भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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मनुस्मृति ( ७।६३-६४ ) में राजदूतों की योग्यता के संबंध में कहा गया है कि वह बहुश्रुत आकार तथा चेष्टाओं के विकार से हृदयस्थ भावों को पकड़ने वाला, स्मृतिमान, दर्शनीय, दक्ष, सत्कुलीन, राजभक्त, देश-काल का ज्ञाता, पवित्र आचरण करने वाला, वाग्मी और समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए। महाभारत ( शांति० ८५।२८ ) में भी दूत के यही विशेषण गिनाये गये हैं।

राजदूतों को किस ढंग से प्रस्थान करना चाहिये और उनके आचार-व्यवहार के क्या तरीके होने चाहिए, इस संबंध में कौटिल्य ने बड़ी बारीकी से विचार किया है। इस संबंध में उसका कहना है कि प्राणबाधा उपस्थित हो जाने पर भी राजदूत को चाहिये कि वह अपने राजा के संदेश को अविकल रूप में दूसरे राजा के सामने पेश करे। ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )

राजदूत पर जहाँ एक साथ इतनी जिम्मेदारियाँ और प्राणभय तक की भारी विपत्तियाँ निर्भर हैं, वहाँ उसकी सुरक्षा तथा उसके महत्त्वपूर्ण कार्यों को दृष्टि में रखकर उसको कुछ विशेषाधिकार भी दिये गये हैं। सबसे पहिला विशेषाधिकार उसको आत्मरक्षा का दिया गया है। सभी धर्म-शास्त्रकारों और राजनीति के आचार्यों ने एकमत होकर इस बात व्यवस्था दी है कि राजदूत अवध्य है। कौटिल्य ने तो यहाँ तक कहा है कि राजदूत भले ही चांडाल हो, वह अवध्य है, क्योंकि दूत का धर्म अपने मालिक का संदेश पहुँचाना भर है ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )। रामायण में भी कहा गया है कि दूत चाहे साधु हो या असाधु; वह तो दूसरे का भेजा हुआ एवं दूसरे की बात को कहने वाला होता है। इसलिए दूत का वध सर्वथा निषिद्ध है ( रामायण सुन्द० सर्ग ५२ श्लो० १३ )। महाभारत ( शांति० अध्या० ८५, श्लो० २७ ) में तो कहा गया है कि क्षात्रधर्मरत जो राजा सत्यवादी दूत का वध करता है उसके पितर भ्रूण-हत्या के भागी होते हैं।

राजदूत के संबंध में ऐसे नीति-नियम निर्धारित थे, जिनको प्राचीन काल में भी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त थी। कदाचित् कोई दूत ऐसा महान अपराध कर भी बैठता था, जो वैधानिक दृष्टि से क्षम्य नहीं होता था, तब भी उसको सजा दी जाती थी, प्राणदण्ड नहीं, जैसे कि रावण के अनुरोध पर धर्मवेत्ता विभीषण ने हनूमान के लिए दण्ड निर्धारित किया था।

कौटिल्य ने दूतों की तीन श्रेणियाँ बतायीं हैं : १ निसृष्टार्थ, २ परिमितार्थ और ३ शासनहर ( अर्थशास्त्र, पृ० ४९ )। पहिली श्रेणी के दूतों का प्रमुख कार्य अपने राजा का संदेश ले जाना और अपने राजा के लिये संदेश