भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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अनेक बातें एक साथ दिखायी देती हैं उनका सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि वे अपने युग के सबसे लांछित और प्रताडित व्यक्ति थे । उनकी वाणी में अनुभव और अध्ययन की छाप थी । मार्क्स और एंगेल्स के सह-यत्न से प्रस्तुत और कम्युनिस्ट लीग ( बुन्ददेर कम्युनिस्टेन ) के दूसरे अधिवेशन में ( लंदन, नव० १८४७ ) में पढ़ा गया कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा-पत्र संसार के साम्यवादी इतिहास में अपना नाम रखता है । इस घोषणा-पत्र ने संसार के आगे एक नयी रूपरेखा यह प्रस्तुत की कि गतिमूलक द्वन्द्ववाद विकास का सबसे व्यापक और आधारभूत सिद्धान्त है । मार्क्स ने जर्मनी का प्राचीन दर्शन, इंग्लैंड का पुरातन ( क्लैसिकल ) अर्थशास्त्र और फ्रांस का समाजवाद, इन १९वीं शताब्दी की तीन सैद्धांतिक विचारधारा को एक सूत्र में गूंथ कर मार्क्सवाद को जन्म दिया; जिसको आज वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है ।

मार्क्स का भौतिक दर्शन : मार्क्स ने दार्शनिक भौतिकवाद को स्वीकार किया है । मार्क्स के अनुसार संसार की एकता उसके अस्तित्व में न होकर उसकी भौतिकता में है । भूत या प्रकृति के अस्तित्व की पद्धति का नाम ही गति है । गति के बिना भूत का कोई अस्तित्व नहीं है । विचार और चेतना मानव-मस्तिष्क की उपज है; और मानव-प्रकृति की उपज है, जिसका विकास उसके साथ-साथ हुआ । इस दृष्टि से यह सिद्ध होता है कि मार्क्स का शेष प्रकृति से कोई विरोध नहीं है; बल्कि मानव-मस्तिष्क, प्रकृति की उपज होने के कारण शेष प्रकृति के साथ उसका साम्य ही स्वीकार करते हैं ।

हेगेल के द्वन्द्ववाद का समर्थन : मार्क्स और एंगेल्स, दोनों ने हेगेल के द्वंद्ववाद को जर्मनी के पुरातन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण देन बताई है; क्योंकि उसमें विकास के व्यापक सिद्धांत और प्रसार के लिये गंभीर तत्त्व वर्तमान है । मार्क्स के मतानुसार द्वंद्ववाद की कसौटी प्रकृति है और यह मानना होगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञान ने इस कसौटी के लिए बहुत-सी सामग्री और दिन-पर-दिन बढ़ने वाली सामग्री दी है ( लेनिन का लेख : कार्ल मार्क्स और उनकी देन; कार्ल मार्क्स और उनके सिद्धांत, पृ० २० ) ।

हेगेल के दर्शन में एक क्रांतिकारी पहलू था । उसके द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के लिये ऐसे दर्शन की कतई आवश्यकता-अपेक्षा नहीं समझी गयी है जो विज्ञान से शून्य या परे हो । वस्तुतः द्वंद्वात्मक दर्शन के लिए कुछ भी अंतिम, त्रिकाल सत्य और पवित्र नहीं है । उसकी दृष्टि से हरेक वस्तु में क्षण-भंगुरता है ।