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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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मंत्री साम्राज्यरूपी शकट के दो पहिये हैं, जिनके बिना वह राज्य-शकट आगे नहीं बढ़ सकता है । ( अर्थशास्त्र, पृ० १९ ) । मंत्री ही राजा का ऐसा सहायक है, जो विपत्ति के समय उसकी रक्षा और प्रमाद के समय उसको सावधान करता है ।

मंत्रिपरिषद् की योजना का मुख्य उद्देश्य है प्रत्येक राजकीय समस्या पर विचार करना और राज्य की उन्नति के लिये योजनाएँ बनाना । सभी राज-कार्यों को मंत्रणा के बाद ही क्रियान्वित करने का कौटिल्य ने विधान किया है । इस मंत्रणा को राजा एकाकी नहीं कर सकता । अकेले में विचारित कार्यक्रमों की सफलता संदिग्ध होती है । इसलिए समुचित परामर्श के लिये मन्त्रि-परिषद् की अनिवार्यता स्वयं सिद्ध है ।

कौटिल्य का कहना है कि अज्ञात विषय को जान लेना, ज्ञात विषय का निश्चय करना, निश्चित विषय को स्थायी रूप देना, मतभेद हो जाने पर संशय का निराकरण करना, किसी विषय का आंशिक ज्ञान होने पर ही उस सारे विषय को हृदयंगम करना ये सभी कार्य मन्त्रिपरिषद् के अधीन होते हैं । इसलिए मन्त्रियों का अत्यन्त बुद्धिमान् होना आवश्यक है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४४ ) ।

किसी भी सुविचारित गुप्त विषय के रहस्य को सुरक्षित रखने के लिये कौटिल्य ने बड़ा जोर दिया है । कौटिल्य का कहना है कार्यान्वित होने से पहले ही किसी गुप्त योजना का फूट जाना, राजा और मंत्रिपरिषद दोनों के लिये अनिष्ट का कारण हो सकती है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४३ ) । इसलिए मंत्र की सुरक्षा के लिये पहली आवश्यकता यह है कि मंत्रणा-गृह अत्यन्त सुरक्षित हो । दूसरे में राजा तथा उसके परिषद् इतने संयमी एवं विचारवान् होने चाहिये कि उनकी किसी चेष्टा से उनके गुप्त रहस्यों का भेद प्रकट न हो सके । मंत्र की सुरक्षा के लिये तीसरी आवश्यकता इस बात की है कि मंत्रणा में भाग लेने वाला कोई भी व्यक्ति मादक वस्तुओं का सेवन न करता हो ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ४३-४४ ) ।

कौटिल्य ने मंत्र के पाँच अंग बताये हैं : कार्य आरंभ करने का तरीका, योग्य पुरुषों का सहयोग तथा द्रव्य-संचय, देश तथा काल का विचार, अनर्थों से आत्मरक्षा और अपनी अभीष्ट सिद्धि का विचार ।

मनु ( मनुस्मृति ७।५७ ) और कौटिल्य ( अर्थशास्त्र, पृ० ४६ ) दोनों इस बात में सहमत हैं कि राजा को चाहिये कि पहले वह सब मंत्रियों से अलग-अलग परामर्श करे और तब उन सबको एक साथ बैठा कर उनके साथ विचार करे । बृहस्पति ( बृहस्पतिशास्त्र १।४, ५ ) का तो यहाँ तक कहना है

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