भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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२६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण

(१) सुप्तादानात् पैशाचः । (२) पितृप्रमाणाश्चत्वारः पूर्वे धर्म्याः । मातापितृप्रमाणाः शेषाः । तौ हि शुल्कहरौ दुहितुः । अन्यतराभावेऽन्यतरो वा । (३) द्वितीयं शुल्कं स्त्री हरेत् । सर्वेषां प्रीत्यारोपणमप्रतिषिद्धम् । (४) वृत्तिराबन्ध्यं वा स्त्रीधनम् । परद्विसाहस्रा स्थाप्या वृत्तिः । आबन्ध्या नियमः । (५) तदात्मपुत्रस्नुषाभर्मणि प्रवासाप्रतिविधाने च भार्याया भोक्तु-मदोषः । प्रतिरोधकव्याधिदुर्भिक्षभयप्रतीकारे धर्मकार्ये च पत्युः । सम्भूय वा दम्पत्योर्मिथुनं प्रजातयोस्त्रिवर्षोपभुक्तं च धर्मिष्ठेषु विवाहेषु नानुयु-ञ्जीत । गान्धर्वासुरोपभुक्तं सवृद्धिकमुभयं दाप्येत । राक्षसैपैशाचोपभुक्तं स्तेयं दद्यात् । इति विवाहधर्मः ।

(१) सोई हुई कन्या को हरण करके विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

(२) उक्त आठ प्रकार के विवाहों में पहिले चार प्रकार के विवाह पिता की सलाह से होने के कारण धर्मानुकूल विवाह हैं । बाकी चार विवाह माता-पिता दोनों की सलाह से होते हैं; क्योंकि वे दोनों लड़की को देकर उसके बदले में धन लेते हैं । उस धन को यदि पिता न हो तो माता ले सकती है और माता न हो पिता ले सकता है।

(३) इसके अतिरिक्त प्रीतिवश दिया हुआ दूसरे प्रकार का धन उस कन्या का है जिसके साथ विवाह किया गया हो । सभी प्रकार के विवाहों में स्त्री-पुरुष में परस्पर प्रीति का होना आवश्यक है ।

(४) स्त्री का धन : स्त्री का धन दो प्रकार का होता है : १. वृत्ति और २. आबध्य । स्त्री का वृत्ति धन वह है जो स्त्री के नाम से बैंक आदि में जमा किया गया हो । उसकी रकम कम-से-कम दो हजार तक होनी चाहिए । गहना या जेवर आदि आबध्य धन कहलाते हैं, जिनकी तादाद का कोई नियम नहीं है ।

(५) किसी स्त्री का पति परदेश चला जाय और उसकी (स्त्री की) जीविका निर्वाह के लिए कोई जरिया न हो तो वह स्त्री अपने पुत्र और अपनी पतोहू के जीवन-निर्वाह के लिए अपने निजी धन को खर्च कर सकती है । किसी विपत्ति, बीमारी, दुर्भिक्ष या इसी तरह के आकस्मिक संकट से बचने के लिए और किसी धर्म-कार्य में पति भी यदि स्त्री के निजी धन को खर्च करता है तो उसमें कोई बुराई नहीं । इसी प्रकार दो सन्तान पैदा होने पर स्त्री-पुरुष दोनों मिलकर यदि उस धन को खर्च करें तब भी कोई दोष नहीं; और ऐसे पति-पत्नी जिनका विवाह धर्मानुकूल हुआ हो, कोई सन्तान पैदा न होने पर तीन वर्ष तक उस धन को खर्च कर सकते हैं । जिन्होंने गान्धर्व या आसुर विवाह किया हो और आपसी सलाह से वे स्त्री-धन को खर्च कर डालें तो उनसे ब्याजसहित मूलधन जमा कर लिया जाय । जिन्होंने