनिष्ठ रहे, इसकी देख-रेख का सारा दायित्व राजा पर निर्भर है । अपने-अपने धर्मों का सम्यक् पालन प्रजाजन तभी कर सकते हैं जब उन्हें अपने अधिकारों को भोगने और अपने कर्तव्यों को निबाहने के लिए पूरी सुविधायें प्राप्त हों । समाज निर्बाधित रूप में अपने-अपने धर्मों ( कर्तव्यों ) के प्रति निष्ठावान् बना रहे, उसको उसके अधिकारों की पूरी सुविधायें सुलभ होती रहें, इसी हेतु न्याय की आवश्यकता हुई ।

कौटिल्य जैसे प्रकाण्ड राजनीतिज्ञ ने, जिसके जीवन का अधिकांश भाग राजनीति के क्षेत्र में क्रियात्मक रूप से बीता, न्याय की दिशा में बहुत ही बारीकी से विचार किया है । न्याय-व्यवस्था को उसने दो भागों में बाँटा है : ( १ ) व्यवहार और ( २ ) कण्टकशोधन ।

नागरिकों के पारस्परिक कलहों के मूल कारणों का पता लगाकर उनकी विवेचना करना और तब निरपेक्ष होकर दोषी को दण्ड तथा निर्दोषी को मुक्ति देना, कौटिल्य की न्याय-स्थापना का यह पहिला व्यवहार पक्ष है । न्याय-व्यवस्था के दूसरे पक्ष का संबंध राज-कर्मचारियों से है; किन्तु उसके अन्तर्गत पूंजीपति और दुर्जन लोगों का भी समावेश किया गया है । अर्थात् राजकर्मचारियों, व्यवसायियों और दुर्जनों से प्रजा की किस प्रकार रक्षा की जाय, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कण्टकशोधन नामक न्याय के दूसरे पक्ष की स्थापना की गयी है ।

न्याय-व्यवस्था के लिए कौटिल्य ने जिस व्यवहार शब्द का प्रयोग किया है वह बहुत ही उपयुक्त बैठता है । आचार्य कात्यायन ने व्यवहार शब्द की निष्पत्ति करते हुए लिखा है वि=नानार्थ; अव=संदेह; और हार=हरण । इस नानार्थ संदेह के हरण याने दूर करने के उपायों का दिग्दर्शन ही व्यवहार के अंतर्गत किया है । कौटिल्य के अर्थशास्त्र ( पृ० २५५–२६० ) में अपने प्रकार के व्यवहार-मार्गों पर बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया गया है ।

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कण्टकशोधन के लिए कौटिल्य ने जो व्यवस्था दी है उससे ऐसा अवगत होता है कि समाज में छोटे-से-छोटे छिद्रों और नितांत परोक्ष रूप में घटित होने वाले शोषणों का उसने बड़ी बारीकी से अध्ययन किया था। इन कण्टकों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ बतायी गयी हैं। पहिली श्रेणी में तो कर्मकार ( व्यवसायी ), जैसे धोबी, जुलाहे, सुनार, वैद्य, दूसरी श्रेणी में प्रजा को पीड़ित करने वाले दुष्ट जन और तीसरी श्रेणी में राजकर्मचारियों की लूट-खसोट, गबन तथा कूटकर्म आदि के लिए व्यवस्था दी गयी है।

न्याय की अवस्थिति दण्ड पर निर्भर है। इस हेतु वृहद् धर्मस्थ अधिकरण में कौटिल्य ने दण्ड-व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला है। कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था को पढ़ कर उसकी तत्त्वग्राही बुद्धि का परिचय तो मिलता है, किन्तु इस उद्देश्य के प्रतिपादन में उसने इतना अधिक समय लगा दिया कि उसके द्वारा कल्पित उस निष्कण्टक साम्राज्य की सत्यता पर पाठक को संदेह होने लगता है और दण्ड-ही-दण्ड की एकांत व्यवस्था से वह भयभीत भी हो उठता है।

कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था के प्रमुख तीन अंग हैं : अर्थदण्ड, शरीरदण्ड और कारागारदण्ड। इनमें भी विकल्प दिये गये हैं। दण्ड का पहिला सिद्धांत अपराध पर आधारित है। जैसा अपराध वैसा दण्ड। फिर अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार, अपराधी के ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण के अनुसार, अपराधी की विशेष परिस्थिति के अनुसार, अनेक ढंगों पर दण्ड को निर्धारित किया गया है।

अपराधियों के सुधार और बंदीगृहों की सुव्यवस्था पर भी कौटिल्य ने विचार किया है। बंदी बनाये गये स्त्री-पुरुषों के लिए ऐसे अनेक कार्य सुझाये गये हैं, जिनको सीख लेने के बाद कारामुक्त होने पर वे लाभदायी सिद्ध हो सकें, और अपराध की जो सबसे बड़ी समस्या रोजी-रोटी की रही है, उसकी पूर्ति हो सके।

कौटिल्य का विचार है कि प्रत्येक मनुष्य अरिषड्वर्ग से पराभूत है, इसलिए उसका सर्वदा निर्लिप्त, निर्दोष बना रहना संभव नहीं है। काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष ये छहों शत्रु न जाने कब मनुष्य को उद्वेलित करके उसको अधर्म तथा दुराचरण की ओर ले जाते हैं। यदि ऐसी स्थिति आ गयी तो निश्चय ही समाज में मत्स्यन्याय फैल जायेगा, अर्थात् बलवान् निर्बल को निगल जायेगा। ( अर्थशास्त्र, पृ० १६ )

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर दण्ड की व्यवस्था की गयी है।

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प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म ( कर्तव्य ) का पालन करे और सदाचार में प्रवृत्त रहे, कौटिल्य की व्यवस्था का यह प्रमुख उद्देश्य है, किन्तु धर्म और सदाचार की अवरोधक प्रवृत्तियों का दमन कैसे संभव हो, इसके लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी। कौटिल्य की यह दण्ड-व्यवस्था बहुत ही वैज्ञानिक है। जिस रूप में कि मनुष्य का धर्म बना रहे और समाज में लोक कल्याण के आदर्श प्रतिष्ठित रहें, वैसे विधान से दण्ड की व्यवस्था की गयी है। इस संबंध में कौटिल्य का अभिमत है कि अपराधियों के लिए ऐसा दण्ड निर्धारित होना चाहिए जो कि उद्वेगकर न हो, मृत्युदण्ड से प्रजा दण्ड देने वाले का ही तिरस्कार करने लगती है, उचित दण्ड ही कल्याणकर होता है, भली-भाँति विचार करके निर्धारित किया गया दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में लगाये रखता है, ईर्ष्या, द्वेष और अज्ञान के द्वारा अविचारित दण्ड जीवनमुक्त वानप्रस्थों और परिव्राजकों तक को कुपित कर देता है, फिर भला गृहस्थ लोगों के संबंध में तो उसकी कल्पना करना भी भयावह है। ( अर्थशास्त्र, पृ० १३ )

कौटिल्य के मतानुसार दण्ड का बहुत बड़ा स्थान है, क्योंकि आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्ड, इन चारों विद्याओं में दण्डनीति ही एक ऐसी बलवती विद्या है, जिसके द्वारा शेष तीनों विद्याओं का सुविधापूर्वक संचालन किया जा सकता है। ( अर्थशास्त्र, १२ ) वस्तुतः कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था की योजना का संपूर्ण आधार लोककल्याण और लोकरक्षा के निमित्त जान पड़ता है।

वर्णाश्रम व्यवस्था

प्राचीन ग्रंथों का अनुशीलन करने पर हमें तत्कालीन जन-समुदाय तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त हुआ मिलता है : क्षत्र ( योद्धा ), ब्रह्मन् ( पुरोहित ) और विश ( श्रमिक )। क्षत्र लोग समाज के नेता, शासक, राजा एवं सरदार रहे, ब्रह्मन् अपनी बौद्धिक शक्ति के कारण राजा के सचिव, न्यायाधीश तथा धार्मिक नेता या अनुशासक के पदों पर अधिष्ठित थे, और विश वर्ग के लोग कृषक, व्यापारी के रूप में व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग-धंधों के द्वारा संपत्ति का उपार्जन करते रहे। जन-समूह का यह त्रिविध वर्ग-भेद जब तक श्रम-विभाजन की दृष्टि से अपने कर्तव्यों में ईमानदार बना रहा तब तक तो उसने अच्छी उन्नति की, किन्तु जब वह अधिकार-लिप्सु तथा शोषक बन कर शेष समाज की उपेक्षा करने लगा तो स्वभावतः उसके पतन की भूमिका तैयार होने लगी थी। उनकी इन पतनोन्मुख स्थितियों एवं प्रवृत्तियों पर प्रकाश