कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३५ )
कि प्रत्येक ऐसा कार्य भी, जो कि सर्वथा न्यायसंगत एवं धर्मानुमोदित हो, उसको भी मन्त्रियों की संमति-स्वीकृति से ही करना चाहिये ।
मन्त्रियों की संख्या : मन्त्रिपरिषद् की अनिवार्यता को सभी आचार्यों ने स्वीकार किया है, किन्तु उसके सदस्यों की संख्या कितनी होनी चाहिये इस सम्बन्ध में उनकी राय एक नहीं है । मन्त्रियों की संख्या के प्रसंग में कौटिल्य ने वृहस्पति और शुक्राचार्य के मतों को उद्धृत किया है । इस प्रसंग में कौटिल्य ने न तो अपना ही अभिमत दिया है और न उक्त दो आचार्यों के अतिरिक्त किसी तीसरे पुरातन आचार्य को उद्धृत किया है । इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि वृहस्पति और शुक्राचार्य का मत ही कौटिल्य को अभीष्ट था ।
आचार्य वृहस्पति के अनुयायी विद्वानों के मतानुसार मन्त्रियों की संख्या सोलह और शुक्राचार्य के समर्थक विद्वानों के अनुसार बीस बतायी गयी है । कौटिल्य ने इस सम्बन्ध में केवल इतना ही कहा है कि परिषद् में मन्त्रियों की संख्या इतनी होनी चाहिये कि जिससे वे सभी कार्यों को सफलतापूर्वक सम्पादन करते हुए राज्य की उन्नति करते रहें ।
कौटिल्य ने मन्त्रिपरिषद् के प्रमुख चार सदस्य बताये हैं, श्रेष्ठता के अनुसार जिनका क्रम है : मन्त्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज ( अर्थशास्त्र, पृ० ३३ ) इनके अतिरिक्त पौर, जानपद आदि भी परिषद् के सदस्य होते थे ।
मन्त्रिपरिषद् वस्तुतः राष्ट्रपरिषद् थी । उसके कार्यों की सीमा मन्त्रियों तथा राजा तक ही सीमित नहीं थी, अपितु वह सारे राष्ट्र के कार्यों, विभिन्न विभागीय अध्यक्षों की रीति-नीति को निर्धारित करने वाली परिषद् थी । उसका अधिकार क्षेत्र बहुत व्यापक था ।
मन्त्री और अमात्य : कौटिल्य के अनुसार मन्त्री और अमात्य दो अलग-अलग पद थे । कौटिल्य ने लिखा है कि 'इस प्रकार राजा को चाहिए कि यथोचित गुण, देश, काल और कार्य की व्यवस्था को देखकर वह सर्वगुण-सम्पन्न व्यक्तियों को अमात्य बना सकता है; किन्तु सहसा ही उनको मन्त्रिपद पर नियुक्त न करे ( अर्थशास्त्र, पृ० २३ ) ।
इससे स्पष्ट है कि मन्त्री और अमात्य, दो भिन्न-भिन्न पद थे और अमात्य की अपेक्षा मन्त्री का पद बड़ा था । कदाचित् बात यह रही होगी कि मन्त्री, मन्त्रिपरिषद् का सदस्य भी होता था और राजा को भी सुझाव दे सकता था; जब कि अमात्य मन्त्रिपरिषद् का सदस्य तो होता था किन्तु उसको मन्त्रिपद