भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 918 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

( ६४ )

का विनाश करेगा। नंद-वंश के समूल विनष्ट हो जाने के उपरान्त उसकी जगह मौर्य-वंश के पहले प्रतापी शासक चन्द्रगुप्त का कौटिल्य राज्याभिषेक करेंगे। उसका पुत्र बिन्दुसार और बिन्दुसार का पुत्र अशोक होगा। ( महाभदन्तः तत्पुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति। नवैव। तान्न-न्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणः समुद्धरिष्यति। तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोक्ष्यन्ति। कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तं राज्येऽभिषेक्ष्यति। तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति। तस्याप्यशोकवर्धनः )।

इस पुराण-प्रोक्त विवरण से दो मोटी बातों का पता लगता है कि मगध के राज्य-सिंहासन पर पहले नन्द-वंश का अधिकार था और उसके बाद कौटिल्य के कौशल से मगध की राज-सत्ता छिन कर मौर्य-वंश के हाथों में आयी। इस दृष्टि से मौर्य-वंश की सत्यता पर आधारित आचार्य कौटिल्य के सही व्यक्तित्व का पता लगाने के लिये नंद-वंश की प्रामाणिक जानकारी उससे भी पूर्व मगध की शासन-परम्परा से परिचय प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है।

मगध की शासन परम्परा

मगध या मागध भारतीय इतिहास का एक सुपरिचित अति प्राचीन नाम है। वेदों से लेकर पुराणों तक सर्वत्र मागध भूमि और मगध-वंश की चर्चाएँ उल्लिखित हैं। पुराणों से यह भी विदित होता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व मगध में बार्हद्रथों का राज्य स्थापित हो चुका था और चेदि नरेश उपरिचर के पुत्र बृहद्रथ सर्वप्रथम मगधनरेश की उपाधि से विभूषित भी हो चुके थे। इनके पुत्र जरासन्ध और पौत्र सहदेव महाभारत युद्ध के समकालीन व्यक्ति थे। इनकी २३ वीं पीढ़ी के बाद मगध के राजसिंहासन पर अवन्तिनरेश चन्द्र-उद्योत का अधिकार हुआ। तदनन्तर गिरिव्रज का शिशुनागवंश मगध पर अधिष्ठित हुआ, जिसके उत्तराधिकारियों की ऐतिहासिक परम्परा है : शिशुनाग, काकवर्ण, क्षेमधर्मन्, क्षत्राजीत और विम्बसार। इनमें बिम्बसार ही सर्वाधिक प्रतापी नरेश था, जो कि तीर्थंकर महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध का समकालीन हुआ।

बिम्बसार से मगध राज-वंश की परंपरा क्रमशः अजातशत्रु, दर्शक, उदयाश्व ( उदायी ), नंदिवर्धन् तक पहुँच कर अंत में महानंदि के हाथों में आयी। महानंदि इस वंश का अन्तिम एवं महाबलशाली सम्राट् हुआ, जिससे एक शूद्रा स्त्री द्वारा नंद नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी शूद्रा-पुत्र नंद ने मगध की राजगद्दी पर नंद-वंश की प्रतिष्ठा की।