कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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कण्टकशोधन के लिए कौटिल्य ने जो व्यवस्था दी है उससे ऐसा अवगत होता है कि समाज में छोटे-से-छोटे छिद्रों और नितांत परोक्ष रूप में घटित होने वाले शोषणों का उसने बड़ी बारीकी से अध्ययन किया था। इन कण्टकों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ बतायी गयी हैं। पहिली श्रेणी में तो कर्मकार ( व्यवसायी ), जैसे धोबी, जुलाहे, सुनार, वैद्य, दूसरी श्रेणी में प्रजा को पीड़ित करने वाले दुष्ट जन और तीसरी श्रेणी में राजकर्मचारियों की लूट-खसोट, गबन तथा कूटकर्म आदि के लिए व्यवस्था दी गयी है।
न्याय की अवस्थिति दण्ड पर निर्भर है। इस हेतु वृहद् धर्मस्थ अधिकरण में कौटिल्य ने दण्ड-व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला है। कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था को पढ़ कर उसकी तत्त्वग्राही बुद्धि का परिचय तो मिलता है, किन्तु इस उद्देश्य के प्रतिपादन में उसने इतना अधिक समय लगा दिया कि उसके द्वारा कल्पित उस निष्कण्टक साम्राज्य की सत्यता पर पाठक को संदेह होने लगता है और दण्ड-ही-दण्ड की एकांत व्यवस्था से वह भयभीत भी हो उठता है।
कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था के प्रमुख तीन अंग हैं : अर्थदण्ड, शरीरदण्ड और कारागारदण्ड। इनमें भी विकल्प दिये गये हैं। दण्ड का पहिला सिद्धांत अपराध पर आधारित है। जैसा अपराध वैसा दण्ड। फिर अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार, अपराधी के ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण के अनुसार, अपराधी की विशेष परिस्थिति के अनुसार, अनेक ढंगों पर दण्ड को निर्धारित किया गया है।
अपराधियों के सुधार और बंदीगृहों की सुव्यवस्था पर भी कौटिल्य ने विचार किया है। बंदी बनाये गये स्त्री-पुरुषों के लिए ऐसे अनेक कार्य सुझाये गये हैं, जिनको सीख लेने के बाद कारामुक्त होने पर वे लाभदायी सिद्ध हो सकें, और अपराध की जो सबसे बड़ी समस्या रोजी-रोटी की रही है, उसकी पूर्ति हो सके।
कौटिल्य का विचार है कि प्रत्येक मनुष्य अरिषड्वर्ग से पराभूत है, इसलिए उसका सर्वदा निर्लिप्त, निर्दोष बना रहना संभव नहीं है। काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष ये छहों शत्रु न जाने कब मनुष्य को उद्वेलित करके उसको अधर्म तथा दुराचरण की ओर ले जाते हैं। यदि ऐसी स्थिति आ गयी तो निश्चय ही समाज में मत्स्यन्याय फैल जायेगा, अर्थात् बलवान् निर्बल को निगल जायेगा। ( अर्थशास्त्र, पृ० १६ )
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर दण्ड की व्यवस्था की गयी है।