कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
( १ ) सार्थव्रजाश्रमव्याधचारणमध्येष्वरण्यचरणामारण्यकृताः सिद्धयेयुः । ( २ ) गूढाजीविषु चोपधिकृताः सिद्धयेयुः । ( ३ ) मिथःसमवाये चोपह्वरकृताः सिद्धयेयुः । ( ४ ) अतोऽन्यथा न सिद्धयेयुः । अपाश्रयवद्भिर्वा कृताः, पितृमता पुत्रेण, पित्रा पुत्रवता, निष्कुलेन भ्रात्रा, कनिष्ठेनाविभक्तांशेन, पतिमत्या पुत्रवत्या च स्त्रिया, दासाहितकाभ्याम्, अप्राप्तातीतव्यवहाराभ्याम्, अभिशस्तप्रव्रजितव्यङ्गव्यसनिभिश्चान्यत्र निसृष्टव्यवहारेभ्यः । ( ५ ) तत्रापि क्रुद्धेनार्तेन मत्तेनोन्मत्तेनावगृहीतेन वा कृता व्यवहारा न सिद्धयेयुः कर्तृकारयितृश्रोतॄणां पृथग् यथोक्ता दण्डाः । ( ६ ) स्वे स्वे तु वर्गे देशे काले च स्वकरणकृताः सम्पूर्णचाराः शुद्धदेशा दृष्टरूपलक्षणप्रमाणगुणाः सर्वव्यवहाराः सिद्धयेयुः ।
हुक्म और रात के प्रथम पहर में वेश्यासंबंधी व्यवहार यदि रात के समय में भी किए जांय तो उन्हें गैरकानूनी नहीं माना जाय ।
( १ ) व्यापारी, ग्वाले, आश्रमवासी, शिकारी और गुप्तचर आदि जंगलों में रहने वालों तथा घूमने वालों के द्वारा जंगल में किए गए व्यवहार भी वैध समझे जांय ।
( २ ) गुप्तरूप से जीविका चलाने वालों द्वारा किए गए छल-कपट संबंधी व्यवहार भी नियमानुकूल समझे जांय ।
( ३ ) आपसी समझौते से एकांत में किए गए व्यवहार भी नियमसंगत हैं ।
( ४ ) इस प्रकार की विशेष परिस्थितियों के अतिरिक्त स्वीकार किए गए सभी व्यवहार गैरकानूनी समझे जांय । निराश्रित व्यक्ति, जिसका पिता जीवित हो, जिसका पुत्र जीवित हो, बिरादरी से बहिष्कृत भाई, जिसकी संपत्ति का बँटवारा न हुआ हो, जिस स्त्री का पति या पुत्र जीवित हो, दास, नाबालिग, बहुत बूढ़ा, समाज में निंदित, संन्यासी, लूले-लंगड़े और बीमार आदि व्यक्तियों द्वारा किए गए व्यवहार भी जायज न समझे जांय; किन्तु उन व्यवहारों को वैध समझा जाय जो कि उन्हें राजा की ओर से प्राप्त हो चुके हों ।
( ५ ) क्रोधी, दुःखी, मत्त, उन्मत्त, पागल आदि व्यक्तियों के द्वारा किये गये व्यवहार भी वैधानिक न समझे जांय । जो भी व्यक्ति इस प्रकार के व्यवहार करें या करायें तथा सुनें उन्हें पूर्वोक्त दण्ड देने चाहिएँ ।
( ६ ) परीक्षा : अपनी-अपनी जाति में उचित देश-काल और प्रकृति के अनुसार किए गए दोषरहित सभी व्यवहार वैध समझे जांय; बशर्ते कि उनकी सूचना