भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

( ४८ )

डालने से पूर्व यहां भारत की कुछ प्राचीन आदिम मूल जातियों का उल्लेख करना आवश्यक समझा जा रहा है ।

ऋग्वेद ( ५।७८।१२९।३, ६।४६।७ ) में जिन पांच भूमियों (पंच-क्षिति) का उल्लेख किया गया है, वे पांच भूमियां वस्तुतः उन पांच नदियों के आस-पास की भूमियां थीं, जिनके कारण पंचनद का नाम इतिहास में देखने को मिलता है । इन पांच भूमियों में बसने वाले एक ही स्तर के लोग धीरे-धीरे पांच विभिन्न जातियों में ( पंचजन, ऋक् ६।११।४, ६।५१।११, ७।३२।३२, ९।६५।३२ ) में बंट गयीं, जिनकी आजीविका खेती थी और इसीलिये जिन्हें पांच कृषि-जीवियों ( पंच कृषिवी : ऋक्० २।२।१०, ४।३८।१०।२ ) के नाम से स्मरण किया गया । ये पांच जातियां आरंभ में बड़ी उद्योगी थीं और नदियों के उर्वर तटों पर कृषि एवं चरागाह के द्वारा जीविकोपार्जन किया करती थीं, इन्हीं के द्वारा हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक की व्यापक सभ्यता का निर्माण हुआ ( मैक्समूलर : इंडिया : ह्वाट कैन इट टीच अस, पृ० ९५-९६-१८९९ ) । पांच आर्य परिवारों के परिचायक पुरुष, तुर्वस्, वेदस्, अनुस् और द्रुह्यस्, इन्हीं पांच जातियों के प्रतीक थे ।

ये पांच जातियां अपने व्यावसायिक विभेदों के कारण पांच वर्णों में विभक्त हो गये थे, जिनके नाम थे : भंन्त्री, योद्धा, व्यापारी, दास और काले चमड़े वाले । लम्बी अवधि तक इन जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह और सहभोज की स्थिति बनी रही । किन्तु काले चमड़े वाले आर्यों ने जब यहां के मूल निवासी दस्युओं ( दासों ) के साथ सेवक भावना का आचरण करना आरंभ किया और वंश, जन्म, जाति आदि की प्रमुखता स्वीकार की जाने लगी तो सहभोज तथा अंतर्जातीय विवाहों की परंपरा तो जाती ही रही, वरन् उनके बीच गहरी खाई भी पड़ने लग गयी थी ।

ऐसा प्रतीत होता है कि जातियों के जन्मना निर्णय करने का सिद्धांत पुराणकाल तक स्वीकृत नहीं हुआ था ( विष्णुपुराण, खंड ३ अध्याय ८ ) । जातक कथाओं ( उद्दालक ४।२९३, चाण्डाल ४।३८८, सतक्लम्म २।८२, चित्तसंभूत ४।३९० ) तथा अन्य बौद्ध ग्रंथों ( जे० आर० ए० एस० पृ० ३४६, १८६४ ) से यह बात स्पष्ट होती है कि जातियों की उच्चता तथा निम्नता का निर्णय बौद्धिक क्षमता के आधार पर था । उदाहरण के लिये विश्वामित्र ने क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी अपने उन्नत कर्मों और ऊंची प्रतिभा के कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था । लेकिन चारों वर्णों की भिन्नता का