कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 339, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ५६-५७ |
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| अध्याय १ |
व्यवहारस्थापना विवाहपदनिबन्धाश्चः
(१) धर्मस्थास्त्रयस्त्रयोऽमात्या जनपदसन्धिसंग्रहणद्रोणमुखस्थानीयेषु व्यावहारिकानर्थान् कुर्युः । (२) तिरोहितान्तरगारनक्तारण्योपध्युपह्वरकृतांश्च व्यवहारान् प्रतिषेधयेयुः । कर्तुः कारयितुश्च पूर्वः साहसदण्डः । श्रोतॄणामेकैकं प्रत्यर्धदण्डाः । श्रद्धेयानां तु द्रव्यव्यपनयः । (३) परोक्षेणाधिकरणग्रहणमवक्तव्यकरा वा तिरोहिताः सिद्धयेयुः । (४) दायनिक्षेपोपनिधिविवाहसंयुक्ताः स्त्रीणामनिष्कासिनीनां व्याधितानां चामूढसंज्ञानामन्तरगारकृताः सिद्धयेयुः । (५) साहसानुप्रवेशकलहविवाहराजनियोगयुक्ताः पूर्वरात्रव्यवहारिणां च रात्रिकृताः सिद्धयेयुः ।
शर्तनामों का लेखन प्रकार और तत्संबंधी विवादों का निर्णय
( १ ) दो राज्यों या गाँवों की सीमा ( जनपद-संधि ) पर, दस गाँवों के केन्द्र ( संग्रहण ) में, चार सौ गाँवों के केन्द्र ( द्रोणमुख ) में और आठ सौ गाँवों के केन्द्र ( स्थानीय ) में तीन-तीन न्यायाधीश ( धर्मस्थ ) एक साथ रह कर इकरारनामा, शर्तनामा आदि व्यवहार-संबंधी कार्यों का प्रबंध करें ।
( २ ) नियम-विरुद्ध शर्तनामे : उन शर्तनामों को न्याय-विरुद्ध घोषित किया जाय, जो छिप कर, घर के अंदर, रात में, जंगल में, छल-कपट से और एकांत में किए गए हैं । ऐसा नियम विरुद्ध कार्य करने वालों और कराने वालों, दोनों को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । इस प्रकार के व्यवहारों में सुनकर गवाही देने वालों को आधा साहस दण्ड, और श्रद्धा-सहानुभूति रखने वालों को अर्थदण्ड दिया जाय ।
( ३ ) जिस व्यवहार को गुप्त रूप से किसी दूसरे ने सुन लिया हो तथा जिसको नियम विरुद्ध-साबित न किया जा सके, ऐसा व्यवहार यदि छिपा कर भी किया गया हो तो उसे गैर कानूनी करार न दिया जाय ।
( ४ ) पर्दानशीन महिलाओं तथा चैतन्य रोगियों के द्वारा दायभाग, अमानत, धरोहर और विवाहसंबंधी घर के अंदर किए हुए व्यवहार भी नियमविरुद्ध न समझे जांय ।
( ५ ) डाका ( साहस ), चोरी ( अनुप्रवेश ), झगड़ा, विवाह तथा सरकारी