भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) दृष्टदोषः स्वयंवादः स्वपक्षपरपक्षयोः । अनुयोगार्जवं हेतुः शपथश्चार्थसाधकः ॥ (२) पूर्वोत्तरार्थव्याघाते साक्षिवक्तव्यकारणे । चारहस्ताच्च निष्पाते प्रदेष्टव्यः पराजयः ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयाऽधिकरणे विवादपदनिबन्धो नाम प्रथमोऽध्यायः, आदितोः सप्तपञ्चाशः ।

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साथ विरोध पैदा हो जाय, तो वहाँ राज-शासन को ही प्रमाण मानना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से धर्मशास्त्र का पाठ मात्र ही नष्ट होता है।

(१ निर्णय के हेतु : मुकदमे का फैसला देने से पूर्व कुछ बातें आवश्यक हैं; जैसे १. जिसका अपराध देख लिया गया हो, २. जिसने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया हो; ३. सरलता से जिरह; ४. सरलता से कारणों का पता लग जाना और २. कसम दिलाना, ये पाँचों बातें सच्चाई को सिद्ध करने में सहायक होती हैं ।

(२) यदि उक्त पांच हेतुओं के माध्यम से भी वादी-प्रतिवादी की पारस्परिक विरुद्ध दलीलों का उचित समाधान न हो सके तो साक्षियों और गुप्तचरों के द्वारा मामले की छान-बीन कराकर अपराध का फैसला देना चाहिए ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में विवादपदनिबन्ध नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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