कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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राजनीति के किस हिस्से में क्या हो रहा है, इसका ज्ञान राजा की गुप्तचरों के द्वारा ही प्राप्त होता था ।
पुर और जनपद की स्थापना
शासन-व्यवस्था और सुख-सुविधा की दृष्टि से कौटिल्य ने समग्र राष्ट्र को दो भागों में विभक्त किया है : पुर और जनपद । पुर से उनका अभिप्राय नगर, दुर्ग या राजधानी से और जनपद से शेष सारे राष्ट्र से है । राज्य की सात प्रकृतियों में जनपद और दुर्ग ( पुर ) को इसीलिए अलग-अलग माना गया है ।
पुर ( राजधानी ) के प्रमुख अधिकारी को नागरिक कहा गया है और उसी प्रकार जनपद की शासन-व्यवस्था का दायित्व समाहर्ता पर निर्भर किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ९९ ) । राजधानी में शांति-सुरक्षा बनी रहे, इसके लिए कौटिल्य ने नगर में प्रवेश करने वाले नवागंतुक व्यक्तियों की देख-रेख, नगर-रक्षकों की व्यवस्था, संदिग्ध व्यक्तियों पर निगरानी, अग्निभय की रक्षा का प्रबन्ध, और नगरवासियों के स्वास्थ्य-लाभ के लिए यथोचित व्यवस्था आदि जितनी भी आवश्यक बातें हैं सबको ध्यान में रखा है ।
जनपद की स्थापना किस प्रकार की जानी चाहिए, इस संबन्ध में कौटिल्य ने विस्तार से प्रकाश डाला है । जनपद की सबसे छोटी बस्ती को ग्राम और दस ग्रामों के संघटन से संग्रहण नामक राजकीय कार्यालय की स्थापना का निर्देश किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ७७ ) । दस-दस ग्रामों के उक्त क्रम से दो सौ ग्रामों का संघटन करके एक क्षेत्र का निर्माण और उसमें खार्वटक नाम की बस्ती ( शासन स्थान ) बसाये जाने की व्यवस्था दी गई है ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर चार-सौ गाँवों का संघटन कर उनके शासन के लिए द्रोणमुख की स्थापना होनी चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर आठ-सौ गांवों के बीच पूर्वोक्त विधि से स्थानीय नामक राजकीय कार्यालय को स्थापित करना चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । इसी प्रकार जनपद के सीमान्त पर अंतपालों की संरक्षता में दुर्गों का निर्माण करना चाहिए, जिनसे कि जनपद में शत्रुओं को न आने दिया जाय ( अर्थशास्त्र, पृ० ८५ ) । जनपद की कुछ अंतपाल रहित सीमाओं पर व्याध, शबर, पुलिंद, चाण्डाल और अन्य वनचर जातियों को बसा कर वहाँ की सुरक्षा का भार उन्हीं को सौंप देना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ७७) ।
जनपद को ऐसी भूमि में बसाया जाना चाहिए जहां नदियां, पर्वत, वन