कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण ५८ | विवाहसंयुक्तं; विवाहधर्मः; |
|---|---|
| अध्याय २ | स्त्रीधनकल्प; आधिवेदनिकम्; |
(१) विवाहपूर्वो व्यवहारः । (२) कन्यादानं कन्यामलङ्कृत्य ब्राह्मो विवाहः । (३) सहधर्मचर्या प्राजापत्यः । (४) गोमिथुनादानादार्षः । (५) अन्तर्वेद्यामृत्विजे दानाद् दैवः । (६) मिथस्समवायाद् गान्धर्वः । (७) शुल्कादानादासुरः । (८) प्रसह्यादानाद् राक्षसः ।
विवाह सम्बन्ध
धर्मविवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार
( १ ) धर्मविवाह : विवाह के बाद ही सारे सांसारिक व्यवहार आरम्भ होते हैं ।
( २ ) वस्त्र-आभूषण आदि से सजाकर विधिपूर्वक-कन्यादान करना ब्राह्म विवाह कहलाता है ।
( ३ ) कन्या और वर, दोनों सहधर्म पालन करने की प्रतिज्ञा कर जिस विवाह बन्धन को स्वीकार करते हैं, उसे प्राजापत्य विवाह कहते हैं ।
( ४ ) वर से गऊ का जोड़ा लेकर जो विवाह किया जाता है उसे आर्ष विवाह कहते हैं ।
( ५ ) विवाह वेदी में बैठकर ऋत्विक् को जो कन्यादान दिया जाता है उसे दैव विवाह कहते हैं ।
( ६ ) कन्या और वर का आपसी सलाह से किया गया विवाह गान्धर्व विवाह ( Love marriage ) कहलाता है ।
( ७ ) कन्या के पिता को धन देकर जो विवाह किया जाता है उसे आसुर विवाह कहते हैं ।
( ८ ) किसी कन्या से बलात्कार करके विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है ।