कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४१ )
७. प्रशास्तृ या प्रशास्ता—कारागारों का प्रधान अधिकारी ८. समाहर्ता—माल-विभाग का मंत्री ९. सन्निधाता—राजकोष का मंत्री १०. प्रदेष्टा—राजाज्ञाओं का प्रचार करने वाला ११. नायक—सैनिकों का प्रधान अधिकारी १२. पौर—राजधानी का प्रधान शासक १३. व्यावहारिक—न्यायकर्ता, न्यायाधीश १४. कार्मांतिक—खानों और कारखानों आदि का प्रधान अधिकारी १५. सभ्य—मंत्रि-परिषद् का अध्यक्ष १६. दण्डपाल—सेना के निर्वाह का कार्य करने वाला प्रमुख अधिकारी १७. अंतपाल या राष्ट्रांतपाल—सीमाप्रांतों का प्रधान अधिकारी १८. दुर्गपाल—शत्रुओं से देश की रक्षा करने वाला अधिकारी
उक्त अठारह प्रकार के राज्याधिकारियों को कौटिल्य ने तीन भागों में विभक्त किया और उसी क्रम से उनका वेतन निर्धारित किया है । पहिली श्रेणी में मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज; दूसरी श्रेणी में दौवारिक, अंतर्वंशिक, प्रशास्तृ, समाहर्ता, सन्निधाता; और तीसरी श्रेणी में प्रदेष्टा, नायक, पौर, व्यावहारिक, कार्मांतिक, सभ्य, दण्डपाल, दुर्गपाल तथा अंतपाल को रखा गया है । इन तीनों श्रेणियों के अधिकारियों का वेतन प्रतिवर्ष क्रमशः ४८००० पण ( रौप्य ), २४००० पण, और १२००० पण निर्धारित किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ ) ।
राजदूत
राजनीति के क्षेत्र में राजदूत का आज जो महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है, प्राचीन भारत में भी उसको ऐसा ही गौरव प्राप्त था । रामायण, महाभारत धर्मशास्त्र और कौटिल्य द्वारा उद्धृत पुरातन अर्थशास्त्रकारों की दृष्टि में राजदूत का एक जैसा प्रतिष्ठित स्थान माना गया है । कुछ आचार्यों ने तो आज की भाँति, राजदूत को, मंत्रि-परिषद् का एक सदस्य स्वीकार किया है । कौटिल्य ने राजदूत को राजा का मुख माना है । ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० ) राजा का मुख उसको इसलिये कहा गया है कि अपने राष्ट्र में राजा जैसी व्यवस्था और जैसे नीति-नियम निर्धारित करता है, परराष्ट्र में राजा का वही कार्य राजदूत करता है । परराष्ट्र संबंधी कार्यों में वह राजा का प्रतिनिधि माना जाता है ।