कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० ५६-५७ : अ० १ ] विवादों का निर्णय २५७
(१) पश्चिमं चैषां करणमादेशाधिवर्जं श्रद्धेयम् । इति व्यवहार-स्थापना ।
(२) संवत्सरमृतुं मासं पक्षं दिवसं करणमधिकरणमृणं वेदकावेदकयोः कृतसमर्थावस्थयोर्देशग्रामजातिगोत्रनामकर्माणि चाभिलिख्य वादिप्रतिवादि-प्रश्नानर्थानुपूर्व्या निवेशयेत् । निविष्टांश्चावेक्षेत ।
(३) निबद्धं पादमुत्सृज्यान्यं पादं सङ्क्रामति । पूर्वोक्तं पश्चिमेनार्थेन नाभिसन्धत्ते । परवाक्यमनभिग्राह्यमभिग्राह्यावतिष्ठते । प्रतिज्ञाय देशं 'निर्दिश' इत्युक्ते न निर्दिशति । निर्दिष्टाद् देशादन्यं देशमुपस्थापयति । उपस्थिते देशेऽर्थवचनं 'नैवम्' इत्यपव्ययते । साक्षिभिरवधृतं नेच्छति । असम्भाष्ये देशे साक्षिभिर्मिथः सम्भाषत । इति परोक्तहेतवः ।
(४) परोक्तदण्डः पञ्चबन्धः । स्वयंवादिदण्डो दशबन्धः । पुरुषभृति-रष्टांशः । पथिभक्तमर्घविशेषतः । तदुभयं नियम्यो दद्यात् ।
दी गई हो और उनके रूप, लक्षण, प्रमाण तथा गुण की अच्छी तरह परीक्षा की गई हो ।
( १ ) बलात्कार जैसे व्यवहारों को छोड़ कर उनके सभी व्यवहार न्याय-सम्मत माने जाँय । यहाँ तक व्यवहार की स्थापना बताई गई ।
( २ ) अपने-अपने पक्ष की सहादत के लिए उपस्थित हुए मुद्दाला ( वेदक ) और मुद्दई ( आवेदक ) के देश, गाँव, जाति, गोत्र, नाम और व्यवसाय आदि को पहिले लिखा जाय; फिर कर्जा लेने या चुकाने का वर्ष, ऋतु, पक्ष, महीना, दिन, स्थान और गवाही आदि को लिखा जाय; अन्त में मुद्दई तथा मुद्दाला के बयान क्रमपूर्वक लिखे जाँय । तब जाकर उन पर विचार किया जाय ।
( ३ ) पराजय के लक्षण : बयान देते समय जो व्यक्ति प्रसङ्ग की बात न कहकर इधर-उधर की हाँकने लगता है; जिसके बयानों में कोई सिलसिला न हो, दूसरे की अमान्य बात को पकड़ कर उस पर डट जाता है, कर्जा लेने के स्थान पर हलफ देकर भी पूछने पर नहीं बतलाता या उसकी जगह किसी दूसरे ही स्थान को बतलाता है स्थान ठीक बताने पर ऋण लेने से मुकर जाता है; गवाहों की बात को स्वीकार नहीं करता; और निषिद्ध स्थान में गवाहों से मिल कर बात करता है; उसको हारा हुआ समझना चाहिए ।
( ४ ) पराजय का दण्ड : ऐसे हारे हुए व्यक्ति को ऋण की रकम का पाँचवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । बिना गवाह के अपनी ही बात को जो बार-बार ठीक कहता जाय उसको ( देय रकम ) का दसवाँ हिस्सा दण्ड दिया जाय । इसके अतिरिक्त हर्जने के रूप में हारे हुए अपराधी से नौकरों के वेतन का आठवाँ हिस्सा और रास्ते का भोजन-भत्ता भी अदा कर लिया जाय ।
१७ कौ०