कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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ऐतिहासिक खोजों से विदित है कि ५८५-३१५ वि० पूर्व ( ६३२-३७२ ई० पू० ) तक मगध की शासन-सत्ता शिशुनाग-वंश के अधीन रही और तदनन्तर नन्द-वंश उत्तराधिकारी हुआ, जिसका प्रथम यशस्वी सम्राट् महापद्म-नन्द था । ८८ वर्ष राज्योपरान्त वह दिवंगत हुआ । तदनन्तर लगभग २२ वर्ष तक उसके उत्तराधिकारियों का अस्तित्व बने रहने के बाद मगध की राज्य-लक्ष्मी मौर्यों के अधीनस्थ हुई । चन्द्रगुप्त मौर्य-वंश का पहला सम्राट् हुआ, जिसको पंचनद की ओर से नंद-वंश के विरोध में उभाड़ कर स्वाभिमानी ब्राह्मण-पुत्र चाणक्य मगध की ओर लाया ।
भारतीय इतिहास का उदीयमान नक्षत्र और मौर्य-वंश के महाप्रतापी सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य ने विष्णुगुप्त नामक एक अद्भुत कुटिल मति राजनीतिज्ञ ब्राह्मण की सहायता से मगध के नन्द-वंश को विनष्ट कर तथा शक्तिशाली यवनराज सिकन्दर के सम्पूर्ण प्रयत्नों को विफल कर लगभग ३२१ ई० पूर्व में एक विराट् साम्राज्य की स्थापना की थी, जिसको इतिहासकारों ने मौर्य-साम्राज्य के नाम से पुकारा । चन्द्रगुप्त सामान्य क्षत्रिय-वंश से प्रसूत था । लगभग २४ वर्ष तक मगध की राजगद्दी पर उसका एकच्छत्र शासन रहा ।
ग्रीक सेनापति सेल्युकस के राजदूत मेगस्थनीज की अनुपलब्ध कृति इण्डिका के अन्यत्र उद्धृत अंशों से और चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र से विदित होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य एक असाधारण दिग्विजयी सम्राट् हुआ है और उसने अपने राज्यकाल में धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक उन्नति के लिए अविरल प्रयत्न किये ।
कौटिल्य के नाम का निराकरण
मगध की शासन-परम्परा में नन्द-वंश और तदनन्तर मौर्य-साम्राज्य की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक अध्ययन करने के पश्चात् आचार्य कौटिल्य के नाम-निराकरण की बात सामने आती है । आचार्य कौटिल्य की ख्याति दूसरे ही नामों से है । उनका एक लोक-विश्रुत नाम चाणक्य भी है । चाणक्य उन्हें चणक का पुत्र होने के कारण और कौटिल्य उन्हें कुटिल राजनीतिज्ञ होने के कारण कहा जाता है । वे दोनों नाम उनके पितृ-प्रदत्त न होकर वंश-नाम या उपाधि नाम हैं ।
कौटिल्य का वास्तविक पितृ-प्रदत्त नाम विष्णुगुप्त था । कौटिल्य के इस विष्णुगुप्त नाम का हवाला आचार्य कामंदक के नीतिसार में उपलब्ध होता है, जिसकी रचना ४०० ई० के लगभग हुई । आचार्य कामन्दक कृत नीतिसार
५ कौ० भू०