भारतकोश
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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म ( कर्तव्य ) का पालन करे और सदाचार में प्रवृत्त रहे, कौटिल्य की व्यवस्था का यह प्रमुख उद्देश्य है, किन्तु धर्म और सदाचार की अवरोधक प्रवृत्तियों का दमन कैसे संभव हो, इसके लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी। कौटिल्य की यह दण्ड-व्यवस्था बहुत ही वैज्ञानिक है। जिस रूप में कि मनुष्य का धर्म बना रहे और समाज में लोक कल्याण के आदर्श प्रतिष्ठित रहें, वैसे विधान से दण्ड की व्यवस्था की गयी है। इस संबंध में कौटिल्य का अभिमत है कि अपराधियों के लिए ऐसा दण्ड निर्धारित होना चाहिए जो कि उद्वेगकर न हो, मृत्युदण्ड से प्रजा दण्ड देने वाले का ही तिरस्कार करने लगती है, उचित दण्ड ही कल्याणकर होता है, भली-भाँति विचार करके निर्धारित किया गया दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में लगाये रखता है, ईर्ष्या, द्वेष और अज्ञान के द्वारा अविचारित दण्ड जीवनमुक्त वानप्रस्थों और परिव्राजकों तक को कुपित कर देता है, फिर भला गृहस्थ लोगों के संबंध में तो उसकी कल्पना करना भी भयावह है। ( अर्थशास्त्र, पृ० १३ )

कौटिल्य के मतानुसार दण्ड का बहुत बड़ा स्थान है, क्योंकि आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्ड, इन चारों विद्याओं में दण्डनीति ही एक ऐसी बलवती विद्या है, जिसके द्वारा शेष तीनों विद्याओं का सुविधापूर्वक संचालन किया जा सकता है। ( अर्थशास्त्र, १२ ) वस्तुतः कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था की योजना का संपूर्ण आधार लोककल्याण और लोकरक्षा के निमित्त जान पड़ता है।

वर्णाश्रम व्यवस्था

प्राचीन ग्रंथों का अनुशीलन करने पर हमें तत्कालीन जन-समुदाय तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त हुआ मिलता है : क्षत्र ( योद्धा ), ब्रह्मन् ( पुरोहित ) और विश ( श्रमिक )। क्षत्र लोग समाज के नेता, शासक, राजा एवं सरदार रहे, ब्रह्मन् अपनी बौद्धिक शक्ति के कारण राजा के सचिव, न्यायाधीश तथा धार्मिक नेता या अनुशासक के पदों पर अधिष्ठित थे, और विश वर्ग के लोग कृषक, व्यापारी के रूप में व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग-धंधों के द्वारा संपत्ति का उपार्जन करते रहे। जन-समूह का यह त्रिविध वर्ग-भेद जब तक श्रम-विभाजन की दृष्टि से अपने कर्तव्यों में ईमानदार बना रहा तब तक तो उसने अच्छी उन्नति की, किन्तु जब वह अधिकार-लिप्सु तथा शोषक बन कर शेष समाज की उपेक्षा करने लगा तो स्वभावतः उसके पतन की भूमिका तैयार होने लगी थी। उनकी इन पतनोन्मुख स्थितियों एवं प्रवृत्तियों पर प्रकाश

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डालने से पूर्व यहां भारत की कुछ प्राचीन आदिम मूल जातियों का उल्लेख करना आवश्यक समझा जा रहा है ।

ऋग्वेद ( ५।७८।१२९।३, ६।४६।७ ) में जिन पांच भूमियों (पंच-क्षिति) का उल्लेख किया गया है, वे पांच भूमियां वस्तुतः उन पांच नदियों के आस-पास की भूमियां थीं, जिनके कारण पंचनद का नाम इतिहास में देखने को मिलता है । इन पांच भूमियों में बसने वाले एक ही स्तर के लोग धीरे-धीरे पांच विभिन्न जातियों में ( पंचजन, ऋक् ६।११।४, ६।५१।११, ७।३२।३२, ९।६५।३२ ) में बंट गयीं, जिनकी आजीविका खेती थी और इसीलिये जिन्हें पांच कृषि-जीवियों ( पंच कृषिवी : ऋक्० २।२।१०, ४।३८।१०।२ ) के नाम से स्मरण किया गया । ये पांच जातियां आरंभ में बड़ी उद्योगी थीं और नदियों के उर्वर तटों पर कृषि एवं चरागाह के द्वारा जीविकोपार्जन किया करती थीं, इन्हीं के द्वारा हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक की व्यापक सभ्यता का निर्माण हुआ ( मैक्समूलर : इंडिया : ह्वाट कैन इट टीच अस, पृ० ९५-९६-१८९९ ) । पांच आर्य परिवारों के परिचायक पुरुष, तुर्वस्, वेदस्, अनुस् और द्रुह्यस्, इन्हीं पांच जातियों के प्रतीक थे ।

ये पांच जातियां अपने व्यावसायिक विभेदों के कारण पांच वर्णों में विभक्त हो गये थे, जिनके नाम थे : भंन्त्री, योद्धा, व्यापारी, दास और काले चमड़े वाले । लम्बी अवधि तक इन जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह और सहभोज की स्थिति बनी रही । किन्तु काले चमड़े वाले आर्यों ने जब यहां के मूल निवासी दस्युओं ( दासों ) के साथ सेवक भावना का आचरण करना आरंभ किया और वंश, जन्म, जाति आदि की प्रमुखता स्वीकार की जाने लगी तो सहभोज तथा अंतर्जातीय विवाहों की परंपरा तो जाती ही रही, वरन् उनके बीच गहरी खाई भी पड़ने लग गयी थी ।

ऐसा प्रतीत होता है कि जातियों के जन्मना निर्णय करने का सिद्धांत पुराणकाल तक स्वीकृत नहीं हुआ था ( विष्णुपुराण, खंड ३ अध्याय ८ ) । जातक कथाओं ( उद्दालक ४।२९३, चाण्डाल ४।३८८, सतक्लम्म २।८२, चित्तसंभूत ४।३९० ) तथा अन्य बौद्ध ग्रंथों ( जे० आर० ए० एस० पृ० ३४६, १८६४ ) से यह बात स्पष्ट होती है कि जातियों की उच्चता तथा निम्नता का निर्णय बौद्धिक क्षमता के आधार पर था । उदाहरण के लिये विश्वामित्र ने क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी अपने उन्नत कर्मों और ऊंची प्रतिभा के कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था । लेकिन चारों वर्णों की भिन्नता का

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सिद्धांत बहुत पहिले ही से चला आ रहा था ( आर० सी० मजूमदार : कार-पोरेट लाइफ इन ऐंशिअंट इण्डिया, पृ० ३६४ ) ।

अपनी चतुराई और बुद्धि के प्रभाव से ब्राह्मणों ने धार्मिक तथा सामा-जिक क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त कर ली थी । यद्यपि वे शासक नहीं रहे, फिर भी पुरोहितों, सचिवों, न्यायाधीशों के सारे शासन-संचालन संबंधी अधिकार उन्हें प्राप्त थे और उन्होंने ही चारों वर्गों के लिए एवं आश्रम संबंधी व्यवस्था के लिए नियम भी बनाये ।

श्रम के इस वंशगत विभाजन के कारण समाज में अनेक जातियां पनपने लगीं थीं। भारत की पुरातन समाज-व्यवस्था में हमें देखने को मिलता है कि राजनीतिक दृष्टि से भले ही उसने अनेक पराजयों को देखा था, किन्तु घोर आपत्ति और कठिन संकट में भी एकता की भावना को उसने खोया नहीं। अनेक श्रेणियों, वर्गों, वर्णों, जातियों, भाषाओं और धर्मों के बावजूद भी भारतीय जनता की नैतिक तथा बौद्धिक शक्ति कभी भी क्षीण नहीं हुई।

कौटिल्य ने वर्णाश्रम की व्यवस्था से मर्यादित समाज को सुखकर और मुक्तिदायी बताया है। यह मर्यादित वर्णाश्रम-व्यवस्था अपने-अपने धर्म के पालन में बतायी गयी है (अर्थशास्त्र, पृ० १३) ।

वर्णाश्रम की व्यवस्था का महत्त्व हिन्दू समाज में लगभग अनादि है। प्राचीन भारत में व्यष्टि और समष्टि के क्रिया-क्षेत्रों को एक दूसरे से भिन्न माना गया है; किन्तु उनकी पूर्णता पारस्परिक समन्वय में ही बतायी गयी है। कुछ व्यक्तिगत नियम ऐसे हैं, जिनका पालन करके या जिनको जीवन में उतार कर व्यक्ति अपना उत्थान कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि वह दूसरे का या सारे मानव समाज का उत्थान कर सके। व्यक्ति और समष्टि के उत्थान हेतु प्राचीन भारत में जो नियम-निर्देश निर्धारित किये गये थे, उन्हीं को वर्णा-श्रम नाम दिया गया।

वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति को सामूहिक हित-चिंतना की ओर ले जाता है, जब कि आश्रम-व्यवस्था उसको व्यक्तिगत उन्नयन की ओर आकर्षित करती है, जिससे कि तप तथा त्याग के द्वारा वह अपने कलुषों एवं असन्तोषों को भस्म कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि समाज के अभ्युदय में वह उपयोगी सिद्ध हो सके।

वर्णाश्रम-व्यवस्था की इसी मर्यादा को कौटिल्य ने अपनाया है और उसी के कल्याणमय स्वरूप को उन्होंने यों रखा है।

४ कौ० भू०

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गृहस्थ-जीवन के दायित्व से निवृत्ति प्राप्त करने के संबंध में हमारे पूर्वाचार्यों ने विशेष नियम निर्धारित किये हैं। सामान्यतया गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों से ५० वर्ष की आयु के बाद छुटकारा पाया जा सकता है; किन्तु उससे पूर्व कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा करना आवश्यक बताया गया है। मनु (६।१) ने कहा है कि 'द्विज को चाहिए कि दृढ़ प्रतिज्ञ होकर इन्द्रियों को वश में करके वह वन में निवास करे।' साथ ही उसने अवकाश ग्रहण करने के संबंध में कहा है (६।२) कि 'जब शरीर की त्वचा में सिकुड़न पड़ जाय और वाल फूलने लगें, तब उस व्यक्ति को गृहस्थ से अवकाश ले लेना चाहिए।' (अर्थशास्त्र, पृ० ८०) ने कहा है कि 'जो व्यक्ति मैथुन-भोग्य-अवस्था को पार कर जाता है, वह अपनी संपत्ति का सम्यक् वितरण करके साधु हो सकता है।'

संन्यास या वानप्रस्थ-जीवन ग्रहण करने से पूर्व एक बात यह भी कही गई है कि जब तक कोई व्यक्ति अपने पुत्र के पुत्र को नहीं देख लेता, वह अवकाश ग्रहण करने का अधिकारी नहीं है। इसका आशय यह है कि अवकाश ग्रहण करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र को इस योग्य बना देना चाहिए कि वह परिवार और समाज की भलाई के लिए गृहस्थ के कर्त्तव्यों का भार वहन के सर्वथा योग्य हो सके। कौटिल्य ने इस शर्त का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को अपराधी घोषित किया है और कहा है 'यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने पुत्रों के भरण-पोषण का प्रबंध किये बिना तपस्वी का जीवन ग्रहण कर लेता है तो वह दण्ड का भागी है।'

समाज और परिवार की उन्नति को दृष्टि में रखकर अपने कर्तव्यों का पूरी तरह निर्वाह करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति वानप्रस्थ और उसके बाद पवित्र संन्यास-जीवन धारण कर सकता है। हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में वैयक्तिक आत्मोन्नति की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक बताया गया है कि पहिले वह नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन की मंजिलों को क्रमशः पार कर उसके बाद वानप्रस्थ या संन्यास का ऊँचा जीवन बिता सकता है।

समाज की अभ्युन्नति और जीवन में सदाचार एवं नैतिकता बनाये रखने के लिए हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में आदि से ही विवाह को एक श्रेष्ठ आदर्श के रूप में ग्रहण किया गया है। हिन्दुओं के धर्मग्रन्थों में विवाह के लिए भिन्न गोत्र की व्यवस्था पर बड़ा जोर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप पति और

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पत्नी के विभिन्न रक्तों ( गोत्रों ) का संमिश्रण होकर अच्छी संतति को पैदा किया जा सके। इस व्यवस्था ने समाज में विभिन्न परिवारों को संघटित करने में बड़ी सहायता की। विवाह के लिए सम-स्वभाव के दम्पती को ही आवश्यक बताया गया है। सम-स्वभाव अर्थात् ऐसे परिवार जो व्यवसाय, आर्थिकस्तर, धर्म और विचारों में एकता रखते हों। एकता की इसी भावना ने पहिले तो विच्छिन्न व्यक्ति-समूहों को कुछ विशिष्ट जातियों में एकत्र किया और बाद में भी उन्हीं संघटित जातियों के द्वारा वृहद् राष्ट्र की नींव पड़ी।

न्याय और व्यवस्था

प्राचीन भारत की राज्य-व्यवस्था में धर्म का सर्वोच्च स्थान रहा है। समाज के सभी वर्ग और सारी कार्य-प्रणाली के मूल में धर्म के नीति-निर्देश समन्वित थे। समाज का सबसे बड़ा व्यवस्थापक राजा भी धर्म के बन्धन से इस प्रकार बंधा था कि इस दिशा में कोई संस्कार-संशोधन करने का उसे कोई अधिकार ही नहीं था। धर्मसूत्रों और मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में राजा को धर्म का ही एक अंग माना गया है। हिन्दू राज्य-व्यवस्था में जिस युग में राजा को सभी अधिकार प्राप्त थे तब भी राजा से धर्म को उच्च स्थान प्राप्त था। मनुस्मृति में तो राजा को अर्थदण्ड देने तक की बात कही गई है ( ८।३३६ )। अर्थशास्त्र में तो राजा को इतनी छूट दी गई है कि वह कानून बना सकता है; किन्तु धर्मशास्त्र में वह बात भी नहीं है। अर्थशास्त्र (अर्थशास्त्र, पृ० २५९) में साथ ही यह भी कहा गया है कि राजा ऐसा कानून नहीं बना सकता है जो धर्म के विरुद्ध हो और जिससे राजा को मनमाना अधिकार प्राप्त हो सके।

प्राचीन भारत में, जब कि हिन्दू-शासन-प्रणाली सर्वथा एक राजत्व पर आधारित थी, न्याय-विभाग, शासन-विभाग से अलग रखा जाता था। उस समय राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान् तथा श्रेष्ठ नैतिक आचरण वाले पुरोहित, राजनीतिज्ञ और ब्राह्मण लोग मंत्री नियुक्त किये जाते थे और वही न्यायाधीश भी हुआ करते थे। धर्म-संबंधी सारी शासन-व्यवस्था पुरोहितों के हाथ में थी। उस पुरोहित न्यायाधीश पर राजा का कोई अंकुश नहीं होता था।

इस प्रकार की कानूनी अदालत का नाम सभा था, जिसमें न्यायाधीशों की सहायता के लिए समाज के लोगों की एक स्वतन्त्र संस्था भी हुआ करती थी। मनु के मतानुसार तीन पंच, न्यायाधीशों की सहायता के लिए हुआ करते थे (मनुस्मृति ८।१०) और जो कानून पारित किया जाता था, उसका ठीक

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तरह से अर्थ बताने के लिए एक विद्वान् ब्राह्मण हुआ करता था ( ७।२० )। किन्तु कौटिल्य ने लिखा है कि न्याय-व्यवस्था का सारा भार राज्य के अर्थ-शास्त्रविद् तीन सदस्यों और तीन अमात्यों के ऊपर निर्भर होना चाहिए।

मुकदमों की निष्पक्ष जांच हो और न्याय की दिशा में किसी प्रकार का दोष न आने पावे, इसका निरीक्षण करने के लिए वृद्धों की व्यवस्था थी। ये वृद्ध आजकल के ज्यूरियों जैसे थे। इस प्रकार के लगभग ७, ५ या ३ ज्यूरी होते थे (शुक्रनीतिसार ४।५।३६-३७)। राजा अपनी परिषद् के साथ मुकदमा सुनता था, जिसमें प्रधान न्यायाधीश भी हुआ करते थे। किसी भी मामले की अपील करने के लिए उच्च न्यायालय होता था (नारद, प्रस्ता० १।७; वृहस्पति १।२९; याज्ञवल्क्य २।३०)। जिन मुकदमों को राजा सुनता था, उनका फैसला वह अपनी परिषद् तथा जजों के परामर्श से करता था। सभी न्यायों का निर्णय राजा के नाम से होता था।

उच्च न्यायालय के सर्वप्रधान न्यायाधीश को प्राड्विवाक कहा जाता था। वही न्याय-विभाग का मंत्री भी हुआ करता था। धर्मशास्त्र विभाग का अलग मंत्री था, जिसको पंडित ( धर्माधिकारी ) कहा जाता था। दोनों के कार्य अलग-अलग थे। न्याय की दिशा में प्राड्विवाक का कार्य ज्यूरी का बहुमत जानकर धर्म या कानून के अनुसार यह बतलाना होता था कि अभियुक्त वास्तव में दोषी है कि नहीं, और तब उसके बाद राजा को परामर्श देना था। 'पंडित' या धर्माधिकारी का यह कार्य होता था कि लोक में जन-जन धर्मों का व्यवहार किया जा रहा है, वे धर्मशास्त्रसंमत हैं या नहीं और तब राजा से वह ऐसे कानून बनवाने की सिफारिश करता था जो लोक को हितकारी सिद्ध हों।

इस प्रकार न्याय और व्यवस्था की दृष्टि से राजा सर्वदा ही प्राड्विवाक और धर्माधिकारी के अधीन हुआ करता था। समाज में जहाँ भी जिस दिशा में ऐसी आशंका होती कि धर्म और न्याय के द्वारा निर्दिष्ट नियमों का पालन नहीं हो रहा है, वहाँ के लिये वह प्रजा को इस बात के लिए सावधान करता था कि वह प्राड्विवाक तथा धर्माधिकारी की आज्ञाओं पर चले।

न्याय-व्यवस्था की शरण में जाने या मुकदमों के लिए मनु ने १८ कारण गिनाये हैं ( मनुस्मृति ८।४-७ ) जिनके नाम हैं : ऋण और धरोहर का भुगतान न करना; बिना स्वामित्व का विक्रय करना; साझीदारों के संबंध में गड़बड़ी हो जाना; दान दी हुई वस्तु को पुनः वापिस लेना; पारिश्रमिक का

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भुगतान न करना; समझौतों को भंग करना; क्रय-विक्रय की व्यवस्था का उल्लंघन करना; स्वामी तथा भृत्य के बीच विवाद पैदा होना; सीमा संबंधी अड़चन का उपस्थित होना; किसी को मारना; किसी का अपमान करना; किसी की चोरी करना; हिसा तथा व्यभिचार करना; वैयक्तिक कर्तव्यों को न निभाना; पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे में मतभेद हो जाना; और जुआ तथा पांसा आदि खेलना ।

इस प्रकार के किसी भी विवाद के उपस्थित हो जाने पर कौटिल्य का कहना है कि न्यायाधीश को चाहिये कि वह किसी भी वादी-प्रतिवादी को न धमकाये; या अपमान करे; या न्यायालय से बाहर निकाले । किसी मामले में व्यक्तिगत दबाव नहीं डालना चाहिए । मुकदमे का लेखक वादी-प्रतिवादी के बयानों में न तो अस्पष्ट बयानों को टाले और न ही स्पष्ट कही हुई बातों को अन्यथा या संदिग्ध रूप में लिखे । प्रधान न्यायाधीश का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक निर्णीत मुकदमे का पुनर्निरीक्षण करे और उसके सभी पहलुओं को अच्छी तरह से देखे । न्याय की प्रभावशाली व्यवस्था का परिचय हमें कौटिल्य के उस वाक्य से मिलता है, जिसमें लिखा गया है कि "जब राजा किसी निरपराध व्यक्ति को दण्ड देता है तो उस किये गये अर्थदण्ड का तीस गुना द्रव्य राजा को वरुण देवता के निमित्त जल में फेंकना पड़ता है, जो कि बाद में ब्राह्मणों में बाँट दिया जाता है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४०२ ) । इससे पता चलता है कि पूरी सावधानी रखने के बावजूद भी न्याय में त्रुटि रह जाने की संभावना थी और राजा तक उस सर्वोच्च न्याय-व्यवस्था से नियमित था । अर्थशास्त्र में उद्धृत अपराधों और अपराधियों की सूची को देखकर पता चलता है कि न्याय की दिशा में कौटिल्य के विचार कितने परिष्कृत और कितने ठोस थे ।

कौटिल्य की कानून-व्यवस्था के अनुसार राज्य के सभी व्यक्ति एकसमान माने गये हैं । यहाँ तक कि जिस ब्राह्मण के प्रति पक्षपात का दोषारोपण किया जाता है, अपराध के आगे वह भी अन्य जातियों के समान दण्डभागी माना गया है । स्वयं राजा के लिये दण्ड-व्यवस्था निर्धारित करके कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था में जनतन्त्र की भावना को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है । एक सामाजिक व्यक्ति का परिवार के प्रति, माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र, शासक, शासित, नौकर, श्रमिक, व्यापारी, कलाकार, धोबी, ग्वाला और ग्राहक आदि के प्रति क्या कर्तव्य है, इसकी भी व्यापक व्याख्या कौटिल्य ने की है ।

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बलात्कार, व्यभिचार जैसे सामाजिक तथा नैतिक पतन के कार्यों के लिए कौटिल्य ने कठोर दण्ड निर्धारित किये हैं। चरित्र सम्बन्धी ऊँचाई के लिए कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था बड़ी ही उपयोगी है।

राज्य की आर्थिक आय के साधन

कौटिल्य की साम्राज्य-व्यवस्था का आर्थिक ढाँचा औद्योगिक आधार-भूमि पर खड़ा है। कौटिल्य की अर्थ-नीति के प्रमुख सिद्धान्त तीन हैं। पहिले सिद्धांत के अन्तर्गत ऐसे उद्योगों ( Industries ) को रखा गया है, जिन पर राज्य का स्वामित्व हो और जो राज्य के द्वारा ही संचालित एवं संघटित हों। इन उद्योगों की पूंजी ( Capital ), श्रम ( Labour ) और प्रबन्ध ( Management ) का दायित्व राज्य पर ही निर्भर रहे। इस प्रकार की औद्योगिक अर्थनीति का परोक्ष उद्देश्य एक सशक्त, आत्म-निर्भर और सर्वसाधनसंपन्न राज्य की प्रतिष्ठा करना था। इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण उद्योगों ( Key Industries ) में सोना, चाँदी, शिलाजीत, ताँबा, शीशा, टिन, लोहा, मणि, लवण आदि आकर उद्योगों ( Industry of mines ) का प्रमुख स्थान है।

दूसरे प्रकार के उद्योगों का सम्बन्ध जनता से है। इस श्रेणी के उद्योग राज्य के नागरिकों की निजी सम्पत्ति ( Private Property ) के रूप में माने गये हैं। उनके संघटन, संचालन और पूंजी, श्रम एवं प्रबन्ध का दायित्व भी नागरिकों पर ही निर्भर है। उन पर जनता का ही पूर्ण स्वामित्व है। ऐसे उद्योगों में खेती, सूत, शिल्प, गो-पालन, अश्व-पालन, हस्ति-पालन, सुरा, मांस, वेश्यालय और नट-नर्तक गायक-वादक आदि की गणना की जा सकती है।

कौटिल्य की अर्थनीति का तीसरा सिद्धांत समाज में ऐसी सुव्यवस्था बनाये रखने से संबद्ध है, जिसके अनुसार राज्य के समस्त उत्पादन ( Production ), वितरण ( Distribution ) और उपभोग ( Consumption ) पर शासन-सत्ता का नियन्त्रण बना रहेगा।

उक्त सभी उद्योगों तथा व्यवसायों पर राज्य का स्वामित्व ( State Ownership ) इसलिए माना गया है कि राज्य का अर्थबल सशक्त बना रहे और समाज के सभी वर्ग क्रियाशील बने रहें।

धर्म-दर्शन, काव्य, कला और अर्थ आदि साहित्य के जितने भी अंग हैं, उनमें धर्म-अर्थ-काम एवं मोक्ष, इस वर्गचतुष्टय की उपयोगिता पर अनेक प्रकार से विचार किया गया है। अर्थशास्त्र, क्योंकि ऐहिक जीवन से संबद्ध क्रिया व्यापारों की ही विवेचना प्रस्तुत करता है, अतः उसमें मोक्ष को छोड़कर

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त्रिवर्ग के संबंध में ही प्रकाश डाला गया है। धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों का पारस्परिक संबंध बताते हुए कौटिल्य ने यह स्वीकार किया है कि उनमें प्रमुखता अर्थ की है और शेष दोनों धर्म तथा काम, अर्थ पर ही निर्भर हैं। इसी लिए त्रिवर्ग की समुचित उपलब्धि के लिए अर्थ की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया है। यही अर्थ जब राज्यकर के रूप में या रक्षा के पुरस्कार हेतु अथवा सेवा के प्रतिदान के निमित्त शासन को प्राप्त होकर एक संरक्षित स्थान पर एकत्र कर रखा जाता है तब उसी को राजकोष के नाम से कहा जाता है।

राष्ट्र की समुन्नति और सुरक्षा के निमित्त जितने भी उपाय तथा साधन बताये गये हैं, उनमें कोष का प्रमुख स्थान है। इसी हेतु कोष-विभाग के कर्मचारियों से लेकर कोष की सुरक्षा, उसकी वृद्धि के उपाय, उसकी आय के साधन और उसके क्षय के कारणों पर कौटिल्य ने बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया है।

अर्थ-विभाग के सबसे बड़े अधिकारी को समाहर्त्ता कहा गया है। वह समाज के विभिन्न वर्गों पर, राष्ट्र की विभिन्न वस्तुओं पर, गाँवों, नगरों तथा घरों पर, व्यवसायियों तथा शिल्पियों पर और भूमि पर जो राज्यांश निर्धारित है, उसका संचय करता है तथा उसका पूरा ब्यौरा अपनी निबन्ध-पुस्तक ( Sealed Register ) में अंकित रखता है।

अर्थ-विभाग के अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों में सन्निधाता ( भंडारों का अधिकारी ), स्थानिक ( जनपद के चतुर्थांश का अधिकारी ), गोप ( गाँवों का अधिकारी ), प्रदेष्टा ( स्थानिक तथा गोप का सहायक अधिकारी ) अक्षपटलाध्यक्ष ( अकाउंट जनरल ), कोषाध्यक्ष, अर्थकारणिक ( मुख्य अकाउंटेंट ) कार्मिक ( अर्थकारणिक का अधीनस्थ कर्मचारी ), गाणनिक्य ( जिलों का हिसाब-किताब रखने वाले कर्मचारी ), सांख्यानक ( गणना करने वाले ), लेखक ( क्लर्क ), नीवीग्राहक, गोपालक, अपयुक्त, निधानक, निबंधक, प्रतिग्राहक, दायक और मंत्रिवैयावृत्यक आदि का नाम उल्लेखनीय है।

राजकोष के संचय के साधनों में, जिन्हें कि कौटिल्य ने आयशरीर कहा है, दुर्ग, राष्ट्र, खान, सेतु, वन, व्रज और वणिक्पथ प्रमुख हैं।

राज्य की आर्थिक व्यवस्था पर ही उसकी उन्नति के सभी जरिये निर्भर हैं। इसलिए राजकोष के उक्त आय-स्रोतों के अलावा अर्थदण्ड सम्बन्धी पौतवं कर ( नाप-तौल का कर ), नागरिकों द्वारा प्राप्त राज्यांश, कृषिकर, उपज का

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अंश, बलि कर, धार्मिक कर, वणिक कर और व्यावसायिक वस्तुओं के आयात-निर्यात से जो आमदनी होती थी उसको भी राजकोष में जमा कर दिया जाता था।

राजकर

हिन्दुओं की राज्य-व्यवस्था के इतिहास में राजकर का मौलिक महत्त्व माना गया है। क्योंकि राजकर का सम्बन्ध प्रजा से होता था, इस दृष्टि से राजकर को निर्धारित करने के सारे नीति-नियम यद्यपि धर्म-ग्रन्थों द्वारा निर्धारित किये जाते थे, तथापि उसको लागू करने से पूर्व उस पर समाज की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता था। इस प्रकार धर्मशास्त्र द्वारा निर्धारित और समाज द्वारा स्वीकृत जो राजकर होता था, शासन-व्यवस्था चाहे जैसी भी रहे, किन्तु राजकर के नियमों में किसी भी प्रकार का अवरोध नहीं आने पाता था। यही कारण था कि राजकर के सम्बन्ध में राजा-प्रजा के बीच कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। कई ग्रन्थों में इस प्रकार के अनेकों उदाहरण मिलते हैं कि राजकर के सम्बन्ध में जो धर्म द्वारा प्रतिपादित नियम थे, उनका अतिक्रमण करने का साहस बड़े-से-बड़े शासक भी नहीं कर सके थे।

अर्थशास्त्र के एक प्रसंग ( अर्थशास्त्र, पृ० ४१४-४१९ ) में कहा गया है कि सेल्युकस के आक्रमण के समय जब प्राप्त राजकर से कार्य न सध पाया था तो चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य ने प्रजा से धन संग्रह करने में अपना सारा बुद्धिबल लगा दिया था। इसके लिए उन्हें बड़े विलक्षण उपायों का आश्रय लेना पड़ा था। अन्त में चन्द्रगुप्त ने अपनी प्रजा से अनुग्रह की भिक्षा मांगते हुए कहा था 'आप लोग मुझ पर अपना प्रेम सूचित करने के लिए धन दें।' उसने इस विपत्ति से रक्षा के लिए देव-मन्दिरों तक से धन वसूल किया था।

राज्य की सारे आय-व्यय पर मन्त्रि-परिषद् का अधिकार होता था। राजा और राजकर के सम्बन्ध में महाभारत ( शांति० ७१।१० ) एक सुन्दर प्रसंग उपस्थित करता है। उसमें लिखा है कि 'षष्ठांश बलिकर ( आयात-निर्यात ), अपराधियों से मिलने वाला जुरमाना और उनके द्वारा अपहृत धन, जो कुछ भी न्यायतः प्राप्त हो, वह सब तुम्हारे वेतन के रूप में होगा; और वही तुम्हारी आय के द्वार या राजकर होगा।' नारदस्मृति ( १८।४८ ) में लिखा हुआ है कि 'राजाओं को पूर्व निश्चित नियमों के अनुसार जो धन प्राप्त हो और भूमि की उपज का जो षष्ठांश प्राप्त हो, वह सब राजकर होगा,

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और प्रजा की रक्षा करने के पुरस्कार स्वरूप वह राजा को मिलेगा।' अपनी रक्षा के फलस्वरूप प्रजा का प्रतिनिधि पुरोहित राज्याभिषेक के समय राजा से यह कहता था कि 'हम तुम्हारे निर्वाह के लिए तुम्हारा उचित अंश (भाग) तुम्हें दिया करेंगे' (शुक्रनीतिसार १।१८८)।

इन सभी उल्लेखों से हमें राजकर की सुव्यवस्था के संबंध में कितनी आस्थापूर्ण विचारधारा का पता लगता है।

राजकर सम्बन्धी नियमों के प्रसंग में दूसरी अनेक बातों के अतिरिक्त महाभारत ( १२।८८।४ ) में एक महत्त्व की बात यह कही गयी है कि 'राज-कर ऐसा होना चाहिए जो प्रजा पर भारस्वरूप सिद्ध न हो; राजा को अपना आचरण उस मधुमक्खी के समान रखना चाहिए जो वृक्षों को बिना कष्ट पहुँचाये उनसे मधु एकत्र करती है।' (अर्थशास्त्र, पृ० ४१९) कुछ निरर्थक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'जो वस्तुएँ राष्ट्र के लिए दुःखदायक हों; जो निरर्थक और केवल शोक के लिए हों; उन पर अधिक कर लगा करके उनका आयात कम करना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ४१२-४१९)। इनके अतिरिक्त कुछ पदार्थ ऐसे भी थे जिनका निर्यात वर्जित था और देश में जिनका अधिक आयात करने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था; यथा अस्त्र-शस्त्र आदि; धातु; सेना के काम में आने वाले रथ आदि अप्राप्य या दुर्लभ पदार्थ; अनाज और पशु आदि; (अर्थ-शास्त्र वही)। कुछ अवस्थाओं में विशेष कर लगाने का भी नियम था। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि जो लोग विदेश से अच्छी सुरायें आदि लाते थे अथवा घर में अरिष्ट आदि बनाते थे उन पर इतना अधिक कर लगाया जाता था जिससे राज्य में बिकने वाली ऐसी चीजों की कम बिक्री का हरजाना निकल आये (अर्थशास्त्र वही)।

आधुनिक समाजवाद

अठारहवीं शताब्दी के जितने भी महान् दार्शनिक हुए उन्होंने भी संसार की सारी वस्तुओं को विवेक की कसौटी पर परखा।

आधुनिक समाजवाद की उत्पत्ति में प्रमुख दो कारण है : एक तो पूंजी-पतियों तथा श्रमिकों का श्रेणी-विरोध और दूसरा उत्पादन में व्याप्त अराज-कता। बुद्धि और तर्क के द्वारा प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना ही समाजवादी क्रांति को जन्म देने वाले, महापुरुषों का ध्येय रहा है। समाज और राज्य का जो बासीपन था, परम्परा की जो रूढियां थीं, अंध-

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विश्वासों की जो मिथ्याएँ थीं, उनकी जगह सच्चाई, प्रकाश, न्याय और समानता ने ले ली थी। समाजवाद के अभ्युदय का यह अठारहवीं शताब्दी का स्वरूप था। इस नयी क्रांति के बाद पहिले तो उस समय के सामन्ती ठाकुरों तथा पूँजीवादियों के बीच संघर्ष हुआ और इसी बीच शोषकों तथा शोषितों का संघर्ष भी जारी था। यह संघर्ष था पूँजीवादी वर्ग का और मजदूर वर्ग का ( फ्रेडरिक एंगेल्स, समाजवाद : वैज्ञानिक और काल्पनिक, पृ० ६ ) ।

१८वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाजवादी क्रांति के पोषक हुए मोरेली, मैब्लीकी, सेंट साइमन, फूरिये और ओवेना। इनमें सेंट साइमन का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। फ्रांसीसी क्रांति के समय यद्यपि उसकी अवस्था तीस साल से भी कम थी, फिर भी उसका दृष्टिकोण इतना व्यापक और व्यक्तित्व इतना प्रतिभाशाली था कि उसके बाद जितने भी अर्थशास्त्री हुए हैं, उनके विचारों में जितनी बातें देखने को मिलती हैं उन सबका मूल साइमन की रचनाओं में है।

फूरिये ने सामाजिक विकास के पूरे इतिहास को जांगल, वर्वर, पितृसत्ता-त्मक और सभ्य—इन चार भागों में विभक्त किया है। अपने समसामयिक दार्शनिक होगेल की ही भाँति फूरिये ने भी द्वन्द्ववाद की प्रणाली का आश्रय लेकर यह दर्शाया है कि अंत में जाकर मनुष्य जाति का भी नाश हो जायेगा। उसने पूँजीवादी प्रवृत्तियों के समर्थक लेखकों की बड़ी खिल्ली उड़ाई है। वह एक सिद्धहस्त व्यंग्यकार भी था और उसने तत्कालीन समाज में व्याप्त धोखे-बाजी तथा व्यावसायिक मनोवृत्ति का बड़ा ही सजीव रूप उतारा है ( वही, पृ० १६ ) । फूरिये के विचारों के अनुसार समाज की उक्त बुराइयों को सुधारने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया, राबर्ट ओवेन ने। उसने समाज की पूर्ण साम्यवादी ढंग से संघटन की दिशा में भी यत्न किया ( वही, पृ० २० ) ।

अब तक समाजवाद का उद्देश्य था एक दोषरहित समाज-व्यवस्था का निर्माण करना किन्तु अब उसका उद्देश्य हो गया है पूँजीपति और मजदूर वर्गों के और उनके पारस्परिक संघर्षों के आर्थिक घटनाक्रमों के इतिहास का अध्ययन करना। इस समीक्षित सिद्धांत के द्वारा यह पता लग सका है कि अतीत का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है और वर्गों के उदय के मूल में एक मात्र कारण रही हैं, आर्थिक परिस्थितियां ( वही, पृ० २७-२८ ) ।

अब तक दार्शनिकों ने इतिहास को अतिभौतिकवादी, द्वंद्ववादी, आदर्श-

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वादी ढंग से परखने का यत्न किया और यह स्वीकार किया कि मनुष्य की चेतना ही उसकी सत्ता का आधार रही है; किन्तु अब भौतिकवादी ढंग से इतिहास की गवेषणा करने पर यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य की सत्ता को उसकी चेतना का आधार प्राप्त है। अब आवश्यकता इस बात को दिखाने की है कि ऐतिहासिक विकास की एक निश्चित अवस्था में पूंजीवाद का उत्पन्न होना अनिवार्य है; और इसलिए उस अवस्था के परिपक्व हो जाने पर उसका पतन भी निश्चित है।

इतिहास-संबंधी इस भौतिकवादी धारणा का महान् आविष्कारक था, मार्क्स। मार्क्स ने यह सिद्ध किया है कि उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं का विनिमय ही समाज-व्यवस्था का आधार रहा है। इस आधार पर सामाजिक परिवर्तनों तथा राजनीतिक क्रांतियों का पता लगाने के लिए हमें न तो सत्य, न्याय एवं विचारों की खोज करनी चाहिए; बल्कि यह देखना चाहिए कि उस युग की उत्पादन तथा विनियम-प्रणाली में क्या-क्या परिवर्तन हुए। यह एक बहुत बड़ा सत्य अर्थशास्त्रियों ने खोज निकाला है कि किसी युग की ठीक परिस्थितियों का सही ज्ञान, उस युग की दार्शनिक विचारधारा से प्राप्त न होकर उस युग की आर्थिक परिस्थितियों से उपलब्ध हो सकता है।

उत्पादन और विनिमय का तुमुल संघर्ष आज भी पूरी शक्ति पर है। भारत जैसे देश में, जहाँ कि समाजवादी व्यवस्था का आगमन एक नये युग के समान माना जायेगा और जिसके आगमन की माँग दिनों-दिन बढ़ रही है, उत्पादन तथा विनिमय का माध्यम बहुत ही असंतुलित है। इस असंतुलन एवं असंगति को दूर करने का केवल एक ही तरीका है कि :

"सर्वहारा वर्ग राजसत्ता पर अधिकार कर ले। इस सत्ता के सहारे उत्पादन के साधनों को पूंजीवादियों के दुर्बल हाथों से छीन करके उन्हें सार्वजनिक सम्पत्ति बना दिया जाय। इस कार्य द्वारा उत्पादन के साधनों को पूंजी के बन्धनों से वह मुक्त कर देगा और अपने सामाजिक स्वरूप की प्रतिष्ठा करने का उन्हें सु-अवसर देगा। उस अवस्था में समाज का उत्पादन पहिले से बनी योजना के अनुसार संभव हो सकेगा। उत्पादन का विकास हो जाने से समाज में विभिन्न वर्गों का अस्तित्व अनावश्यक और निरर्थक बन जायेगा। जैसे-जैसे सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र से अराजकता दूर होगी, वैसे-ही-वैसे राज्य के राजनीतिक अधिकारों का भी अन्त हो जायेगा। मनुष्य अपने सामाजिक संघटन का स्वामी बन जायेगा; अतः वह प्रकृति का

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और अपने आपका भी स्वामी बन जायेगा। इतिहास में पहिली बार मनुष्य पूर्णतः स्वतन्त्र होगा।" (वही, पृ० ४८)

एंगेल्स के अतिरिक्त मार्क्स, लेनिन और स्टालिन का भी दृष्टिकोण यही रहा है; और आज भी यही स्थिति हमारे सामने विचारणीय है। १८५३ ई० में कोलोन में कम्युनिस्ट लीग के सदस्यों के सजा पाने के बाद मार्क्स राजनीति के आंदोलन से दूर हो गये। उसके बाद दस वर्ष तक उन्होंने ब्रिटिश म्युजियम में अर्थशास्त्र पर उपलब्ध विपुल सामग्री का अध्ययन किया। उनका यह अध्ययन १८५९ ई० में अर्थशास्त्र की समालोचना (भाग १) पुस्तक के रूप में फलित हुआ, जिसमें मूल्य और मुद्रा सम्बन्धी मार्क्सीय सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या देखने को मिलती है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में संप्रति सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक दास कापीटल, क्रिटीक डेर पोलीटीशन ईकोनोमी, एस्टॅर बांट का प्रथम खण्ड १८६७ ई० में हाम्बुर्ग से प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक युगप्रवर्तक के रूप में सिद्ध हुई। इस पुस्तक में समाजवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन और उसके फलाफल की विस्तृत व्याख्या की गयी है।

विज्ञान के इतिहास में मार्क्स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपने यश को अमर बनाया उनमें से 'पहिली तो वह क्रांति है, जो संसार के इतिहास को देखने-परखने के दृष्टिकोण से उन्होंने की है। मार्क्स ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है; अब तक के सीधे और जटिल, सभी राजनीतिक संघर्षों की जड़ में सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्या ही रही है। समस्या यह रही है कि पुराने वर्ग अपनी मिल्कियत बनाये रखें या नये पनपते हुए वर्ग इस मिल्कियत पर हॉवी हो जाँय।"

इन बातों पर गम्भीरता से विचार किये जाने पर मार्क्स के अनुसंधान से "इतिहास को पहिली बार अपना वास्तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्पष्ट सत्य था, जिसकी ओर लोगों का ध्यान नहीं गया था। यानी यह कि मनुष्य को सबसे पहिले खाना, पीना, कपड़ा पहनना और घर में रहना होता है। इसलिए उसे काम भी करना होता है। इसके हल हो जाने पर ही प्रधानता पाने के लिए मनुष्य एक-दूसरे से झगड़ सकते हैं और राजनीति, धर्म, दर्शन आदि को अपना समय दे सकते हैं। अंततः इस स्पष्ट सत्य को अपना ऐतिहासिक आधार प्राप्त हुआ।"

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"मार्क्स ने जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण बात का पता लगाया है, वह पूंजी और श्रम के सम्बन्ध की निश्चित व्याख्या है। दूसरे शब्दों में उसने यह दिखा दिया कि वर्तमान समाज में उत्पादन की जो पूंजीवादी पद्धति चालू है, उसके द्वारा किस तरह पूंजीपति, मजदूर का शोषण करता है। जब एक बार अर्थशास्त्र ने यह सिद्धांत बना लिया कि सभी तरह की संपत्ति और मूल्य का मूलस्रोत श्रम ही है तो, यह प्रश्न भी अनिवार्य रूप से सामने आता है कि इस सिद्धान्त से हम इस तथ्य का मेल कैसे करें कि मजदूर अपने श्रम से जिस मूल्य का निर्माण करता है वह सब उसे नहीं मिलता, वरन् उसका एक अंश उसे पूंजीपति को दे देना पड़ता है" (फ्रेडरिक एंगेल्स : कार्ल मार्क्स और उनके सिद्धांत पृ० ८-१०, डा० रामविलास शर्मा का अनुवाद)।

समाजवादी दृष्टिकोण से इतिहास की इन नयी धारणाओं का परिणाम महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इनसे पता लगा कि पहिले इतिहास की गति वर्ग-विरोध और वर्ग-संघर्षों के बीच रही है; शासक और शासित, शोषक और शोषित का अस्तित्व बराबर बना रहा है। मार्क्स से पूर्व की समूची ऐतिहासिक प्रगति विशेषाधिकार प्राप्त एक अल्पसंख्यक समुदाय पर निर्भर थी। मार्क्स के विवेचन के बाद समाज की वे उत्पादक शक्तियाँ, जो पूँजीवादी नियंत्रण की सीमाओं को लांघ चुकी हैं, अब उस संघटित सर्वहारा वर्ग की ताक में हैं जिससे उस पर अधिकार कर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि जन-साधारण का उत्पादन में ही भाग न हो, बल्कि, सामाजिक संपत्ति के वितरण और उसके संचालन में भी उसका हाथ रहे, जिससे कि उत्पादक शक्तियों और उत्पादन, दोनों में उत्तरोत्तर वृद्धि हो।

मार्क्स के बाद एंगेल्स, लेनिन और स्टालिन आदि अर्थशास्त्रियों एवं क्रांतिकारी राजनीतिज्ञों ने भी आज के वैज्ञानिक समाजवाद का मूल आधार यही माना है।

मानव-इतिहास में विकास के नियम की पहिली खोज मार्क्स ने की थी। उसने एक अभूतपूर्व सत्य का उद्घाटन किया कि किसी भी युग में जीविका के तात्कालिक भौतिक साधनों का उत्पादन ही समाज के आर्थिक विकास का मूल कारण रहा है। उसने बताया कि कला, धर्म, विज्ञान, राजनीति, साहित्य आदि के लिए समय देने से पूर्व यह आवश्यक है कि मनुष्य जाति के लिए रोटी, रोजी, वस्त्र और रहने के साधन सुलभ हों।

मार्क्स के विचारों में सच्चाई, आत्मबल, विश्वास और विश्लेषण की जो

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अनेक बातें एक साथ दिखायी देती हैं उनका सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि वे अपने युग के सबसे लांछित और प्रताडित व्यक्ति थे । उनकी वाणी में अनुभव और अध्ययन की छाप थी । मार्क्स और एंगेल्स के सह-यत्न से प्रस्तुत और कम्युनिस्ट लीग ( बुन्ददेर कम्युनिस्टेन ) के दूसरे अधिवेशन में ( लंदन, नव० १८४७ ) में पढ़ा गया कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा-पत्र संसार के साम्यवादी इतिहास में अपना नाम रखता है । इस घोषणा-पत्र ने संसार के आगे एक नयी रूपरेखा यह प्रस्तुत की कि गतिमूलक द्वन्द्ववाद विकास का सबसे व्यापक और आधारभूत सिद्धान्त है । मार्क्स ने जर्मनी का प्राचीन दर्शन, इंग्लैंड का पुरातन ( क्लैसिकल ) अर्थशास्त्र और फ्रांस का समाजवाद, इन १९वीं शताब्दी की तीन सैद्धांतिक विचारधारा को एक सूत्र में गूंथ कर मार्क्सवाद को जन्म दिया; जिसको आज वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है ।

मार्क्स का भौतिक दर्शन : मार्क्स ने दार्शनिक भौतिकवाद को स्वीकार किया है । मार्क्स के अनुसार संसार की एकता उसके अस्तित्व में न होकर उसकी भौतिकता में है । भूत या प्रकृति के अस्तित्व की पद्धति का नाम ही गति है । गति के बिना भूत का कोई अस्तित्व नहीं है । विचार और चेतना मानव-मस्तिष्क की उपज है; और मानव-प्रकृति की उपज है, जिसका विकास उसके साथ-साथ हुआ । इस दृष्टि से यह सिद्ध होता है कि मार्क्स का शेष प्रकृति से कोई विरोध नहीं है; बल्कि मानव-मस्तिष्क, प्रकृति की उपज होने के कारण शेष प्रकृति के साथ उसका साम्य ही स्वीकार करते हैं ।

हेगेल के द्वन्द्ववाद का समर्थन : मार्क्स और एंगेल्स, दोनों ने हेगेल के द्वंद्ववाद को जर्मनी के पुरातन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण देन बताई है; क्योंकि उसमें विकास के व्यापक सिद्धांत और प्रसार के लिये गंभीर तत्त्व वर्तमान है । मार्क्स के मतानुसार द्वंद्ववाद की कसौटी प्रकृति है और यह मानना होगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञान ने इस कसौटी के लिए बहुत-सी सामग्री और दिन-पर-दिन बढ़ने वाली सामग्री दी है ( लेनिन का लेख : कार्ल मार्क्स और उनकी देन; कार्ल मार्क्स और उनके सिद्धांत, पृ० २० ) ।

हेगेल के दर्शन में एक क्रांतिकारी पहलू था । उसके द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के लिये ऐसे दर्शन की कतई आवश्यकता-अपेक्षा नहीं समझी गयी है जो विज्ञान से शून्य या परे हो । वस्तुतः द्वंद्वात्मक दर्शन के लिए कुछ भी अंतिम, त्रिकाल सत्य और पवित्र नहीं है । उसकी दृष्टि से हरेक वस्तु में क्षण-भंगुरता है ।

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आवागमन के अबाधक्रम को छोड़कर निरंतर नीचे से ऊपर की ओर अविराम गति से अग्रसर होना ही चिरंतन है। चितंनशील मस्तिष्क में द्वंद्वात्मक दर्शन इसी को उत्क्रांत करता है ( वही, पृ० २१; तथा ऐंगेल्स : डूरिंग का मत-खंडन, पृ० ३१ )।

वर्ग-संघर्ष : इतिहास से हमें विदित होता है कि जातियों और समाजों के संघर्ष से ही क्रांति का बीजारोपण हुआ है। आज का समाज दो प्रमुख हिस्सों में बँटा है : पूंजीवादी और श्रमजीवी। पूंजीवादी वर्ग के विरुद्ध जितने भी वर्ग खड़े हैं उनमें मजदूर वर्ग ही एक ऐसा है, जिसने वास्तविक क्रांति को जन्म दिया है। निम्न मध्य-वर्ग में छोटे कारखानेदार, दूकानदार, दस्तकार आदि जितने भी हैं उन्होंने भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये पूंजी-पति-वर्ग से ही संघर्ष किया है; किन्तु उनके संघर्ष में क्रांति के तत्त्व न होकर रूढिवादिता अधिक है। बल्कि मार्क्स ने उनको प्रतिक्रियावादी कहा है, क्योंकि वे इतिहास के पहियों को पीछे की ओर घुमाने की कोशिश करते हैं ( देखिए कम्युनिस्ट घोषणा पत्र )। संयोगवश उनके संघर्ष में यदि क्रांति का आभास भी मिलता है तब भी वे अपने वर्तमान हितों की अपेक्षा अपने भविष्य के स्वार्थों की ही रक्षा करते हैं।

आधुनिक समाजवाद की यही रूपरेखा है और मार्क्स तथा ऐंगेल्स प्रभृति अर्थशास्त्रियों ने मानवता के सुख-चैन और कल्याण के लिए इसी को एक मात्र साधन स्वीकार किया है।

आचार्य कौटिल्य और उनका अर्थशास्त्र

आचार्य कौटिल्य का महाव्यक्तित्व एक पारंगत राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य साम्राज्य के विपुल यश के साथ एकप्राण होकर, एक ओर तो भारत के राजनीतिक इतिहास में अपनी कीर्ति-कथा को अमर बनाये है और दूसरी ओर अपनी अतुलनीय, अद्भुत कृति के कारण संस्कृत साहित्य के इतिहास में अपने विषय का एकमात्र विद्वान् होने का गौरव उन्हें प्राप्त है। इन असाधारण खूबियों के कारण ही आचार्य कौटिल्य के नाम-माहात्म्य की कथाएँ पुराणों से लेकर काव्य, नाटक और कोष-ग्रन्थों में सर्वत्र परिव्याप्त हैं। कौटिल्य द्वारा नंद-वंश का विनाश और मौर्य-वंश की प्रतिष्ठा से सम्बन्धित विष्णुपुराण में एक कथा आती है :

'महाभदन्त तथा उसके नौ पुत्र १०० वर्ष तक राज्य करेंगे। अन्त में कौटिल्य नामक एक ब्राह्मण उस राज्य-परम्परा के अंतिम उत्तराधिकारी नंदवंश

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का विनाश करेगा। नंद-वंश के समूल विनष्ट हो जाने के उपरान्त उसकी जगह मौर्य-वंश के पहले प्रतापी शासक चन्द्रगुप्त का कौटिल्य राज्याभिषेक करेंगे। उसका पुत्र बिन्दुसार और बिन्दुसार का पुत्र अशोक होगा। ( महाभदन्तः तत्पुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति। नवैव। तान्न-न्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणः समुद्धरिष्यति। तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोक्ष्यन्ति। कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तं राज्येऽभिषेक्ष्यति। तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति। तस्याप्यशोकवर्धनः )।

इस पुराण-प्रोक्त विवरण से दो मोटी बातों का पता लगता है कि मगध के राज्य-सिंहासन पर पहले नन्द-वंश का अधिकार था और उसके बाद कौटिल्य के कौशल से मगध की राज-सत्ता छिन कर मौर्य-वंश के हाथों में आयी। इस दृष्टि से मौर्य-वंश की सत्यता पर आधारित आचार्य कौटिल्य के सही व्यक्तित्व का पता लगाने के लिये नंद-वंश की प्रामाणिक जानकारी उससे भी पूर्व मगध की शासन-परम्परा से परिचय प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है।

मगध की शासन परम्परा

मगध या मागध भारतीय इतिहास का एक सुपरिचित अति प्राचीन नाम है। वेदों से लेकर पुराणों तक सर्वत्र मागध भूमि और मगध-वंश की चर्चाएँ उल्लिखित हैं। पुराणों से यह भी विदित होता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व मगध में बार्हद्रथों का राज्य स्थापित हो चुका था और चेदि नरेश उपरिचर के पुत्र बृहद्रथ सर्वप्रथम मगधनरेश की उपाधि से विभूषित भी हो चुके थे। इनके पुत्र जरासन्ध और पौत्र सहदेव महाभारत युद्ध के समकालीन व्यक्ति थे। इनकी २३ वीं पीढ़ी के बाद मगध के राजसिंहासन पर अवन्तिनरेश चन्द्र-उद्योत का अधिकार हुआ। तदनन्तर गिरिव्रज का शिशुनागवंश मगध पर अधिष्ठित हुआ, जिसके उत्तराधिकारियों की ऐतिहासिक परम्परा है : शिशुनाग, काकवर्ण, क्षेमधर्मन्, क्षत्राजीत और विम्बसार। इनमें बिम्बसार ही सर्वाधिक प्रतापी नरेश था, जो कि तीर्थंकर महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध का समकालीन हुआ।

बिम्बसार से मगध राज-वंश की परंपरा क्रमशः अजातशत्रु, दर्शक, उदयाश्व ( उदायी ), नंदिवर्धन् तक पहुँच कर अंत में महानंदि के हाथों में आयी। महानंदि इस वंश का अन्तिम एवं महाबलशाली सम्राट् हुआ, जिससे एक शूद्रा स्त्री द्वारा नंद नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी शूद्रा-पुत्र नंद ने मगध की राजगद्दी पर नंद-वंश की प्रतिष्ठा की।

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ऐतिहासिक खोजों से विदित है कि ५८५-३१५ वि० पूर्व ( ६३२-३७२ ई० पू० ) तक मगध की शासन-सत्ता शिशुनाग-वंश के अधीन रही और तदनन्तर नन्द-वंश उत्तराधिकारी हुआ, जिसका प्रथम यशस्वी सम्राट् महापद्म-नन्द था । ८८ वर्ष राज्योपरान्त वह दिवंगत हुआ । तदनन्तर लगभग २२ वर्ष तक उसके उत्तराधिकारियों का अस्तित्व बने रहने के बाद मगध की राज्य-लक्ष्मी मौर्यों के अधीनस्थ हुई । चन्द्रगुप्त मौर्य-वंश का पहला सम्राट् हुआ, जिसको पंचनद की ओर से नंद-वंश के विरोध में उभाड़ कर स्वाभिमानी ब्राह्मण-पुत्र चाणक्य मगध की ओर लाया ।

भारतीय इतिहास का उदीयमान नक्षत्र और मौर्य-वंश के महाप्रतापी सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य ने विष्णुगुप्त नामक एक अद्भुत कुटिल मति राजनीतिज्ञ ब्राह्मण की सहायता से मगध के नन्द-वंश को विनष्ट कर तथा शक्तिशाली यवनराज सिकन्दर के सम्पूर्ण प्रयत्नों को विफल कर लगभग ३२१ ई० पूर्व में एक विराट् साम्राज्य की स्थापना की थी, जिसको इतिहासकारों ने मौर्य-साम्राज्य के नाम से पुकारा । चन्द्रगुप्त सामान्य क्षत्रिय-वंश से प्रसूत था । लगभग २४ वर्ष तक मगध की राजगद्दी पर उसका एकच्छत्र शासन रहा ।

ग्रीक सेनापति सेल्युकस के राजदूत मेगस्थनीज की अनुपलब्ध कृति इण्डिका के अन्यत्र उद्धृत अंशों से और चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र से विदित होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य एक असाधारण दिग्विजयी सम्राट् हुआ है और उसने अपने राज्यकाल में धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक उन्नति के लिए अविरल प्रयत्न किये ।

कौटिल्य के नाम का निराकरण

मगध की शासन-परम्परा में नन्द-वंश और तदनन्तर मौर्य-साम्राज्य की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक अध्ययन करने के पश्चात् आचार्य कौटिल्य के नाम-निराकरण की बात सामने आती है । आचार्य कौटिल्य की ख्याति दूसरे ही नामों से है । उनका एक लोक-विश्रुत नाम चाणक्य भी है । चाणक्य उन्हें चणक का पुत्र होने के कारण और कौटिल्य उन्हें कुटिल राजनीतिज्ञ होने के कारण कहा जाता है । वे दोनों नाम उनके पितृ-प्रदत्त न होकर वंश-नाम या उपाधि नाम हैं ।

कौटिल्य का वास्तविक पितृ-प्रदत्त नाम विष्णुगुप्त था । कौटिल्य के इस विष्णुगुप्त नाम का हवाला आचार्य कामंदक के नीतिसार में उपलब्ध होता है, जिसकी रचना ४०० ई० के लगभग हुई । आचार्य कामन्दक कृत नीतिसार

५ कौ० भू०

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के आरंभिक अंश में हमें चार बातों की जानकारी होती है। पहली बात तो यह कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, दूसरी बात यह कि कामन्दक के नीति-ग्रंथ का आधारभूत वही अर्थशास्त्र था, तीसरी बात यह कि कौटिल्य ने नन्द-वंश का उन्मूलन कर उसकी जगह मौर्य-वंश को प्रतिष्ठित किया और चौथी बात यह कि कौटिल्य का असली नाम विष्णुगुप्त था। नीतिसार का सारांश इस प्रकार है :

नीतिसार उसी विद्वान् के ग्रन्थ का आधार है, जिसके वज्र ने पर्वत की तरह अविचल, अडिग नन्द-वंश को उखाड़ फेंका था, जिसने चन्द्रगुप्त को पृथ्वी का स्वामित्व दिया और जिसने अर्थशास्त्र रूपी महार्णव से नीतिशास्त्र रूपी नवनीत का दोहन किया, ऐसे उस महामति विष्णुगुप्त नामक विद्वान् को नमस्कार है।

नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्र महोदधे ।
समुद्दध्रे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे ॥
नीतिसार

विष्णुगुप्तस्तु कौटिल्यश्चाणक्यो द्रामिलो गुलः ।
वात्स्यायनो मल्लनागः पाक्षिलस्वामिनावपि ॥
वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पाक्षिलः स्वामी विष्णुगुप्तो गुलश्च स ।
हेमचन्द्र

वात्स्यायनस्तु कौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ।
द्रामिल पाक्षिल स्वामी मल्लनागो वलोऽपि च ॥
यादवप्रकाश-वैजयन्ती

कात्यायनो वररुचिर्मेयजिच्य पुनर्वसुः ।
कात्यायनस्तुकौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ॥
द्रामिलपाक्षिल स्वामी मल्लनागो गुलोऽपि च ।
भोजराज नाममल्लिका

नीतिसार के अतिरिक्त संस्कृत के कतिपय कोष-ग्रन्थों से भी आचार्य विष्णुगुप्त के पर्यायवाची नामों का पता लगता है, जिनमें कौटिल्य और चाणक्य के अतिरिक्त अनेक अप्रचलित नाम देखने को मिलते हैं। ये नाम प्राचीन और मध्यकालीन सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। विभिन्न कोष-ग्रन्थों की इस नामावली की उपलब्धि से आचार्य कौटिल्य के वास्तविक नाम और उनके लिए प्रयुक्त होने वाले दूसरे नामों का स्वतः ही निराकरण हो जाता है।