भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म ( कर्तव्य ) का पालन करे और सदाचार में प्रवृत्त रहे, कौटिल्य की व्यवस्था का यह प्रमुख उद्देश्य है, किन्तु धर्म और सदाचार की अवरोधक प्रवृत्तियों का दमन कैसे संभव हो, इसके लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी। कौटिल्य की यह दण्ड-व्यवस्था बहुत ही वैज्ञानिक है। जिस रूप में कि मनुष्य का धर्म बना रहे और समाज में लोक कल्याण के आदर्श प्रतिष्ठित रहें, वैसे विधान से दण्ड की व्यवस्था की गयी है। इस संबंध में कौटिल्य का अभिमत है कि अपराधियों के लिए ऐसा दण्ड निर्धारित होना चाहिए जो कि उद्वेगकर न हो, मृत्युदण्ड से प्रजा दण्ड देने वाले का ही तिरस्कार करने लगती है, उचित दण्ड ही कल्याणकर होता है, भली-भाँति विचार करके निर्धारित किया गया दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में लगाये रखता है, ईर्ष्या, द्वेष और अज्ञान के द्वारा अविचारित दण्ड जीवनमुक्त वानप्रस्थों और परिव्राजकों तक को कुपित कर देता है, फिर भला गृहस्थ लोगों के संबंध में तो उसकी कल्पना करना भी भयावह है। ( अर्थशास्त्र, पृ० १३ )

कौटिल्य के मतानुसार दण्ड का बहुत बड़ा स्थान है, क्योंकि आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्ड, इन चारों विद्याओं में दण्डनीति ही एक ऐसी बलवती विद्या है, जिसके द्वारा शेष तीनों विद्याओं का सुविधापूर्वक संचालन किया जा सकता है। ( अर्थशास्त्र, १२ ) वस्तुतः कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था की योजना का संपूर्ण आधार लोककल्याण और लोकरक्षा के निमित्त जान पड़ता है।

वर्णाश्रम व्यवस्था

प्राचीन ग्रंथों का अनुशीलन करने पर हमें तत्कालीन जन-समुदाय तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त हुआ मिलता है : क्षत्र ( योद्धा ), ब्रह्मन् ( पुरोहित ) और विश ( श्रमिक )। क्षत्र लोग समाज के नेता, शासक, राजा एवं सरदार रहे, ब्रह्मन् अपनी बौद्धिक शक्ति के कारण राजा के सचिव, न्यायाधीश तथा धार्मिक नेता या अनुशासक के पदों पर अधिष्ठित थे, और विश वर्ग के लोग कृषक, व्यापारी के रूप में व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग-धंधों के द्वारा संपत्ति का उपार्जन करते रहे। जन-समूह का यह त्रिविध वर्ग-भेद जब तक श्रम-विभाजन की दृष्टि से अपने कर्तव्यों में ईमानदार बना रहा तब तक तो उसने अच्छी उन्नति की, किन्तु जब वह अधिकार-लिप्सु तथा शोषक बन कर शेष समाज की उपेक्षा करने लगा तो स्वभावतः उसके पतन की भूमिका तैयार होने लगी थी। उनकी इन पतनोन्मुख स्थितियों एवं प्रवृत्तियों पर प्रकाश