कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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लाना था। उन्हें समयानुसार यह भी अधिकार प्राप्त था कि अपने राजा की कार्यसिद्धि के लिये वे स्वयं भी अपनी ओर से बात-चीत कर सकते हैं । इस श्रेणी के दूतों में अमात्य की सारी योग्यतायें बतायी गयी हैं। दूसरी श्रेणी के परिमितार्थ दूतों के लिये अमात्य की तीन-चौथाई योग्यताएँ निर्धारित की गयी हैं। परिमितार्थ दूत की पहुँच कुछ निर्धारित सीमाओं तक ही रखी गई हैं, जिससे कि उसका ऐसा नामकरण हुआ। तीसरे शासनहर दूतों का एकमात्र कार्य संदेशों का आदान-प्रदान करना था।
गुप्तचर
कौटिल्य की अर्थनीति में गुप्तचरों का स्थान बहुत ऊँचा है। गुप्तचर ( खुफिया विभाग ) का जैसा एकमात्र उद्देश्य आज अपराधों का पता लगाना मात्र माना जाता है, पुराने भारत में इस उद्देश्य को नितांत ही गौण समझा जाता रहा है। वस्तुतः गुप्तचरों की आवश्यकता राजनीति के क्षेत्र में इसलिए आवश्यक प्रतीत हुई जिससे शासक को प्रजा के कष्टों, क्लेशों और पीड़ाओं का पता लग सके । प्रजा की सुख-शांति में बाधा उत्पन्न करने वालों और राजकीय नियमों के पालन करने-कराने में रोक लगाने वालों का दमन कैसे हो, इसकी सूचना राजा तक पहुँचाना, गुप्तचरों का प्रमुख कार्य था।
क्योंकि समाज में अनेक वर्ग और उन वर्गों में भी अनेक उपवर्ग होते हैं। इसलिए, समाज के ओर-छोर तक के छिद्रों का पता लगाने वाले गुप्तचरों के तौर-तरीकों में भी विविधता का होना स्वाभाविक-सा है। इस दृष्टि से कौटिल्य ने कार्य भेद से गुप्तचरों के नौ विभाग किये हैं, जिनके नाम हैं : ( १ ) कापटिक, ( २ ) उदास्थित, ( ३ ) गृहपतिक, ( ४ ) वैदेहक, ( ५ ) तापस, ( ६ ) सत्री, ( ७ ) तीक्ष्ण, ( ८ ) रसद और ( ६ ) भिक्षुकी।
राज्य की सुव्यवस्था, शासन का पूर्णतया पालन और प्रजा की सुख-शांति का बहुत-कुछ दायित्व गुप्तचरों पर निर्भर है। ऊपर जिन नौ प्रकार के गुप्तचरों का निर्देश किया गया है, उनकी कार्य-विधि और उनके पारस्परिक सहयोग का ढंग कैसा होना चाहिए, इसका विस्तार से विवेचन एक पूरे प्रकरण में किया गया है।
इन गुप्तचरों के कार्यों का अध्ययन करने के बाद हमें पता लगता है कि प्राचीन भारत की शासन-व्यवस्था का यह गुप्तचर-विभाग कितना उपयोगी और ठोस था। उनका संगठन, उनके गुप्त रहस्य और उनकी संकेत-प्रणाली इतनी जटिल, किन्तु इतनी व्यवस्थित थी कि उस समय की अन्तरराष्ट्रीय